चिल्का झील की दशा

चिल्का झील

1993 में चिल्का झील की पुनरोद्धार शुरू किया गया था.

भारत के उड़ीसा राज्य में स्थित चिल्का झील खारे पानी की सबसे बड़ी झील है. मीठे और नमकीन पानी के मिश्रण से बनी इस झील को वर्ष 1993 में यह कहकर आर्द्रभूमियों की सूची में शामिल कर लिया गया था कि ये झील ख़तरे में हैं.

तब से चिल्का झील के पुनरोद्धार की जो कोशिशें शुरू हुई थीं वो वर्ष 2001 में तब रंग लाईं जब इसे इस सूची से हटा दिया गया लेकिन क्या चिल्का झील अब सचमुच ख़तरे से बाहर है?

चिल्का झील के पुनरोद्धार की कोशिशों का इस झील पर और इस पर निर्भर रहने वाले दो लाख से भी अधिक मछुआरों पर क्या असर पड़ा है? संदीप साहू ने हाल ही में चिल्का के कई दौरे किए और इन सवालों के जवाब ढूढ़ने की कोशिश की.

चिल्का झील के कई प्राकृतिक वैभवों में से एक हैं यहाँ पाए जाने वाले विरल इरावादी प्रजाति के डॉल्फ़िन. हाल ही में चिल्का में डॉल्फ़िनों की वार्षिक गिनती समाप्त हुई, जिसमें पाया गया की उनकी संख्या पिछले वर्ष के मुक़ाबले काफ़ी बढ़ी है.

ऐसे में यह स्वाभाविक है कि राज्य सरकार और चिल्का के पुनरोद्धार के लिए बनाए गए चिल्का विकास प्राधिकरण (सीडीए) अपनी पीठ थपथापा रहें हैं.

जिस तरह बाघ की मौजूदगी जंगल के स्वास्थ्य की सबसे बड़ी निशानी होती है, उसी तरह चिल्का के स्वास्थ्य का सबसे बड़ा प्रमाण है यहाँ डॉल्फिनों की संख्या में वृद्धि. यह बढ़ोत्तरी साबित करती है कि झील के पुनरोद्धार की कोशिश सही दिशा में चल रही हैं.

डॉक्टर अजित पटनायक, प्रभारी, सीडीए

सीडीए के मुख्य प्रभारी डॉक्टर अजित पटनायक ने बीबीसी के साथ बातचीत में कहा “जिस तरह बाघ की मौजूदगी जंगल के स्वास्थ्य की सबसे बड़ी निशानी होती है, उसी तरह चिल्का के स्वास्थ्य का सबसे बड़ा प्रमाण है यहाँ डॉल्फिनों की संख्या में वृद्धि. यह बढ़ोत्तरी साबित करती है कि झील के पुनरोद्धार की कोशिश सही दिशा में चल रही हैं."

जब उनसे पूछा गया कि क्या चिल्का में पर्यटन के विकास और उसके साथ-साथ मोटरबोट की संख्या में वृद्धि से डॉल्फिनों को ख़तरा नहीं बढ़ रहा है, तो उनका कहना था, “हम मोटरबोट चलाने वालों को वाक़ायदा ट्रेनिंग दे रहें हैं. उन्हें समझा रहे हैं कि डॉल्फिनों की सुरक्षा के लिए उन्हें क्या करना चाहिए. परिणामस्वरूप पिछले कुछ वर्षों में डॉल्फिनों कि मृत्यु संख्या काफ़ी कम हुई है.”

अलग-अलग दावे

तो क्या इस आधार पर सीडीए का दावा मान लिया जाए की चिल्का में सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा है?

चिल्का झील

क़रीब दो लाख लोगों की जीविका इसी झील से पकड़ी गई मछलियों के सहारे चलती है.

पिछले दो दशकों से पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाले भुवनेश्वर स्थित नेशनल इंस्टीच्यूट फॉर डेवेलपमेंट(एनआईडी) के निदेशक तपन पाढ़ी कहते हैं, “इसमें कोई शक नहीं है कि सीडीए ने कुछ अच्छे काम किए हैं लेकिन मुझे लगता है कि चिल्का में पर्यटन और होटल उद्योग को बढ़ावा देने के लिए इसे ख़तरे की सूची से हटाने में थोड़ी जल्दबाजी की गई. हमें यह भूलना नहीं चाहिए की दस वर्ष पहले चिल्का में पाई जाने वाली मछलियों की कई प्रजातियाँ अब विलुप्त हो चुकी है. इसी तरह पहले आने वाले कई प्रजातियों के पक्षी अब जाड़ों में यहाँ दिखाई नहीं देते हैं.”

