मनरेगा को भ्रष्टाचार मुक्त बनाता साफ़्टवेयर

काम करते मजदूर
Image caption इस सॉफ़्टवेयर को विकसित करने में देश की बड़ी आईटी कंपनियों में से एक टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) ने मदद की

महात्मा गांधी ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत देश के क़रीब पाँच करोड़ लोगों को रोज़गार उपलब्ध कराया जा रहा है. इस योजना पर भारत सरकार हर साल क़रीब 40 हजा़र करोड़ रुपए खर्च कर रही है.

देश में जहाँ हर छोटी-बड़ी योजनाएँ भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती हैं ऐसे में मनरेगा को भ्रष्टाचार से कैसे बचाने का उपाय खोजा है आंध्र प्रदेश ने.

यहाँ एक ऐसा सॉफ़्टवेयर विकसित किया गया है जिससे इस योजना में होने वाले हर काम और भुगतान पर नजर रखी जाती है.

इंटरनेट पर बीबीसी की विशेष श्रृंखला की अगली कड़ी के रूप में हमने नज़र डाली इस प्रयोग पर.

सूचना तकनीकी

यह साफ़्टवेयर कैसे काम करती है इसका एक उदाहरण है वारंगल ज़िले का चिन्नापुर गाँव.

यह ज़िले के 3145 गाँवों में से एक है जहाँ मनरेगा के तहत क़रीब डेढ़ लाख लोग काम कर रहे हैं.

राज्यलक्ष्मी इसी गाँव की निवासी हैं. उनके परिवार को इस योजना के तहत इस साल 315 दिन के काम के बदले 32 हज़ार रुपए की मजदूरी मिली है.

केवल राज्यलक्ष्मी ही नहीं बल्कि वारंगल ज़िले के साथ-साथ राज्य के उन 23 ज़िलों में इस योजना के तहत काम करने वाले क़रीब दो करोड़ लोगों की पूरी जानकारी आप केवल एक बार माउस क्लिक कर प्राप्त कर सकते हैं.

आंध्र प्रदेश सरकार ने 2006 में इस योजना के शुरुआत में ही इस सॉफ्टवेयर की तैयारी शुरू कर दी थी.

इसे विकसित करने में देश की बड़ी आईटी कंपनियों में से एक टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) ने मदद की. आज चार साल बाद यह सॉफ्टवेर सफलतापूर्वक काम कर रहा है.

इस साफ़्टवेयर को राष्ट्रीय और अंततराष्ट्रीय स्तर पर कई पुरस्कार मिले हैं.

नरेगा में पारदर्शिता लाने के लिए आंध्र प्रदेश सरकार ने डब्लूय डब्लूय डब्लूय डॉट एनआरईजीए डॉट एपी.जीओवी डॉट इन नाम से एक वेबसाइट बनाई है.

इसपर यह देखा जा सकता है कि राज्य के क़रीब 69 हज़ार गाँवों किस दिन कितने मजदूरों ने काम किया और उनको कितनी मजदूरी मिली.

पुख्ता जानकारी

वेबसाइट पर दी गई जानकारी की सत्यता जानने के लिए मैं वारंगल ज़िले के गुर्जाला गाँव गया. वहाँ 460 मजदूर एक पाँच सौ मीटर लंबा नाला खोदने में व्यस्त थे.

Image caption कई गाँवों को मिलाकर एक मंडल कार्यालय बनाया गया है.

अधिकारियों ने बताया कि हर मजदूर को रोजाना 90 से सौ रुपए तक की मजदूरी मिलती है. यह इस बात पर निर्भर करता है की किसने कितना काम किया.

यहाँ की फ़िल्ड असिस्टेंट और मजदूरों की सूची बनाने वाली जानकी से मैंने पूछा कि सूची में हेराफेरी कैसे रोकी जा सकती है. इस पर उन्होंने बताया कि एक तो वे ऐसा होने नहीं देंगी क्योंकि अगर कोई ऐसा करते हुए पकड़ा गया तो उसे नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा.

दूसरा कारण यह कि जो मजदूर काम करते हैं वे भी ऐसा होने नहीं देंगे क्योंकि अगर फर्ज़ी नामों से पैसे निकालेगा तो उनकी मजदूरी कम हो जाएगी.

उन्होंने बताया कि मजदूरों की सूची या मस्टर रोल के अधार पर ही वेतन मिलता है.

