भारतीय आईटी और गुणवत्ता का सवाल

कंप्यूटर कीबोर्ड

वे चमचमाती दुनिया में भारत का चमचमाता हुआ चेहरा हैं, माँ-बाप बच्चों को उन जैसा बनाना चाहते हैं, बेटियों को उनके घर ब्याहना चाहते हैं, हर परिवार अपने घर में एक ऐसा चेहरा होने की इच्छा रखता है, वे चमचमाते भारत में कामयाबी का चेहरा हैं.

ये चेहरा है भारत के आईटी इंजीनियरों का. दुनिया भर में उनकी अपनी पहचान है, और उसकी वजह भी है.

आईटी इंजीनियरों की संख्या के हिसाब से भारत दुनिया में दूसरे नंबर का देश है, भारत से अधिक आईटी इंजीनियर केवल अमरीका में ही हैं. अमरीका में 45 से 60 लाख आईटी इंजीनियर हैं, भारत में 25 से 30 लाख.

उनके लिए अवसरों की कोई कमी नहीं, एक समय था जब अच्छी नौकरियों के लिए अमरीका-यूरोप जाना पड़ता था, पर अब तो देश में भी अवसरों की कमी नहीं रही.

मगर इस उपलब्धि, प्रतिष्ठा, ऐशो-आराम के बावजूद भारत के आईटी इंजीनियरों को उनकी अपनी ही छवि परेशान करती है – कि भारतीय आईटी इंजीनियर कुछ नया नहीं कर सकते, वे दूसरों के बनाए प्रोग्राम को चलाने में तो आगे रहते हैं, पर अपने दम पर कुछ नया करने में पिछड़ जाते हैं.

और ये प्रकट इस बात से भी हो जाता है कि सारी दुनिया में सॉफ़्टवेयर के बिज़नेस के हिसाब से भारत का हिस्सा केवल चार-पाँच प्रतिशत के आस-पास ही है.

छवि

आईटी क्षेत्र के जानकार भारतीय इंजीनियरों की इस छवि से इनकार नहीं करते मगर वे साथ ही जोड़ते हैं कि इसमें कोई असामान्य बात नहीं है.

आईआईटी कानपुर के पूर्व प्राध्यापक और अभी बंगलौर स्थित इंटरनेशनल इंस्टीच्यूट ऑफ़ इन्फ़ॉर्मेशन टेक्नोलॉजी के निदेशक प्रोफ़ेसर एस सदगोपन कहते हैं,"ये बात सही है कि आईटी प्रोडक्ट लाने के मामले में हम पीछे हैं, पर इसका एक कारण शायद ये है कि हमारे यहाँ आईटी का विकास हुए केवल 20 साल हुए हैं.

"मगर बदलाव हो रहे हैं और हो सकता है कि अगले 10 साल में भारत आईटी क्षेत्र में अपने उत्पाद भी बनाना शुरू कर दे".

भारत के इस क्षेत्र में अपेक्षाकृत रूप से नया होने की बात सिलिकन वैली के एक उद्यमी मनीष चंद्रा भी करते हैं. मनीष कोई 20 साल पहले आईआईटी कानपुर से पढ़ाई पूरी कर ऐसे समय अमरीका गए थे जब भारत में संभावनाएँ सीमित थीं.

मनीष कहते हैं,"शुरूआत ऐसे ही होती है, चाहे तकनीक हो या कोई देश, पहले नीचे से ही शुरूआत होती है".

"पहले भारतीयों को सेवा क्षेत्र में भी नीचे के ही स्तर के काम मिलते थे, आज वे सेवा क्षेत्र में चोटी पर पहुँच चुके हैं...तो ये स्वाभाविक प्रक्रिया है."

निराधार बहस

मगर कुछ जानकार ऐसे भी हैं जिन्हें लगता है कि भारत के आईटी क्षेत्र की ये छवि अपनी जगह है तो सही लेकिन इसे लेकर बहस छेड़ने का कोई कारण नहीं है.

आईआईटी कानपुर और अमरीका से पढ़े, आईआईटी दिल्ली में पढ़ा रहे और अभी प्रतिनियुक्ति पर दिल्ली स्थित इंद्रप्रस्थ इंस्टीच्यूट ऑफ़ इन्फ़ोर्मेशन टेक्नोलॉजी के निदेशक प्रोफ़ेसर पंकज जलोटे कहते हैं कि भारत के आईटी क्षेत्र की गुणवत्ता को लेकर ये सवाल बार-बार किया जाता रहा है.

प्रोफ़ेसर जलोटे कहते हैं,"बिज़नेस केवल बिज़नेस होता है, किसी कंपनी या देश को उसी क्षेत्र में काम करना चाहिए जिसमें उसका हाथ मज़बूत है, ये तो सरासर मूर्खता होगी कि आप ऐसा काम करें जिसमें आपके प्रतिद्वंद्वी का हाथ मज़बूत है.

"आज प्रख्यात बहुराष्ट्रीय कंपनी आईबीएम का आधा से अधिक कारोबार सेवा क्षेत्र से आता है, मगर उनसे तो कोई नहीं कहता कि आप माइक्रोसॉफ़्ट की तरह प्रोडक्ट क्यों नहीं बनाते."

जानकार ये ध्यान दिलाते हैं कि आज आईटी की दुनिया में अमरीका जिस मुक़ाम पर है वहाँ पहुँचने में उसे 50 साल लगे हैं, और भारत ने जो भी कुछ स्थान बनाया है वो उसकी केवल 20 साल की कोशिश का फल है - ऐसे में भारत के आईटी क्षेत्र को लेकर किसी तरह की धारणा स्थापित कर लेना, एक जल्दबाज़ी वाली प्रतिक्रिया होगी.

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