दुखद घटना से सुखद अंत की ओर

गुरुचरण सिंह
Image caption गुरुचरण सिंह अपने इलाक़े में बहुत से सामाजिक कार्यों से भी जु़ड़े हुए हैं

ढाबे में खाना खाना बहुत से लोगों को अच्छा लगता है. लेकिन अगर किसी ढाबे में खाना खाते हुए यह पता चले कि उस ढाबे को कंप्यूटर इंजीनियरिंग और क़ानून में पोस्ट ग्रैजुएट कर चुके दो युवक चला रहे हैं, तो और भी अच्छा लग सकता है.

आश्चर्य भी हो सकता है. जैसा कि मुझे हुआ, जब मैं धनबाद शहर के बाहर से गुज़रने वाले पुरानी जीटी रोड या राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक दो के खालसा ढाबे में पहुँचा.

गोविंदपुर के रतनपुरा में यह ढाबा 1983 में गुरुचरण सिंह ने शुरु किया था. वे इन दोनों युवकों के पिता है.

आज यह ढाबा अपनी एक पहचान बना चुका है और अब इसमें ट्रक वाले नहीं रुकते परिवार वाले रुकते हैं और इस मार्ग से कोलकाता जाने-आने वाली लगभग सभी बसें रुकती हैं.

हादसा

गुरुचरण सिंह का ढाबा चल रहा था, फल-फूल भी रहा था. लेकिन उनकी इच्छा अपने चारों बेटों को इससे दूर रखने की थी.

वे कहते हैं, “सर्विस में अलग तरह का सुकून है, अपनी ज़िंदगी है, पैसे भले ही थोड़े कम हैं. इसलिए मैं सबको पढ़ा लिखा रहा था.”

सभी पढ़ लिख रहे थे. एक इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर चुका था, दूसरा आईएएस का पहला इम्तिहान पास कर चुका था और मुख्य परीक्षा की तैयारी कर रहा था. तीसरा इंजीनियरिंग पढ़ चुका था और चौथा क़ानून की पोस्ट ग्रैजुएट डिग्री लेता हुआ पुणे ज़िला अदालत में प्रैक्टिस कर रहा था.

वर्ष 2004 में बड़े दो बेटों की एक सड़क हादसे में मौत हो गई.

इस हादसे ने सब कुछ बदल कर रखा दिया. दोनों बेटों को अपने जीवन की सारी योजनाएँ स्थगित करके ढाबे में वापस लौटना पड़ा.

कंप्यूटर इंजीनियरिंग कर चुके गुरुचरण सिंह के तीसरे बेटे कहते हैं, “मैं परिस्थियों की वजह से वापस लौटा हूँ वरना मेरा ढाबे के इस धंधे में कोई दिलचस्पी नहीं थी.”

सबसे छोटे बेटे तरणजीत कहते हैं, “मैं तो आईएएस बनना चाहता था. भैया की सलाह पर कॉमर्स के बाद इसीलिए क़ानून की पढ़ाई कर रहा था.”

बड़ी योजनाएँ

Image caption हैं तो वे कंप्यूटर इंजीनियर लेकिन ढाबे में लौटने के बाद वे इतने बदल गए कि उनके पास अपना ईमेल का पता भी नहीं

गुरुचरण सिंह की आँखें अब भी अपने दो बड़े बेटों की याद में नम हो जाती हैं. लेकिन वे इसे ऊपर वाले की मर्ज़ी बताकर वे अपने दिल को तसल्ली देते हैं.

अब जब वे लौट गए हैं तो पिता को अपने दो क़ाबिल, पढ़े लिखे बेटों के साथ होने का फ़ायदा हो रहा है.

वे अब इस ढाबे के विस्तार की योजना बना रहे हैं.

वे अपने ढाबे के ठीक बगल में एक शु्द्ध शाकाहारी भोजनालय खोलना चाहते हैं. वैष्णवी ढाबा.

तरणजीत बताते हैं, “अगर यह ढाबा चल निकला तो हम इस ढाबे की ब्रांच खोलेंगे.”

जबकि उनके बड़े भाई की योजना इससे आगे निकलने की है. वे कहते हैं, “हम चाहेंगे कि खालसा ढाबे के फ़ैंचाइज़ दें और देश विदेश में इसकी ब्रांच हों.”

तरणजीत चाहते हैं कि ढाबे के इस व्यवसाय से आगे भी निकला जाए. इसके लिए वे धनबाद में एक लॉ इंस्टिट्यूट खोलना चाहते हैं.

भाइयों की मौत से उनकी नम आँखों में वो सपने तो डूब गए जो उन्होंने पढ़ाई करते हुए देखे थे लेकिन अब वे नए सपने देख रहे हैं और उसे साकार करना चाहते हैं.

एक दुखद हादसे ने ढाबे के भविष्य को ज़रुर बदल दिया लेकिन अब वे तेज़ी से सुखद राह की ओर बढ़ रहा है.

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