कानू सान्याल ने की 'आत्महत्या'

कानू सान्याल
Image caption कानू सान्याल नक्सली आंदोलन के संस्थापकों में से एक थे.

नक्सली आंदोलन के संस्थापकों में से एक कानू सान्याल का मंगलवार की दोपहर निधन हो गया है. पुलिस के अनुसार उन्होंने आत्महत्या की है.

हालांकि सीपीआई (एमएल) के सचिव सुब्रतो बसु ने बीबीसी संवाददाता पाणिनि आनंद को बताया कि अभी तक पार्टी की ओर से उनकी आत्महत्या की पु्ष्टि नहीं की जा सकी है.

सुब्रतो बसु ने बताया, "पार्टी महासचिव कानू सान्याल का निधन मंगलवार को दोपहर एक बजे के आसपास सिलिगुड़ी के हातीशिला स्थित पार्टी कार्यालय में हुआ. इसे आत्महत्या कहना जल्दबाज़ी होगा. हम मौके पर पहुंचने के बाद ही इसकी पूरी तरह से पुष्टि कर सकेंगे. आत्महत्या की बात पर पूरी तरह से यकीन नहीं किया जा सकता है."

उन्होंने बताया कि 81 वर्षीय सान्याल को दो वर्ष पहले माइल्ड सेरीब्रल अटैक पड़ा था और तब से वे अस्वस्थ चल रहे थे.

पार्टी की ओर से कोलकाता में जारी बयान में कहा गया है कि अस्वस्थता के बावजूद वो पार्टी की गतिविधियों में यथासंभव सक्रिय रहते थे. पार्टी ने उनके निधन को एक अपूर्णनीय क्षति बताया है.

पश्चिम बंगाल के पुलिस अधिकारी सुरजीत कर पुरकायस्थ ने बताया, ‘‘ नक्सलबाड़ी गांव में कानू का शव उनके घर में रस्सी से लटका हुआ पाया गया. यह आत्महत्या का मामला प्रतीत होता है.’’

सान्याल ने 1967 में नक्सलबाड़ी गांव से नक्सल आंदोलन की शुरुआत की थी और पहले विद्रोह में 11 किसान पुलिस की गोलियों का शिकार हुए थे.

आगे चलकर इस आंदोलन ने ज़ोर पकड़ा जो आज के नक्सली आंदोलन के रुप में जाना जाता है.

इस आंदोलन का नाम इसी गांव के नाम पर पड़ा था और इसकी शुरुआत कानू सान्याल और उनके मित्र चारु मजूमदार ने की थी. इन दोनों ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से इस्तीफ़ा देकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) का गठन किया.

माले के सशस्त्र आंदोलन ने सत्तर के दशक में पश्चिम बंगाल और पूरे भारत को को हिला कर रख दिया था.

बाद में सान्याल को गिरफ्तार किया गया और विशाखापटनम में उन्हें जेल में रखा गया. उन पर जो मामला चला उसे पार्वतीपुरम नक्सलाइट षडयंत्र के नाम से जाना जाता है.

पश्चिम बंगाल और भारत सरकार में नेतृत्व परिवर्तन के बाद 1977 में उन्हें जेल से रिहा किया गया.

पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बासु ने कानू सान्याल की रिहाई में मुख्य भूमिका निभाई थी.

ज्योति बासु मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के थे लेकिन फिर भी उन्होंने कानू को रिहा करवाया.

आगे चलकर सान्याल ने हिंसा के रास्ते की आलोचना की और ओसीसीआर यानी ऑर्गेनाइज़िंग कमिटी ऑफ कम्युनिस्ट रिवोल्यूशनरी की स्थापना की.

एक वर्ष पहले बीबीसी से बातचीत में सान्याल ने कहा था कि वो हिंसा की राजनीति का विरोध करते हैं.

उन्होंने कहा था, ‘‘ हमारे हिंसक आंदोलन का कोई फल नहीं मिला. इसका कोई औचित्य नहीं है. ’’

हालांकि नक्सलियों पर इसका कोई प्रभाव नहीं पडा और वो भारत के कई राज्यों में आज भी सशस्त्र आंदोलन में लगे हुए हैं.

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