अरुणाचल में विकास से उपजी चुनौती

अरुणाचल प्रदेश
Image caption भारत के पूर्वोत्तर में स्थित अरुणाचल काफी खूबसूरत राज्य है

पूर्वोत्तर भारत के सुदूर राज्य अरुणाचल प्रदेश में विकास की नई लहर की शुरुआत हो चुकी है.

लेकिन इससे इलाके की पारंपरिक आदिवासी संस्कृति को नुक़सान पहुंचने और आबादी में अलगाव की भावना पैदा होने की आशंका पनप हो रही है.

पूर्वी अरुणाचल प्रदेश से यहां के सबसे पुराने कस्बे पासीघाट की तरफ चलते हुए मैं राज्य के पिछड़ेपन से पूरी तरह से वाकिफ था.

सूखी पड़ी नदियों की पथरीली राह को पार करने में काफी वक्त़ लगा. मानसून आने पर ये नदियां पानी से भर जाएंगी.

जब मैंने ड्राइवर से पूछा कि नदी का तल क्या किसी सड़क सरीखा नहीं लगता है, तो उसने कहा, ‘‘ हां, ऐसा ही है. यह राष्ट्रीय राजमार्ग 52 है.’’

स्थिति कहीं अधिक चिंताजनक बन गई जब हम दिबांग नदी की तरफ आए. नदी पानी से लबालब था. और पानी का बहाव काफी तेज था.

मैंने देखा कि छह लोग मिलकर एक चपटी चौकोर आकार की खुली नाव को खींच रहे थे. इसमें दो कारों को नदी के पार ले जाया जा रहा था. यह अचंभित कर देने वाला क्षण था.

जटिल आकार व वजन वाले इस बड़ी नाव को लकड़ी से बने दो पारंपरिक नावों को जोड़कर तैयार किया गया था. नदी पार ले जाने के लिए इसे लगातार खेने की जरूरत पड़ती है.

निश्चित तौर पर ऐसा लगा कि नावें अपना नियंत्रण खो देंगी और दो नावों को जोड़कर तैयार किया गया यह जहाज पानी में डूब जाएगा.

लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

नाविक जल्दी-जल्दी अपना सिरा बदलते और पैडल मारते. वे अपने इस काम में सिद्धहस्त लगते. और इस तरह उन्होंने जहाज को नदी पार करा लिया.

आखिर में इसे लैंडिंग प्वांइट से बांध दिया गया.

नदी पार करने के बाद मैंने बड़ी ही आशंका से देखा कि असल में जहाज से कुल तीन कारें बंधी हुईं थीं.

इसके बावजूद हमने सुरक्षित नदी पार कर लिया.

अलग-थलग राज्य

अरुणाचल प्रदेश में रेलगाड़ियां नहीं चलती हैं. हालांकि अरुणाचल एक्सप्रेस नाम की ट्रेन भी है लेकिन यह अरुणाचल प्रदेश सो होकर नहीं गुजरती है.

Image caption यह राज्य अभी भी पूरी तरह से पिछड़ा हुआ है.

लेकिन राज्य के अलग-थलग होने की वजह से यहां का जनजातीय जीवन सुरक्षित बना हुआ है.

पासीघाट में रहते हुए मैंने पाया कि भूमि संबंधी विवादों का निपटारा केबांग नामक संस्था करती है.

लेकिन विवादों को सुलझाने में केबांग की भूमिका को हमेशा ही प्रभावकारी नहीं माना जा सकता.

लेकिन शायद यह भारत की भ्रष्ट पुलिस के फेर में उलझने या कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटने से कहीं अधिक बेहतर है जहां पर वकील लोग मामले को कभी भी निपटाना नहीं चाहते. ताकि उनकी फ़ीस लगातार वसूल होती रहे.

स्थानीय प्रणाली और में राज्य में अभी भी बाहरी लोगों के दखल न होने का एक स्पष्ट फायदा है.

अरुणाचल प्रदेश में आदिवासी लोगों की जमीन का अधिग्रहण अभी तक नहीं हुआ है.

केंद्रीय भारत में बड़ी संख्या में आदिवासी लोगों को बिजली स्टेशनों और खनन कार्य जैसे विकास योजनाओं की वजह से अपनी जमीन से हाथ धोना पड़ा है.

अपनी जीविका के लिए इन लोगों को शहरों की तरफ जाना पड़ा.

इन्हें रिक्शा खींचने या मजदूरी जैसे श्रमसाध्य काम करने को मजबूर होना पड़ा है. इन कार्यों से उन्हें बड़ी मामूली आय ही नसीब हो पाती है.

अरुणाचल प्रदेश में मैंने देखा है कि पर्याप्त मात्रा में खाली जगह होती है. मकान पारंपरिक तरीके से बने होते हैं.

लोग गाय, मुर्गियां, सुअर और कुत्ते पालते हैं.

घूमने-फिरने के लिए पर्याप्त जगह होती है. गांववाले अपने पसंदीदा शिकार के लिए जंगल जाते हैं.

यहां के लोग अतिथियों का बड़ा ही आवभगत करते हैं. औऱ कभी भी शिकायत का मौका नहीं देते.

नए विकास कार्य

लेकिन अब अरुणाचल प्रदेश में विकास की रूपरेखा तैयार की गई है.

केंद्र सरकार ने यहां के पहाड़ों से होकर बहती नदियों की विशाल पनबिजली क्षमता को अब और अधिक नजरअंदाज नहीं करने का फैसला किया है.

कई बांध बनाए जाने की योजनाएं तैयार हो चुकी हैं.

इन विकास कार्यों से लोगों को अपने जमीन से हाथ धोना पड़ सकता है. विकास कार्यों में बाहर के मजदूरों की भी जरूरत होगी. ये लोग राज्य में बसने की भी कोशिश करेंगे.

एक जंगल में हवाई अड्डा बनाने की भी बात चल रही है. यह जंगल हाथियों के भ्रमण की जगह है.

राज्य में पर्यटन को बड़े उद्योग के तौर पर पहचाना गया है. पर्यटन विकास का मतलब है कि आदिवासी इलाके में बाहरी लोगों का प्रवेश.

सो, कोशिश तो यही होनी चाहिए कि इस खूबसूरत राज्य को विकास के नाम पर अपनी मौलिकता और परंपरागत संस्कृति से हाथ न धोना पड़े.

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