झारखंड पुलिस की भूमिका पर सवाल

माओवादी
Image caption माओवादियों ने 14 लोगों को छोड़ने की मांग की थी

झारखंड में धालभूमगढ़ के प्रखंड विकास पदाधिकारी प्रशांत कुमार लायक के अपहरण के बाद अब पुलिस के रुख़ पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं.

दरअसल बीडीओ प्रशांत कुमार के अपहरण के बाद माओवादियों ने सरकार के सामने ये शर्त रखी थी कि गिरफ़्तार किए गए 14 लोगों को रिहा कर दिया जाए.

माओवादियों का कहना है कि ये सभी ग्रामीण निर्दोष हैं. अब झारखंड की पुलिस को भी लगने लगा है कि माओवादी होने के आरोप में जेल में बंद इन 14 ग्रामीणों में ज़्यादातर बेगुनाह हैं.

झारखंड पुलिस ने अदालत में आवेदन देकर इन 14 ग्रामीणों के ख़िलाफ़ दर्ज किए गए मामलों की फिर से पड़ताल करने की अनुमति मांगी है.

दावा

शनिवार को बहादुर मार्डी और उनकी बेटी जस्मिन मार्डी को अदालत ने ज़मानत पर छोड़ दिया.

छोटानागपुर क्षेत्र के पुलिस महानिरीक्षक रेजी डुंगडुंग कहते हैं, "हमारे पास दंड संहिता के तहत यह अधिकार होता है कि हम मामले की फिर से जाँच कर सकें. अदालत ने संतुष्ट होने के बाद उन्हें ज़मानत दी है."

उन्होंने दावा किया कि ज़मानत पर छूटे दोनों लोग पूरी तरह निर्दोष हैं.

अब सरकार दोषी पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की बात कर रही है. रेजी डुंगडुंग ने कहा, "पुलिसवालों से ग़लती हुई है. जिसने भी इस मामले में लोगों को फँसाया है, प्रक्रिया के तहत उन पर कार्रवाई होगी."

जेल में बंद कई लोगों को माओवादी करार देकर जेल भेज दिया गया है.

ऐसे में ये सवाल उठता है कि माओवादियों के ख़िलाफ़ केंद्र के अभियान के दौरान कौन ये सुनिश्चित करेगा कि जंगल में जानवर चराने वाले आदिवासी और खेतों में काम करने वाले लोगों को नक्सली कहकर निशाना न बनाया जाए.

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