कुछ अलग करने की चाह...

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौक़े पर पेश है ख़ास मुलाक़ात कुछ ऐसी महिलाओं के साथ जो मर्दों की दुनिया में अपना एक अलग नाम बनाने की कोशिश कर रही हैं. इन सभी महिलाओं ने अपने लिये कुछ ऐसे रोज़गार ढ़ू़ढें हैं जिन्हें आमतौर पर मर्द ही करते दिखाई देते हैं.

सुनीता चौधरी, ऑटो चालक

Image caption सुनीता चौधरी दिल्ली की सड़कों पर ऑटो चलाती हैं

"मैं अंग्रेज़ी बोलना या लिखना नहीं जानती. इस वजह से मुझे दिल्ली में कोई अच्छी नौकरी पाने में काफ़ी परेशानी हुई. अब देहात में अंग्रेज़ी तो पढ़ाई नहीं जाती. इसलिये गांव में रहने वाले लोगों को अकसर शहरों में अच्छी नौकरियां पाने में काफ़ी कठिनाई होती है. ऊपर से अगर आप स्त्री हैं तो आपके लिये और मुश्किल हालात होते हैं. मैंने बहुत नौकरी ढूंढी पर नहीं मिली तो फिर मैंने गाड़ी चलानी सीखी.

मुझे लगता है कि मैं बहुत अलग हूं. कुछ महिलाएं होती हैं जो घर की चारदीवारी में ही ख़ुश रहती हैं. लेकिन मैं ऐसी नहीं हूं. ऑटो चलाने से मैं बहुत आज़ाद महसूस करती हूं. जब भी कोई नई सवारी मिलती है तो लगता है चलो किसी नई जगह जाने का मौक़ा मिलेगा. अब तो लगता है कि मैं दिल्ली की मालिक हूं.

कभी-कभी मैं इतनी व्यस्त होती हूं कि अपना नाश्ता भी अपने साथ लेकर चलती हूं. फिर दोपहर का खाना ऑटो रोककर कहीं खा लेती हूं.

मेरी नौकरी कोई आसान नहीं. कभी-कभी लोगों से झगड़ा भी हो जाता है. लेकिन मैं डरती नहीं. मैंने तो कराटे सीखा है लेकिन मैं क़ानून को अपने हाथ में नहीं लेती. पुलिस को फ़ोन कर देती हूं. हां लेकिन कई परिस्थितयां ऐसी होती हैं जिनसे ख़ुद ही निबटना पड़ता है."

सोनिया खन्ना, डीजे

Image caption सोनिया खन्ना एक डीजे हैं

"मुझे संगीत से बहुत लगाव है इसलिये मैं डिस्क जॉकी (डीजे) बनी. मुझे अपना काम इसलिये पसंद है क्योंकि इसमें मुझे अपने-आपको व्यक्त करने की आज़ादी है. मैं जब किसी पार्टी में संगीत बजाती हूं तो मुझे लगता है कि मैं ही सबके आकर्षण का केंद्र हूं क्योंकि अगर मैं अच्छा संगीत नहीं बजाऊंगी तो लोग नाचना ही नहीं चाहेंगे.

डीजे बनने के लिये इस बात से कोई फर्क़ नहीं पड़ता कि आप मर्द हैं या औरत हैं. बस आपमें लोगों का मनोरंजन करने की क़ाबलियत होनी चाहिए और संगीत का अच्छा ज्ञान होना चाहिए.

हमारे समाज में औरतों से भेदभाव तो होता ही है. ऊपर से मेरे जैसे रोज़गार के लिये तो रात को ही काम करना पड़ता है वो भी क्लबों में. ऐसे में लोग आपको नकारात्मक दृष्टि से भी देखते हैं लेकिन अगर आपको अपने काम पर गर्व है तो आप बस अपना काम करते जायेंगे."

अमी श्रॉफ़, बारटेंडर

Image caption अमी श्रॉफ़ बारटेंडिंग का काम करती हैं

इस दुनिया में कोई भी काम सिर्फ़ मर्दों या औरतों के लिये नहीं बना है. अगर आप में क़ाबलियत है और आपको उस काम में दिलचस्पी है तो आप कुछ भी कर सकते हैं.

वैसे देखा जाये तो बारटेंडर और ख़ानसामे में कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं. ख़ानसामा खाना बनाता है और बारटेंडर ड्रिंक्स. बारटेंडर को अलग-अलग स्वाद के ड्रिंक्स बनाना आना चाहिए. इसलिये इस काम को किसी से कम नहीं समझना चाहिये क्योंकि सही स्वाद की ड्रिंक बनाना कोई आसान काम नहीं.

मैं घूमना-फिरना बहुत पसंद करती हूं और अपनी ज़िंदगी भरपूर रूप से जीना पसंद करती हूं. मैं फ़्रीलांसर हूं और अपने मन-मुताबिक काम करना पसंद करती हूं. सबको मेरी यही सलाह है कि ज़िंदगी में वही करें जिसे करने की इच्छा हो.

वीना हरिसन, बाउंसर

"अगर दो महिलाएं आपस में लड़ रही हों तो मेरा काम है उन दोनों को अलग करना. फिर उन्हें अलग-अलग बैठाकर मैं प्यार से समझाती हूं.

मुझे बांउसर होना अजीब नहीं लगता. जब आजकल सब से कहते हैं कि महिलाएं और पुरुष समान हैं तो फिर मेरे बाउंसर होने में क्या ख़राबी है? जब महिलाएं अंतरिक्ष यात्रा कर सकती हैं तो मैं बाउंसर जैसा छोटा काम क्यों नहीं कर सकती? मैं तो पुरुषों को भी उठा लेती हूं.

मैं पढ़-लिखकर एक पुलिस अफ़सर बनना चाहती थी लेकिन बन नहीं पाई. बाउंसर की नौकरी करके मेरा ये सपना थोड़ा-बहुत तो पूरा हो ही गया है.

मेरी एक छोटी बेटी है. मैं चाहती हूं वो भी बड़े होकर कोई बड़ा काम करे. मेरे अधूरे सपनों को वो पूरा करे. इंदिरा गांधी और किरण बेदी क्या किसी से कम हैं?"

अलका तोमर, पहलवान

Image caption अलका तोमर पहलवान हैं

"मैंने 1998 में पहलवानी शुरु की. तब तो इस क्षेत्र में महिलाएं ज़्यादा थीं भी नहीं. मेरा पूरा परिवार पहलवानों का है. मेरे पिता ने ही मुझे पहलवान बनने की प्रेरणा दी. उनके गुरु ही मेरे गुरु भी हैं.

पहले-पहले लोगों ने मुझे बहुत टोका और बहुत बातें बनाईं. सब कहते थे कि पहलवानी तो लड़कों का काम है लेकिन मेरे परिवार ने मेरा पूरा साथ दिया और आज इस मुकाम तक पहुंचाया.

मुझे अपने काम के बारे में सबसे अच्छी बात ये लगती है कि इसके लिये बहुत सहनशक्ति और दृढ़निश्चय चाहिए. मुझे कई चोटें आईं लेकिन मैं काम में डटी रही और कई पुरस्कार भी जीते.

यूपी से मैं पहली लड़की हूं जिसे अर्जुन अवॉर्ड मिला है. जो लोग पहले कहते थे कि लड़कियां हर काम नहीं कर सकतीं वही आज मुझे देखकर अपनी लड़कियों को पहलवानी करवा रहे हैं."

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