चिल्का के पुनरोद्धार की प्रक्रिया में सीडीए की सबसे महत्वपूर्ण क़दम था - समंदर के साथ इसके टूटे हुए संपर्क को दोबारा जोड़ना. इसके लिए वर्ष 2000 में सिपकुदा गाँव के निकट एक कृत्रिम चैनल की खुदाई की गई जिससे कि चिल्का के पानी में खारापन बरक़रार रहे.

इस खुदाई के असर के बारे में सीडीए और पर्यावरणविदों की अलग-अलग राय हैं. सीडीए का दावा है कि गर्मी के दिनों में चिल्का के पानी में खारापन बिल्कुल नहीं होता था. इस खुदाई से पानी में खारापन वापस आया है जिससे कई वर्षों बाद मछलियों और दूसरे समुद्री जीवों की कुछ विरल प्रजातियाँ अब चिल्का में फिर दिखाई देने लगीं हैं.

लेकिन पर्यावरणविद मानते हैं कि चिल्का में मीठे और नमकीन पानी के संतुलन को कृत्रिम तरीक़े से बनाया नहीं जा सकता है.

कुछ लोग यह भी मानते हैं कि कृत्रिम चैनल खोले जाने से चिल्का में तूफ़ान और सुनामी का खतरा बढ़ा है.

दस साल पहले चिल्का में जितनी मछलियाँ थीं, अब उससे आधी रह गई हैं. कई प्रजातियों की मछलियाँ, जो बाज़ार में अच्छे दामों में बिकती थीं, अब बिल्कुल ग़ायब हो गईं हैं.

गांव का एक मछुआरा

हमने इस बारे में सिपकुदा मोटरबोट एसोसिएशन के अध्यक्ष हिरन्य जेना से पूछा तो उनका कहना था, “वर्ष 2000 में जब चैनल खोला गया तो हमारे मन में यह आशंका ज़रूर थी कि हमारे ऊपर तूफ़ान और सुनामी का खतरा अब बढ़ जाएगा. पहले कुछ वर्षों में हमने काफ़ी तकलीफें झेली लेकिन फिर धीरे-धीरे हमने नई स्थिति से, ऊँचे ज्वार से समझौता करना सीख लिया."

पीढ़ियों से कई गाँवों के लोग अपनी जीविका के लिए मछली पकड़ने पर निर्भर रहे हैं. अब मोटरबोट पर पर्यटकों को चिल्का की सैर करा कर अच्छा ख़ासा कम लेते हैं लेकिन अपनी जीविका के लिए अब भी केवल मछली पर निर्भर रहने वाले चिल्का के लाखों मछुआरों से बात करें तो कुछ और ही कहानी सामने आती है.

जयंतीपुर गाँव के बुज़ुर्ग मत्स्य जीबी संकर्षण बेहेरा कहते हैं, “दस साल पहले चिल्का में जितनी मछलियाँ थीं, अब उससे आधी हैं. कई प्रजातियों की मछलियाँ, जो बाज़ार में अच्छे दामों में बिकती थीं, अब बिल्कुल ग़ायब हो गईं हैं.”

गाँव में मछुआरों के बीच सीडीए की बात करने पर ही लोगों का ग़ुस्सा उबल पड़ता है. गाँव के एक युवक अरूप बेहेरा कहते हैं, “सीडीए को सिर्फ पर्यटकों और पक्षियों की चिंता है, हमारी नहीं. पक्षियों को सुरक्षा देने के चक्कर में चिल्का में अब इतनी घास हो गई हैं कि मछलियों की आबादी आधे से भी कम हो गई है. इसका नतीजा यह हुआ है कि सदियों से चिल्का और मछली पर निर्भर रहने वाले लोग अब काम की तलाश में भुवनेश्वर और दूसरे शहरों में पलायन कर कर रहे हैं.”

