'अमन की कोशिशें जारी रहनी चाहिए'

भारत और पाकिस्तान के प्रतिनिधि
Image caption सभी प्रतिनिधियों की कोशिश थी कि दोनों देश के बीच शांति वार्ता शुरू हो

"अहदे जवानी में देखे थे कैसे-कैसे ख़्वाब सुहाने

इन ख़्वाबों में हम लिखते थे अक्सर ख़ुशियों के अफ़साने

एक नई दुनिया की कहानी एक नई दुनिया के तराने

ऐसी दुनिया जिसमें कोई दुख न झेले, भूख न जाने"

ये कविता पाकिस्तान के जानेमाने वकील एतेज़ाज़ असहन ने दिल्ली में आयोजित तीन दिवसीय शांति सम्मलेन में सुनाई, जहाँ भारत और पाकिस्तान के 'शांति के दूतों' ने एक मत से कहा कि दोनों देशों के बीच स्थाई शांति और बेहतर संबंधों के लिए अमन की कोशिशें जारी रहनी चाहिए.

प्रतिनिधियों के अनुसार दोनों देशों की जनता जंग नहीं चाहती और शांति-वार्ता दोबारा शुरू करने से संबंधों को पटरी पर लाया जा सकता है.

आयोजकों और प्रतिनिधियों ने इस बात को स्वीकार किया कि केवल ऐसे सम्मेलनों से समस्या का हल नहीं निकल सकता, लेकिन इससे बातचीत के लिए अनुकूल वातावरण ज़रूर बनेगा.

ग़ौरतलब है कि नंवबर, 2008 में मुंबई हमलों के बाद दोनों देशों के बीच आधिकारिक स्तर पर बातचीत नहीं हो रही है. भारत सरकार का कहना है कि जबतक पाकिस्तान इन हमलों के अपराधियों को सज़ा नहीं देता है, शांति-वार्ता शुरू करना मुमकिन नहीं है.

ये शांति सम्मेलन रविवार को शुरु हो कर मंगलवार को समाप्त हुआ, जिसमें भारत और पाकिस्तान की अनेक जानीमानी हस्तियाँ शामिल हुईं. मुंबई हमलों के बाद दोनों देशों के संबंधों में आई खटास के बाद ये पहला बड़ा ग़ैर सरकारी शांति सम्मलेन है.

इस सम्मेलन में शांति की स्थापना में व्यापार, कश्मीर, जलवायु परिवर्तन, मीडिया और सुरक्षा जैसे मुद्दों की भूमिका पर भी चर्चा हुई.

मक़सद

सम्मेलन का मक़सद दोनों देशों के बीच शांति की स्थापना था, पर ऐसे प्रयास तो पहले भी होते रहे हैं और दोनों देशों के 62 वर्षों का इतिहास कुछ अलग ही कह रहा है, तो फिर ये सम्मेलन अलग क्यों और क्या इससे समस्या का कोई हल निकल सकता है?

आयोजकों में से एक और जानेमाने पत्रकार कुलदीप नैयर कहते, "हमारी कोशिश है कि किसी भी तरह से दोनों देशों के बीच नफ़रत कम हो और सरकार पर दबाब डाला जाए कि बातचीत शुरू हो. हम नतीज़ों के डर से अच्छे प्रयास को नहीं रोक सकते."

पर इस बात से आयोजक और सभी प्रतिनिधि भी भलीभांति अवगत थे कि फ़िलहाल विवाद की जड़ मुंबई हमले और पाकिस्तान का रवैया है. इस सवाल के जबाव में कुलदीप नैयर कहते हैं, "कुछ लोगों की ग़लती की सज़ा इस क्षेत्र की पूरी जनता को नहीं दी जा सकती."

शांति के लिए परस्पर प्रयास की आवश्यकता होती है, ऐसे में इस सम्मेलने के बाद क्या होगा?

नैयर का कहना था, "हमारी अगली कोशिश होगी कि दोनों देशों के अमन पसंद शहरी अपनी-अपनी सरकारों की प्रतिनिधियों से मिलेंगे और उनपर दबाब डालेंगे, ताकि शांति-वार्ता दोबारा शुरू की जा सके."

सभी प्रतिनिधियों के लिए शांति स्थापना एक अहम मुद्दा था, पर इसे कैसे हासिल किया इस पर कई मत सामने आए.

विवाद की जड़

Image caption एतेज़ाज़ असहन के अनुसार नफ़रत कम करने की कोशिश होनी चाहिए

कुछ वक्ताओं का मानना था कि व्यापार को बढ़ाकर शांति के बाधाओं को दूर किया जा सकता है, जबकि कुछ वक्ताओं की राय में भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद की जड़ कश्मीर है और उस समस्या के समाधान के बिना शांति मुमिकन नहीं.

लेकिन एक राय ये भी थी कि बेहतर रिश्तों के लिए शैक्षणिक और सांस्कृतिक संबंधों को बढ़ाने की आवश्यकता है.