कई गाँवों पर आधारित एक मंडल कार्यालय बनाया गया है जहाँ लगे कंप्यूटर पर मंडल के गाँवों में होने वाले कामों को वेबसाइट पर दर्ज किया जाता है.राज्य में ऐसे क़रीब 11 सौ केंद्र हैं.

चन्नारावपेट मंडल में बने एक ऐसे ही केंद्र का मैंने दौरा किया. वहाँ दो कंप्यूटर लगे हुए हैं और दो डाटा इंट्री ऑपेरटर काम कर रहे थे.

भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़

इनमें से एक जी विजय कुमार ने बताया कि वे कंप्यूटर में पहले उन परिवारों का ब्योरा डालते हैं जिन्होंने ग्राम पंचायत से जॉब कार्ड लिया है. इसके बाद मस्टर रोल के अधार पर हर व्यक्ति के काम का ब्योरा डाला जाता है.

यह साफ़्टवेयर ख़ुद ही तय करता है कि किस व्यक्ति को कितना मजदूरी मिलनी चाहिए. उसी हिसाब से हर व्यक्ति को हर सप्ताह एक पे आर्डर जारी होता और दूसरी ओर बैंक से उतना ही पैसा निकलकर उस व्यक्ति के पोस्ट ऑफिस के खाते में चला जाता है.

वारंगल में इस योजना के अतरिक्त निदेशक डीएस जगन अपने कार्यालय में बैठकर हर काम पर नजर रखते हैं. उन्होंने बताया कि इस सॉफ्टवेर ने निगरानी को आसान बना दिया है.

वे कहते हैं, ''आज अगर हम एक नए काम करने वाले को एक रुपया देते हैं तो कल आपको वह इंटरनेट पर देखने को मिल जाएगा. आप उसे कहीं भी और कभी भी देख सकते हैं.''

तो क्या यह समझा जाए कि इस साफ़्टवेयर से आने जाने से आंध्र प्रदेश में मनरेगा में भ्रष्टाचार बिल्कुल नहीं है.

इस सवाल पर अधिकारयों का कहना है कि योजना के फंड का 60 फ़ीसदी हिस्सा वेतन पर और 40 फीसद हिस्सा निर्माण सामग्री पर खर्च होता है.

सामग्री की ख़रीद में अधिकारियों और ग्राम पंचायत का दखल होता है, इसी में भ्रष्टाचार की आशंका है लेकिन वेतन में इसकी कोई गुंजाइश नहीं हैं.

डीएस जगन का कहना था की अब तक एक करोड़ 15 लाख रुपए की हेरा फेरी पकड़ी गई है. इसके लिए ज़िम्मेदार लोगों पर आपराधिक कार्रवाई की जा रही है.

बात केवल सॉफ्टवेर पर ही ख़त्म नहीं हो जाती. भ्रष्टाचार रोकने के लिए सोशल ऑडिट या सामाजिक छानबीन की व्यवस्था भी है.

सामाजिक ऑडिट

वारंगल में मनरेगा के निदेशक हरि जवाहर लाल कहते हैं, ''हम हर छह महीनों में समाजिक ऑडिट करवाते हैं. हर गाँव में ग्राम सभा होती है और इसमें विस्तार से चर्चा होती है. हर घर का सर्वे कर यह पता लगाया जाता है कि किस परिवार को कितना वेतन मिला. इसके बाद इसकी तुलना उस जानकारी से की जाती है जो वेबसाइट पर उपलब्ध है.''

Image caption अह मनरेगा में सामग्री में होने वाली खरीद में धांधली संभव है.

इस दौरान इस पर भी चर्चा होती है कि क्या पोस्ट ऑफिस वालों ने पैसे देने में देरी की. क्या किसी ने बिना काम के वेतन लेने की कोशिश की.

इस सॉफ़्टवेयर पर वरिष्ट अधिकारी राजू ने कहा, ''मजदूर ही इस सॉफ़्टवेयर के केंद्र में हैं. जिनकी हालत बेहतर बनाने के लिए केंद्र सरकार ने यह योजना तैयार की है.''

इस व्यवस्था को और मजबूत बनाने के लिए सरकार अब मजदूरों को एक स्मार्ट कार्ड देने जा रही है. एटीएम कार्ड की तरह के इस कार्ड को मजदूर मशीन में डालकर यह जान सकते हैं कि उनके पोस्ट ऑफिस खाते में कितने पैसे हैं.

इतना सब होने के बाद भी नरेगा में कई खामियाँ हैं.

नर्संपेट में कुछ मजदूरों ने शिकायत की कि उन्हें साल में सौ दिन की जगह 80 दिन का काम मिल रहा है.

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