साथ गई बो भाषा

बोआ सीनियर
Image caption बोआ सीनियर के निधन पर भाषाविदों में शोक की लहर

अंडमान में एक 85 वर्षीया महिला बोआ सीनियर के निधन के साथ ही प्राचीन भाषा बो को आगे ले जाने वाली कड़ी हमेशा के लिए टूट गई.

भारत की एक अग्रणी भाषाविद प्रोफ़ेसर अन्विता अब्बी ने बोआ के निधन को भाषा विज्ञान के क्षेत्र में एक अपूरणीय क्षति बताया है क्योंकि वह दुनिया की प्राचीनतम भाषाओं में से एक को बोलने वाली अंतिम व्यक्ति थीं.

उल्लेखनीय है कि अंडमान की प्राचीन भाषाओं का स्रोत अफ़्रीका को माना जाता है. कई अंडमानी भाषाएँ तो 70 हज़ार साल तक पुरानी मानी जाती हैं.

प्रोफ़ेसर अब्बी ने बीबीसी को बताया, "अपने माता-पिता की मौत के बाद पिछले 30-40 वर्षों से बोआ बो भाषा में बोलने वाली अंतिम व्यक्ति थीं."

उन्होंने कहा, "बोआ अक्सर ख़ुद को बहुत अकेला महसूस करती थीं. अन्य लोगों से बातचीत के लिए उन्हें अंडमानी हिंदी सीखनी पड़ी थी."

ख़तरा आगे भी

प्रोफ़ेसर अब्बी ने कहा कि चूंकि अंडमानी भाषाओं को पाषाण युग से चली आ रही भाषाओं का अंतिम अवशेष माना जाता है, इसलिए कहा जा सकता है कि बोआ सीनियर के निधन से भाषाओं की गुत्थी का एक सिरा हमेशा के लिए खो गया.

अंडमान की जनजातियों को चार समूहों में रखा जाता है- ग्रेट अंडमानी, जारवा, ओन्गी और सेंटीनली. बोआ सीनियर ग्रेट अंडमानी समूह से थीं. अब इस जनजाति के 50 के क़रीब लोग ही बचे हैं जिनमें से अधिकतर बच्चे हैं.

सर्वाइवल इंटरनेशनल संस्था के निदेशक स्टीफ़न कोरी ने बो भाषा के उन्मूलन पर दुख व्यक्त करते हुए कहा है कि मानव समाज का एक अनूठा अंश अब स्मृतियों में ही शेष रहेगा.

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