महिला सशक्तिकरण की ओर पहली छलांग

सोनिया गांधी
Image caption राज्यसभा में महिला विधेयक के पारित होने में सोनिया की अहम भूमिका मानी जा रही है

दुनिया माने या न माने, लेकिन हम भारतीयों ने वास्तविक महिला सशक्तिकरण की ओर पहली छलांग लगा ली है.

महिला सशक्तिकरण का इससे बेहतर क्या उपाय होगा कि देश की संसद और राज्य विधानसभाओं में एक तिहाई महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित कर दी जाए.

यह काम एक महिला नेता सोनिया गाँधी के हाथों हुआ, यह भी अपने आपमें एक ऐतिहासिक क़दम है. कारण यह कि इस पुरूष प्रधान समाज में महिला आरक्षण के लिए एक महिला का साहस जुटाना कोई सरल बात नहीं है.

सोनिया गाँधी ने एक महिला होकर 'यादव' पुरूष नेताओं तक को ललकारा है. इसमें कोई शक नहीं है कि इतिहास सोनिया गाँधी को महिला सशक्तिकरण के लिए सदा याद करेगा.

लेकिन राज्य सभा में महिला आरक्षण बिल पारित होने के पश्चात भारतीय राजनीति में यह सिद्धांत तय हो गया कि दबे-कुचले वर्गों के सशक्तिकरण का एक मात्र उपाय आरक्षण ही है.

आरक्षण की पद्धति

यही कारण है कि महात्मा गाँधी ने सबसे पहले 1930 के दशक में ही (जबकि आरक्षण पद्धति पर बहुत विरोध था) समाज के सबसे दबे कुचले दलित वर्गों के सशक्तिकरण के लिए दलित आरक्षण को स्वीकार कर लिया था.

इसी प्रकार दूसरी पिछड़ी जातियों के लिए विश्वनाथ प्रताप सिंह ने 1990 में सरकारी नौकरियों में आरक्षण निधारित कर दिया. अब सोनिया गाँधी ने महिला आरक्षण विधेयक के ज़रिए महिला सशक्तिकरण का बीड़ा उठाया है.

सारांश यह कि आरक्षण ही दबे- कुचले वर्गों के सशक्तिकरण का एकमात्र उपाय है.

कम से कम भारतीय राजनीति में तो आरक्षण को ही पिछड़ों के सशक्तिकरण का उपाय मान लिए गया है. दलित हों या पिछड़ी जातियां या महिला, हर पिछड़े वर्ग के लिए भारत के संविधान में आरक्षण का माध्यम चुना गया है.

यह सशक्तिकरण और सामाजिक न्याय का एक सफल माध्यम भी सिद्ध हुआ. क्योकि वह दलित हों या पिछड़े, हर आरक्षित वर्ग आरक्षरण के बाद सशक्त हुआ है. आज मायावाती आरक्षण की कृपा से ही एक ऐसे स्थान पर पहुंची जिसको वो कभी भी दलित आरक्षण के बिना नहीं प्राप्त कर सकती थीं.

मु्स्लिम आरक्षण

लालू यादव और मुलायम सिंह यादव महिला आरक्षण विधेयक का विरोध कर रहे हैं

यही बात बहुत हद तक लालू यादव और मुलाएम सिंह जैसे यादव बंधुओं पर भी सिद्ध होती है. अथार्त आरक्षण हर दबे- कुचले वर्ग के सफल सशक्तिकरण की एक सीढ़ी है.

जब आरक्षण को सशक्तिकरण का एक सफल माध्यम स्वीकार किया जा चुका है तो फिर देश के हर दबे कुचले वर्ग को आरक्षण क्यों नहीं दिया जा सकता है.

सच्चर समिति की रिपोर्ट ने मुसलमानों को हर दृष्टि से पिछड़ा और दबा कुचला स्वीकार कर लिया है.

मनमोहन सरकार ने सच्चर कमेटी की रिपोर्ट स्वीकार भी कर ली है. ऐसी स्थिती में अब मुस्लिम आरक्षण पर संकोच क्यों? अगर मुस्लिम आरक्षण की राह में कुछ संवैधानिक रोड़े हैं भी तो उनको महिला आरक्षण के समान संविधान संशोधन के जरिए हटाया जा सकता है.

महिला आरक्षण के बाद अब मुस्लिम आरक्षण मुद्दे को किसी भी तरह से बहुत समय तक टाला भी नहीं जा सकता है.

ऐसे में कहीं मोहम्मद अली जिन्ना की आत्मा को शांति तो नहीं पहुँच रही होगी, क्योंकि महिला विधेयक ने जिन्ना के मुस्लिम आरक्षण एजेंडे को इस देश में फिर से ज्वलंत कर दिया है.

वो माया हों या लालू या मुलायम, अब बहुत सारे जिन्ना की सुर में मुस्लिम कोटे का गुणगान करने लगे है.

देखिए यह महिला आरक्षण विधेयक और क्या- क्या गुल खिलाता है.

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