सीमापार से घुसपैठ बढ़ने का दावा

जम्मू कश्मीर के पुलिस महानिदेशक
Image caption इस वर्ष के शुरू से ही चरमपंथी गतिविधियों और हिंसा में बढ़ोतरी हुई है

जम्मू कश्मीर के पुलिस महानिदेशक कुलदीप खेड़ा का कहना है कि भारत प्रशासित राज्य जम्मू कश्मीर में अभी भी 500 से 600 चरमपंथी हैं जिनमें से क़रीब 40 फ़ीसदी विदेशी हैं.

उनका कहना है कि वर्ष 2009 में चरमपंथी हिंसा न्यूनतम स्तर पर रही, वहीं सरकार का कहना है कि हाल में पाकिस्तान की ओर से चरमपंथियों की घुसपैठ में बढ़ोतरी हुई है.

जम्मू में बीबीसी संवाददाता बीनू जोशी ने पुलिस महानिदेशक से लंबी बातचीत की. पेश हैं प्रमुख अंश,

सरकारी आंकड़ो के अनुसार जम्मू-कश्मीर राज्य में वर्ष 2009 में चरमपंथी हिंसा सब से कम रही. क्या कारण है कि इस वर्ष के शुरूआत से ही चरमपंथी गतिविधियों और हिंसा में बढ़ोतरी हुई है?

वर्ष 2009 में चरमपंथी हिंसा में क़रीब 30 फ़ीसदी की कमी आई थी. इस साल पहले दो महीने में कुछ घटनाएँ हुई हैं. अधिकतर घटनाएँ तब हुई हैं जब हमने कार्रवाई की है. इस कार्रवाई में चरमपंथी या तो मारे गए हैं या पकड़े गए हैं. जिससे चरमपंथी की संख्यां में कमी आई है. इस साल के आंकड़ों को देखा जाए तो 39 चरमपंथी मारे गए हैं जिन में ज़्यादातर कमांडर हैं.

इसके साथ मैं यह भी जोड़ना चाहता हूं कि वर्ष 2008 के मुक़ाबले 2009 में घुसपैठ ज़्यादा हुई थी. इस कारण चरमपंथियों की संख्या में उतनी कमी नहीं आई जितना हम चाहते थे. लगभग 250 चरमपंथी मारे गए और 100 से ज़्यादा घुसपैठ करके आ गए हैं.

अहम बात ये है कि लोग अमन चाहते हैं और वो हमें चरमपंथियों की सूचना दे रहें हैं. जिस कारण इतने ऑपरशन हो रहे हैं. ख़ास बात यह कि ये इंटेलिजेंस आधारित सर्जिकल ऑपरेशन थे. इससे घनी आबादी वाले इलाकों में भी क्षति नहीं हुई है.

लेकिन इन ऑपरेशन में सुरक्षा बलों की तरफ से काफ़ी क्षति हुई है. इसका क्या कारण है?

हर एक ऑपरेशन हमारे लिए एक सीख होती है.

जहाँ हम अपनी योजना को सुधारते हैं उसी तरह चरमपंथी भी अपनी योजना में बदलाव लाते हैं. इस कारण शुरुआत में सुरक्षा बलों को कुछ नुकसान हुआ लेकिन बाद में हमने सब को मार डाला.

जब से चरमपंथी हिंसा शुरु हुई है तब से काफ़ी संख्या में चरमपंथी मारे गए हैं. इन ऑपरेशन में सुरक्षा बलों को भी क्षति पहुंची है. मठभेड़ में नुकसान का अंदेशा हमेशा रहता है.

पाकिस्तान में बढ़ रही चरमपंथी हिंसा क्या आप के लिए चिंता का विषय है?

जहाँ तक हिंदुस्तान और ख़ास कर जम्मू कश्मीर में चरमपंथ का ताल्लुक है उसका केंद्र ही पाकिस्तान है.

Image caption वर्ष 2009 में चरमपंथी हिंसा में क़रीब 30 फ़ीसदी की कमी आई थी

पाकिस्तान ने बार-बार ज़ोर देकर कहा है कि वह कश्मीरी अलगाववादियों को केवल नैतिक समर्थन देता है?

यह ज़रूर है कि कुछ लोग कई कारण से उनका साथ देते हैं लेकिन योजना और नीति सब पाकिस्तान से आती है. ज़ाहिर सी बात है कि पाकिस्तान में हो रही गतिविधियों का यहां असर पड़ना लाज़मी है.

आने वाले समय में जम्मू कश्मीर पुलिस के लिए सबसे बड़ी चुनौतियाँ क्या है?

पिछले 20 वर्षों से चरमपंथी से मुक़ाबला करना तो एक मक़सद है ही इस साल भी इस पर ध्यान तो रहेगा ही.

चरमपंथियों की संख्या जितने कम होंगे राज्य में उतना विकास हो पाएगा. बेरोज़गारी का मसला भी इसी से जुड़ा हुआ है. इसलिए चरमपंथियों से निपटना हमारे लिए पहली चुनौती है.

हमारे लिए संतोष कि बात ये है कि इस दिशा में काफ़ी सुधार हुए हैं. अगली चुनौती क़ानून व्यवस्था बनाए रखना है जो इस वर्ष काफ़ी अहम है. इसके आलावा स्थानीय निकायों के चुनाव, पंचायत चुनाव आदी भी हमारे लिए चुनौतियाँ हैं.

इन परिस्थितियों में पुलिस के लिए चरमपंथियों के विरुद्ध अभियान में सुरक्षा कि अग्रिम पंक्ति लेना संभव है?

देखिए पुलिस की भूमिका लगातार बढ़ रही है.

ख़ासतौर पर पिछले वर्ष ये भूमिका काफ़ी बढ़ी. हमारी पाँच नई बटालियन तैयार हो रही है. उनको हम कमांडो प्रशिक्षण भी दे रहे हैं. उसके बाद उनको भी चरमपंथियों के विरुद्ध ऑपरेशन में लाया जाएगा.

विद्रोहियों के खिलाफ़ अभियान को मज़बूत किया जाएगा. इस सबके चलते हमें यह ध्यान रखना है कि विद्रोहियों के खिलाफ़ अभियान कमज़ोर न हो जाए जिस का फ़ायदा चरमपंथियों को मिलेगा.

हमें इस बात का ख़ास ध्यान रखना है और इसलिए यह प्रक्रिया हालात के मुताबिक, चरमपंथियों की गतिविधियों और खतरे को देख कर होगी. इसलिए हम पुलिस को अग्रिम पंक्ति में लाने के लिए एक तारीख़ तय नहीं कर सकते.

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