पर सीडीए के आंकड़ों को मानें तो पिछले दस वर्षों में मछली का उत्पादन बढ़ा है. सीडीए के मुख्य प्रभारी डॉक्टर अजित पटनायक कहते हैं, “वर्ष 2000 में जब नया चैनल खोला गया था तब मछली का उत्पादन केवल 1600 टन था, जो 2004 में बढ़ कर 14000 टन हो गया और अब लगभग 10000 टन है.

लेकिन मछुआरे ही नहीं, बहुत से अन्य लोग भी सीडीए के इन आंकड़ों को मानने के लिए तैयार नहीं हैं. चिल्का पर वर्षों से शोध कर रहे पर्यावरणविद डॉक्टर निललोहित हरिचंदन कहते हैं, “धान की खेती समाप्त होने के बाद आप चिल्का के किसी भी गाँव में जाएँ तो देखेंगे कि लगभग पूरे गाँव में कोई भी पुरुष नहीं हैं. कई गांवों में औरतें और बच्चे भी काम करने के लिए राज्य और राज्य के बाहर पलायन कर रहे हैं. अगर मछली उत्पादन बढ़ रहा है, तो ये लोग क्यों पलायन कर रहे हैं?”

आमने-सामने

जब हमने डॉक्टर हरिचंदन से वैकल्पिक जीविका के लिए लोगों को ट्रेनिंग दिए जाने के बारे में पूछा तो उनकी प्रतिक्रिया थी, “जो लोग सदियों से अपनी जीविका के लिए चिल्का और उसके पानी पर निर्भर करते आए हैं उन्हें अगर आप सिलाई, कारीगरी और दूसरे ऐसे धंधों में डालने कि कोशिश करेंगे जिनका चिल्का या उसके पानी से कोई संबंध ही न हो, तो वह नाकाम होंगी.”

सीडीए को सिर्फ पर्यटकों और पक्षियों की चिंता है, हमारी नहीं. पक्षियों को सुरक्षा देने के चक्कर में सदियों से चिल्का और मछली पर निर्भर करने वाले लोग अब काम की तलाश में भुवनेश्वर और दुसरे शहरों में पलायन कर कर रहे हैं.

अरूप बहेरा, गाँववासी

छोटे मछुआरों की सबसे बड़ी समस्या है झींगा माफिया द्वारा ग़ैर क़ानूनी ढंग से चिल्का में लगाए गए सैंकड़ों झींगा ‘घेरी’, जिनके कारण उन्हें मिलने वाली मछलियों की संख्या काफ़ी कम हो गई है.

मछुआरों और झींगा माफिया के बीच वर्षों से संघर्ष चला आ रहा है. इसी संघर्ष से वर्ष 1999 में सोरण गाँव में पुलिस को गोलियां भी चलानी पड़ी. इस गोलीबारी में पाँच मछुआरों मारे गए. इसके बावजूद ग़ैर क़ानूनी ‘घेरियों’ हटाने के लिए सरकार की तरफ़ से अभी तक कोई कारगर क़दम नहीं उठाए गए हैं.

मछुआरे आरोप लगाते हैं कि राज्य मत्स्य फ़ेडेरेशन (फिशफ़ेड) झींगा माफियाओं क़ी मदद करता है. मछुवारे अमिन बेहेरा कहते हैं, “कागज़ पर लीज़ मछुआरों की समितियों को दी जाती है लेकिन इसे झींगा माफिया हथिया लेते हैं.” अमिन ही नहीं लगभग सभी छोटे मछुआरे मांग करते हैं कि लीज़ क़ी व्यवस्था बंद होनी चाहिए.

सरकारी लापरवाही से नाराज़ लोग अब मरने-मारने पर उतारू हो गए हैं. चिल्का मत्स्यजीवी महासंघ के अध्यक्ष महादेव बेहेरा कहते हैं, “यह हमारी आख़िरी लड़ाई है. पाँच से सात लोग मारे जा चुके हैं. ज़रुरत पड़ी तो हज़ारों लोग और मरेंगे. सभी मछुआरों ने संकल्प किया है कि सब मिलकर चिल्का अभियान शुरू करेंगे. 10000 नाव लेकर हम चिल्का में घुसेंगे और पूरे चिल्का से ‘घेरी’ हटाएंगे. अब मरेंगे या मारेंगे.”

महासंघ के अध्यक्ष के इस फ़ैसले का अधिकतर मछुआरे समर्थन करते हैं. सरकार इसे कोरी धमकी समझने की ग़लती करती है तो स्थिति बेक़ाबू हो सकती है.

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