नफ़रत और घृणा के रिश्तों का ज़िक्र करते हुए पाकिस्तान के जानेमाने वकील और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के नेता एतेज़ाज़ असहन ने ज़ोर देकर कहा कि दोनों देश साथ-साथ ही रहेंगे, ऐसे में नफ़रत बहुत देर तक नहीं चल सकती.

उनका कहना था, "लोग अमन और मोहब्बत चाहते हैं, लेकिन ये रास्ता बहुत मुश्किलों भरा है. इसके लिए जनता, सरकार और एजेंसियों की रवैयों को बदलना होगा."

जब उनसे पूछा गया कि अमन में रुकावट कौन है, किस देश का रवैया बहुत अच्छा नहीं है. क्या पाकिस्तान को मुबंई हमलों के षड्यंत्रकर्ताओं के ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं करनी चाहिए?

इसपर एतेज़ाज़ अहसन कहते हैं, "भारत को मुंबई हमलों के पाकिस्तानी कसूरवारों को पकड़ने और सज़ा दिलाने की बात छोड़कर शांति-वार्ता शुरु करनी चाहिए. भारत की ज़िद ग़लत है और उसे ये समझना चाहिए कि किसी गुनाहगार को सज़ा अदालत देती है सरकार नहीं."

साझा दुश्मन

सम्मलेन में ये बात कही गई कि दोनों देशों में ऐसे तत्व भरे पड़े हैं जो अनुकूल माहौल नहीं चाहते और इस समय वो अपनी चाल में कामयाब हो गए हैं.

लेकिन फ़िल्मकार महेश भट्ट आशांवित हैं और उनके अनुसार दोनों देशों को अपने साझा दुश्मन को पहचाना चाहिए और उसके ख़िलाफ़ मिलकर काम करना चाहिए.

बक़ौल महेश भट्ट चरमपंथी दोनों के साझा दुश्मन है.

पर इससे थोड़ी अलग बात पाकिस्तान में थियेटर की जानीमानी हस्ती मदिहा गौहर कहती है, "दोनों देशों के बीच एक दूसरे पर विश्वास की कमी है, जिसके कारण रिश्ते कभी अच्छे नहीं बन पाए हैं."

उनका कहना था, "इसे पाटने के लिए आम लोगों को आगे आना होगा.शांति के लिए ये एक शुरुआत भर ज़रूर है."

लेकिन जामिया मिल्लिया इस्लामिया के पूर्व कुलपति मुशीरुल हसन मानते हैं, "जबतक पाकिस्तान मुंबई हमलों के षड्यंत्रकर्ताओं के विरुद्ध कार्रवाई नहीं करता, शांति-वार्ता में रुकावट बनी रहेगी और जो विश्वास बहाल होना चाहिए वो नहीं होगा."

मीडिया की भूमिका

Image caption सम्मेलन में कई जाने माने लोगों ने हिस्सा लिया

मीडिया की भूमिका से सभी वाकिफ़ हैं. पर इस सम्मेलन में मीडिया की ख़ूबी नहीं बल्कि ख़राबियों पर ही चर्चा हुई. भारत-पाकिस्तान संबंधों के लिए मीडिया को भी बहुत हद तक ज़िम्मेदार माना गया.

सम्मेलन में मौजूद अधितकर वक्ताओं ने दोनों देशों के ख़राब रिश्तों के लिए मीडिया को ज़िम्मेदार ठहराया और कहा कि मीडिया सरकारी ज़बान बोलता है.

वरिष्ठ पत्रकार और कश्मीर टाइम्स के संपादक वेद भसीन के अनुसार ऐसे माहौल में भारतीय मीडिया ने अपनी ज़िम्मेदारी नहीं निभाई है और कश्मीर के मामले में तो उनकी भूमिका सरकारी जैसी रही है.

लेकिन जानेमाने समाजसेवी असगर अली इंजीनियर भसीन की बात से सहमति ज़ाहिर करते हुए कहते हैं कि अगर मीडिया अमन की कोशिश करता भी तो उसके पीछे कारण और हित जनता का नहीं बल्कि सत्ता और बड़ी ताक़त की होती है.

सम्मेलन में शामिल गौरव कुमार से जब इसके बारे में उनकी राय जाननी चाही तो वो बोले पड़े, "शांति के लिए ये एक शुरुआत है, अगर कुछ नहीं नतीजा निकलता है तो भी इन जैसे सम्मेलनों से हमें ये जानने को मिलता है कि पाकिस्तान में हमारे दोस्त क्या सोचते हैं और यहाँ के लोग उनके बारे में क्या सोचते हैं."

शांति के इन दूतों के प्रयास का आने वाले दिनों में क्या असर पड़ेगा, कहा नहीं जा सकता, लेकिन नफ़रत की आँधी में मुहब्बत के चिराग़ जलाने वालों को शाबाशी दी जा सकती है.

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