संगीत और सज़ा

क़ैदियों की बैंड
Image caption क़ैदियों के बैंड की मांग अब पड़ोस के ज़िलों में भी है

वो शादी भी क्या जिसमें बैंड बाजा न हो. पिछले दिनों मैं भी एक ऐसी शादी का गवाह बना जिसमें बैंड बाजा था ख़ास बात ये है कि वो बैंड लखनऊ जेल के आदर्श कारागार के क़ैदियों का था और क़ैदी भी सारे उम्र क़ैद की सज़ा पाए हुए.

उत्तरांचल सरकार में चीफ़ इंजीनियर के पद से सेवानिवृत्त हुए एचसी पाठक की बेटी तनु की शादी प्रतीक से हुई. प्रगतिशील सोच रखने वाले पाठक ने अपनी बिटिया की शादी को यादगार बनाने के लिए कुछ ख़ास किया.

पाठक बताते हैं कि जब उन्हें पता चला कि लखनऊ जेल के क़ैदियों का एक बैंड है तो उन्होंने उसे बुक करने का निर्णय लिया.

ये समाज की मुख्यधारा से कट चुके लोगों को जोड़ने का उनका अपना तरीक़ा था.

नई पहल

लखनऊ स्थित आदर्श कारागार में क़ैदियों को सुधारने की अनोखी पहल के रूप में यह प्रयोग वर्षों पहले शुरू हुआ था पर कुछ अड़चनों के कारण बंद कर दिया गया था.

अब इसी वर्ष से इसको फिर से शुरू किया गया है. अब ये बैंड जेल के बाहर शादियों और अन्य ख़ास मौक़ों के लिए भी भेजा जाता है. इस बैंड ने इस बार के लखनऊ महोत्सव मे अपनीं शानदार प्रस्तुति दी और सबकी वाहवाही हासिल की.

उसके बाद गणतंत्र दिवस की परेड मे भी इसकी धूम रही. इसकी लोकप्रियता का आलम यह है कि बाहरी ज़िले के लोग भी अपने यहाँ इस बैंड की प्रस्तुति चाहने लगे हैं .

वरिष्ठ जेल अधीक्षक वीके जैन बताते हैं कि जेल में बैंड तो था पर उसको बाहर नहीं भेजा जाता था लेकिन इस बार यह अनोखा प्रयोग किया गया जिससे जेल के क़ैदी भी समाज की गतिविधियों का हिस्सा बनें.

इस बैंड से होने वाली आय का 50 प्रतिशत बैंड के रखरखाव में ख़र्च होता है और शेष 50 प्रतिशत क़ैदियों के खाते में जमा हो जाता है .

लखनऊ शहर के अंदर किसी भी कार्यक्रम के लिए यह बैंड 1200 रुपए प्रति घंटे की दर से बुक कराया जा सकता है.

Image caption ये बैंड प्रति घंटा 1200 रूपए लेता है

जब ये क़ैदी जेल से बाहर किसी शादी या समारोह में जाते हैं, तो बंदी रक्षक कुलदीप त्रिवेदी उनके साथ रहते हैं.

वे बताते हैं कि भले ही इन क़ैदियों को हत्या जैसे जघन्य अपराध में आजीवन कारावास की सज़ा मिली है लेकिन ये सभी सभ्य नागरिकों जैसा व्यवहार करते हैं और उन्हें कभी इन क़ैदियों से कोई परेशानी नहीं हुई.

अनोखा अनुभव

सुरेश नाम के क़ैदी बताते हैं कि वो पिछले 10 वर्ष से जेल में है और साज़ बजाने का काम उन्होंने यहीं सीखा और बैंड बजाने से उसे खुशी होती है और जेल से बाहर निकलने का मौक़ा भी मिलता है.

वो ये बताना भी नहीं भूलते कि उसके हाथ में एक हुनर आ गया है.

मेरठ के रहने वाले ताहिर पिछले 13 वर्ष से जेल में हैं. वो कहते हैं कि इंसानी रिश्तों को जोड़ने का काम संगीत से बेहतर और कोई नहीं कर सकता.

वह कहते हैं,''संगीत जिसके मन में होगा वो कभी कुछ ग़लत नहीं करेगा.''

इन क़ैदियों की ट्रेनिंग साल भर चलती है क़ैदियों को प्रशिक्षण देने वाले बैंड मास्टर रमेश बताते हैं कि वे क़ैदियों का चुनाव संगीत से उनके लगाव को देखकर करते हैं, कम उम्र के क़ैदी जल्दी सीखते हैं.

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