मायावती-राज्यपाल में टकराव तय

उत्तर प्रदेश सरकार ने दलित महापुरुषों की प्रतिमाओं, पार्कों और अन्य विवादित स्मारकों की सुरक्षा के लिए विशेष बल की नियुक्ति प्रक्रिया शुरु करने की घोषणा की है जिससे राज्यपाल और मुख्यमंत्री मायावती के बीच टकराव पैदा होने के आसार हैं.

दरअसल इस बल के गठन से संबंधित विधेयक पहले ही विधानसभा से पारित होकर मंज़ूरी के लिए राज्यपाल बीएल जोशी के पास है. हालाँकि उन्होंने इस पर कोई फ़ैसला नहीं किया और राजभवन के सूत्रों के मुताबिक राज्यपाल ने इसे मंज़ूरी न देने का मन बना लिया है.

इसे भाँपते हुए राज्य सरकार ने इसी आशय का एक अध्यादेश भी राज्यपाल के पास भेजा हुआ है.

पता चला है कि इसमें भी वही बातें हैं जो विधेयक में हैं.

इस बीच शुक्रवार को कैबिनेट सचिव शशांक मनोहर ने बताया, हमें स्मारकों और प्रतिमाओं की रक्षा के लिए प्रशिक्षित दस्ते की ज़रूरत है. इसी के तहत कैबिनेट ने नियुक्ति शुरु करने का फ़ैसला किया है. इसमें पूर्व सुरक्षाकर्मियों से एक बटालियन बनाया जाएगा जिसमें 1200 जवान होंगे.

उन्होंने कहा कि राज्यपाल के पास लंबित अध्यादेश या विधेयक पर राज्य सरकार उनसे कोई बातचीत नहीं कर रही है.

शशांक शेखर के मुताबिक कैबिनेट में विशेष दस्ता गठन का फ़ैसला सामान्य प्रशासनिक फ़ैसला है और इसके लिए अध्यादेश लाने की ज़रूरत नहीं है.

प्रस्तावित क़ानून

प्रस्तावित कानून में इस फ़ोर्स को किसी को बिना कारण बताए गिरफ्तार करने के भी अधिकार दिए गए हैं. विपक्ष ने इस क़ानून की निंदा की थी और एक नई फ़ोर्स बनाने को गैर ज़रूरी बताया था.

राजभवन सूत्रों ने बीबीसी को बताया है कि गवर्नर ने बिल को मंज़ूरी न देने का मन बना लिया है.

संविधान के अनुसार राज्यपाल विधान मंडल का अंग है और विधेयक को मंज़ूरी देने या न देने के प्रश्न पर वह कैबिनेट की सलाह से बाध्य नहीं है. राज्यपाल जब तक चाहें बिल को अपने पास रख सकते हैं.

मुख्यमंत्री मायावती ने पिछले दिनों राज्यपाल से मुलाक़ात की थी. समझा जाता है कि दोनों के बीच इस बिल पर भी चर्चा हुई होगी.

विधेयक पर गवर्नर का रुख़ जानने के बाद अब माया सरकार ने विशेष सुरक्षा बल के लिए एक अध्यादेश तैयार करके गवर्नर के पास भेजा है.

मालूम हुआ है कि यह अध्यादेश बिलकुल वैसा ही है जैसा कि विधान सभा से पारित हुआ है.

सरकार के इस कदम का मतलब यह है कि मुख्यमंत्री मायावती विशेष सुरक्षा बल बनाने के मामले में अपना कदम वापस लेने के बजाय गवर्नर से कानूनी और राजनीतिक लड़ाई लड़ने के मूड में हैं.

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