कॉर्बेट पार्क में बाघों की गिनती शुरू

बाघों को देखने वाले सैलानी
Image caption कॉर्बेट पार्क घनत्व के लिहाज़ से बाघों का सबसे बड़ा पार्क है

देश में घनत्व के लिहाज़ से सबसे बड़ा टाइगर रिज़र्व का ख़िताब पाने वाले कॉर्बेट टाइगर रिज़र्व में बाघों की गिनती शुरू हो गई है.

केंद्र ने 26 फ़रवरी को ही बाघों की गणना की इजाज़त दे दी थी. कॉर्बेट नेशनल पार्क 520.82 वर्ग किलो मीटर पर फैला हुआ है.

सोना नदी वन्य जीव अभयारण्य के 301.18 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र के साथ-साथ 466.32 वर्ग किलोमीटर आरक्षित वन क्षेत्र को कॉर्बेट टाइगर रिज़र्व में शामिल कर लिया गया है.

तीन चरणों में संपन्न होने वाली बाघ गणना का प्रथम चरण 14 मार्च से 20 मार्च तक है. इसमें बाघों की क्षेत्रवार मौजूदगी के आंकड़े जुटाए जाएँगे.

इस काम में भारतीय वन्य जीव संस्थान के वैज्ञानिक पार्क कर्मचारियों के सहयोग के अलावा उनकी इस गणना को सटीक बनाने में मदद करेंगे.

पूरे देश के बाघ अभयारण्यों में भारतीय वन्य जीव संस्थान इस काम में पार्क अधिकारियों को सहयोग दे रहा है. गणना की आधुनिक तकनीक भी भारतीय वन्य जीव संस्थान ने ही विकसित की है.

प्रथम चरण में बाघों की उपस्थिति के आँकड़ों के आधार पर बाघों के गलियारों की पहचान हो जाने पर दूसरे चरण में वन्यजीव संस्थान के विशेषज्ञों के ज़रिए इन गलियारों में चुनिंदा जगहों पर स्वचालित कैमरे लगवाए जाएंगे.

इन कैमरों की विशेषता यह होगी कि बाघ के आसपास से गुज़रते ही यह कैमरे बाघों की तस्वीर क़ैद कर लैंगे. इन फोटोग्राफ़ों को देखकर वन विभाग के अधिकारियों के ज़रिए जुटाई गई बाघों की उपस्थिति के आँकड़ों का विश्लेषण होगा और वन्य जीव संस्थान संख्या को प्रमाणित करेगा.

ऐसे वक़्त में जबकि देश में बाघों की घटती संख्या चिंता का विषय बनी हुई है, साथ ही वर्ष 2010 को बाघ वर्ष घोषित किया जा चुका है, कॉर्बेट की बाघ गणना को ख़ासा अहम माना जा रहा है.

पिछले कुछ वर्षों के दौरान पार्क में हुई बाघों की मौत से पार्क पहले ही सुर्ख़ियों में रहा है.

वर्ष 2000 से 2007 के बीच जहाँ पार्क में 13 बाघों की मौत हुई थी वहीं पिछले दो वर्षों में यहाँ 15 बाघों के मृत मिलने से देश के वन्यजीव प्रेमियों की निगाहें पहले ही यहाँ लगी हैं.

इतिहास

देश में 70 के दशक में बाघों के बचाने के लिए शुरू हुई संरक्षण परियोजनाओं में यह पहली बाघ परियोजना थी.

वर्ष 1973 में शुरू हुई देश की इस पहली बाघ परियोजना के वक़्त यहाँ 50 बाघ ही मौजूद थे. बाघ संरक्षण योजना 'प्रॉजेक्ट टाइगर' शुरू होने के बाद 1992 में यह संख्या बढ़कर 122 हो गई.

वर्ष 2005 में तो यहाँ बाघों की संख्या 141 तक पहुंच चुकी थी. 2007 में हुई बाघ गणना में 164 बाघ यहाँ मिलने से यह देश की सी सबसे बड़ी बाघ संख्या की परियोजना बन गई.

Image caption 1973 में कॉर्बेट में सिर्फ़ 44 बाघ थे जो 2007 में 164 हो गए

देश में मौजूद बाघ परियोजनाओं की सफलतम कहानी लिखने वाला यह टाइगर रिज़र्व अब तमाम कारणों के चलते एक बार फिर सुर्खियों में है.

इस बार की बाघ गणना में कॉर्बेट पार्क देश भर की परियोजनाओं में अपनी बादशाहत क़ायम रख सकेगा या नहीं, वन्य जीव प्रेमियों की निगाहें उसी पर लगी हुई हैं.

कॉर्बेट के चारों तरफ़ बन गए होटलों में वन्यजीव संरक्षण नियमों की धज्जियां उड़ाने, इसके चारों तरफ़ रात भर तेज़ प्रकाश और गाडियों के रात दिन भागने से यहाँ वन्यजीवों के लिए मुसीबत खड़ी होने की बातें कहीं जा रही है.

इन तथ्यों को इस क्षेत्र के सर्वेक्षण में भी स्थापित किया जा चुका है.

कॉर्बेट पार्क के निदेशक रंजन कुमार मिश्रा के अनुसार पार्क में बाघ गणना के लिए प्रत्येक बीट को इकाई मानते हुए फ़ील्ड वन कर्मियों की टीमें वन्यजीव संस्थान के वैज्ञानिकों के ज़रिए तैयार निर्धारित प्रपत्रों को भरने को तैनात की जा चुकी है.

इन सूचनाओं के आधार पर जंगलों के बाघ गलियारों का निर्धारण कर वहाँ स्वचालित ट्रैप कैमरे लगा दिए जाएंगे. इन स्वचालित ट्रैप कैमरों के सामने से गुज़रने वाले बाघों का चित्र इनमें स्वयं दर्ज हो जाएगा.

पार्क के निदेशक के अनुसार इस गणना से पूर्व वन कर्मियों को प्रशिक्षण देकर इस बात का ख़्याल रखा गया है कि इस काम में कहीं कोई गड़बड़ न हो.

वन्य जीव संस्थान की ओर से बाघ गणना के काम की निगरानी कर रहे भारतीय वन्यजीव संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. वाईडी झाला के अनुसार इस गणना में अपनाई जा रही डबल सैम्पलिंग के ज़रिए बाघ गणना में कमियां कम से कम रह जाएंगी.

अक्तूबर में रणथम्भौर राष्ट्रीय वन्यजीव पार्क में प्रस्तावित 'ग्लोबल टाइगर समिट' में देश के केंद्रीय वन और पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश इनके नतीजों की घोषणा करेंगे.

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