मानवाधिकार संगठन गृह मंत्री से नाराज़

माओवादी हिंसा
Image caption मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने माओवादियों के ख़िलाफ़ जारी ऑपरेशन को खत्म करने को कहा है

माओवादी नेता कोबाड गांधी के ख़िलाफ़ दिल्ली पुलिस की चार्जशीट में कुछ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का नाम लिए की मानवाधिकार संगठनों ने कड़ी आलोचना की है.

उन्होंने पकड़े गए माओवादी नेता कोबाड गांधी से बातचीत की हिमायत की है.

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने माओवादियों के ख़िलाफ़ जारी ऑपरेशन ग्रीन हंट को खत्म कर बातचीत करने को कहा है.

मानवाधिकार संगठनों ने शनिवार को दिल्ली में एक पत्रकारवार्ता बुलाई थी.

दिल्ली पुलिस की चार्जशीट में पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़ (पीयूसीएल), पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स या पीयूडीआर जैसे संगठनों का नाम भी लिया गया है.

गौतम नवलखा, रोना विल्सन, जीएन साईबाबा जैसे मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और कुछ मानवाधिकार संगठनों पर ये आरोप है कि वो माओवादियों के नज़दीकी हैं.

याद रहे कि गृहमंत्री पी चिदंबरम ने कहा था कि वो माओवादी हिंसा की निंदा की आवाज़ें उन लोगों से सुनना चाहते हैं जिन्होंने ग़लती से माओवादियों को बौद्धिक और आर्थिक मदद की.

लेकिन इन कार्यकर्ताओं का कहना है कि सरकार चरमपंथियों के ख़िलाफ़ लड़ाई के बहाने मानवाधिकार अधिकार्यकर्ताओं को निशाना बना रही है.

इनके मुताबिक गृह मंत्रालय लोगों को ये कहकर निशाना बना रहा है कि वो माओवादियों से हमदर्दी रखते हैं.

बातचीत

वकील प्रशांत भूषण कहते हैं कि अगर सरकार आदिवासियों की ज़मीन छीनेगी और उन्हें दबाएगी, तो लोगों के पास हथियार उठाने के अलावा और कोई चारा नहीं रहता.

प्रशांत भूषण से ये पूछे जाने पर कि सुरक्षाबलों की हिंसा एक तरफ, इस आरोप पर वो क्या कहेंगे कि मानवाधिकार की बात करने वाले कार्यकर्ता माओवादी हिंसा की निंदा उसी शिद्दत से नहीं करते, इस पर उनका कहना था,''माओवादी की तरफ़ से जो हिंसा होती है, उसका हमें पता कैसे चलेगा? आज ये समस्या है कि सरकार कई बार झूठा प्रोपेगैंडा करती है. माओवादी सरकार से लड़ रहे हैं. पुलिसवाले उन्हें तलाश कर रहे हैं तो पुलिसवालों पर तो वो हमला करेंगे ही.''

प्रशांत भूषण ने पकड़े गए माओवादी नेता कोबाड गांधी से बातचीत की हिमायत की और कहे कि उनके ख़िलाफ़ किसी भी हिंसक गतिविधियों में शामिल होने का कोई आरोप नहीं है.

उन्होंने कहा,''ये कहा जा रहा है कि कोबाड गांधी माओवादियों के पॉलित ब्यूरो में हैं. अगर आप माओवादियों से बातचीत करना चाहते हैं तो आपको किसी से तो बातचीत करना ही होगा.''

गुस्सा

प्रसिद्ध लेखिका अरुंधति राय कहती हैं कि सुरक्षाबलों की कार्रवाई से आदिवासियों में गुस्सा है.

उन्होंने कहा,''सुरक्षाबल आदिवासियों के ख़िलाफ़ हिंसा करते हैं और सरकार को माओवादियों के साथ बातचीत करनी चाहिए.''

इन कार्यकर्ताओं के मुताबिक इस इस समस्या की मुख्य जड़ ये है कि इस देश के सबसे पिछड़े वर्गों को फ़ायदा कराने के बजाए सरकार उनसे उनकी सबसे बहुमूल्य चीज़ छीन रही है और वो है उनकी ज़मीन.

और अगर उनके शांतिपूर्ण विरोध को भी कुचलने की प्रक्रिया जारी रही, तो परिणाम घातक होंगे.

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