गंगा मुद्दे पर कुंभ बहिष्कार की चेतावनी

हरिद्वार में महाकुंभ के दौरान साधु संतों के सभी 13 अखाड़ों ने सरकार को चेतावनी दी है कि अगर गंगा पर बन रही बांध परियोजनाओं को रद्द नहीं किया गया तो वे कुंभ का बहिष्कार कर देंगें.

संतों ने फ़ैसले के लिए सरकार को 27 मार्च तक का अल्टीमेटम दिया है.

विश्व हिंदू परिषद और दूसरे हिंदूवादी संगठनों सहित कई पर्यावरणवादी भी संतों के इस आंदोलन का समर्थन कर रहे हैं.

जैसे-जैसे महाकुंभ के दो शाही स्नानों की तारीखें नज़दीक आ रही हैं और सरकार और प्रशासन उनके ठीक से निपट जाने के लिए एड़ी चोटी का ज़ोर लगा रहे हैं,संतों की इस धमकी ने उनके सामने एक नया सिरदर्द पैदा कर दिया है.

संतो की सर्वोच्च संस्था अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत ज्ञानदास चेतावनी के अंदाज़ में कहते हैं,“बांध और झील बना बनाकर गंगा को रोका जा रहा है,उसकी हत्या हो रही है.उसे मुक्त करना है. सरकार को सभी परियोजनाओं को रद्द करना ही होगा.”

ये पूछे जाने पर कि अगर सरकार ऐसा नहीं करेगी तो संतों का क्या क़दम होगा,इस पर महंत ज्ञानदास कहते हैं,“हम हरिद्वार से कुंभ हटा लेंगें और सभी साधु संत हरिद्वार छोड़कर चले जाएंगें.”

महा निर्वाणी अखाड़े के सचिव महंत रविंद्रपुरीदास महाराज कहते हैं, “गंगा का प्रवाह रुक गया है. इन परियोजनाओं ने गंगा जल की शुद्धता और पवित्रता को नष्ट कर दिया है. गंगा को अविरल बहने दिया जाए.”

गंगा पर बाँध

इस समय उत्तराखंड में गंगा के उदगम गोमुख से लेकर ऋषिकेश में मैदान में उतरने तक गंगा और उसकी सहायक नदियों पर क़रीब 30 बांध बन रहे हैं.

इनमें से तीन पर पर्यावरणवादी प्रोफ़ेसर जी डी अग्रवाल के आमरण अनशन के कारण डेढ़ साल पहले रोक लगा दी गई थी.

इन रुकी हुई परियोजनाओं में से एक उत्तरकाशी की लोहारी नाग परियोजना पर 600 करोड़ रुपए खर्च भी हो चुके हैं.

प्रोफ़ेसर अग्रवाल के सहयोगी और नदी बचाओ आंदोलन के संयोजक रवि चोपड़ा संतो की इस मांग का समर्थन करते हैं.

वे कहते हैं,“हमारे शास्त्रों में लिखा है कि साधु संतों का नदियों का संरक्षण करना चाहिए,आज वे लोग आगे आए हैं ये अच्छी बात है लेकिन ये काम उन्हें पहले करना चाहिए था.”

संतो का ये आंदोलन ऐसे समय शुरू हो रहा है जब इसी विवाद पर केंद्र में गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण की बैठक भी होनी है.

इधर उत्तराखंड में सत्तारूढ़ बीजेपी भी सांसत में है.संतों की मांगें सरकार स्वीकार करती है तो निर्माण कंपनियों और ठेकेदारों का दबाव है और विपक्ष ने भी आंदोलन की धमकी दी है.

लेकिन संतों की मांगों को पूरी तरह अनदेखा भी नहीं किया जा सकता क्योंकि संत समाज सत्ताधारी बीजेपी का एक बड़ा आधार है.

राज्य के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक और पर्यटन मंत्री मदन कौशिक संतों को लगातार मनाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन संतों के तेवर अडिग नज़र आ रहे हैं.

सरकार की बेचैनी और संतो के तेवरों के बीच लगता ऐसा है कि इस मामले पर कोई बीच का रास्ता निकालना आसान नहीं होगा.

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