सिंगूर या श्रीपेरमबदूर?

सिंगूर में बंद पड़ी टाटा नैनो की फ़ैक्ट्री
Image caption इन्हीं कंटीली तारों के पीछे क़ैद हैं ढेर सारे किसानों की ज़मीनें

बाप्पा बंगाल और महादेवन की उम्र लगभग एक सी है. सोच और सपने भी एक से ही हैं. दोनों ही किसान के बेटे हैं. दोनों ही ने कार इंडस्ट्री में काम करने की ट्रेनिंग ली है.

बाप्पा रहते हैं सिंगूर में, महादेवन श्रीपेरमबदूर में. दोनों के बीच का भौगोलिक फ़ासला लगभग 1700 किलोमीटर. आज की दुनिया में ज़्यादा नहीं है. लेकिन दोनों के भविष्य के बीच का फ़ासला फ़िलहाल आसमान और ज़मीन की तरह.

चार लेन हाइवे के ठीक बगल में बनी नैनो फ़ैक्ट्री के लिए बाप्पा ने खेती वाली ज़मीन दी थी. बदले में उन्हें पुणे में प्रशिक्षण मिला, नैनो में नौकरी मिली और एक सपने की शुरूआत हो रही थी जब फ़ैक्ट्री बंद कर दी गई.

बाप्पा कहते हैं जैसे किसी ने भरी हुई थाली सामने से खींच ली. "परोसी हुई थाली बुद्धदेव ने हमारे सामने रखी, ममता बनर्जी ने उसे खींच लिया. बहुत बुरा हुआ है हम लोगों के साथ."

कार के सपने

महादेवन बचपन में कन्याकुमारी के पास बसे अपने गांव में वहां से आती जाती हर कार के पीछे भागा करते थे.

आज तमिलनाडू के श्रीपेरमबदूर इलाके में चार लेन के हाइवे पर बनी ह्यूंडाई कार फ़ैक्ट्री में टेक्निशियन हैं और कार खरीदने का सपना देख रहे हैं.

"मैं बहुत जल्दी ही कार खरीदूंगा, ह्यूंडाई कंपनी की ही. दुविधा ये है कि बच्चे कह रहे हैं आई-20 खरीदो और मेरा दिल कह रहा है सैंट्रो खरीदने को."

ह्यूंडाई फ़ैक्ट्री लगभग 650 एकड़ ज़मीन पर फैली हुई है. आसपास रहनेवाले कहते हैं कुछ हिस्सा उपजाउ था, बाकी यूँ ही पड़ा हुआ था. आज इस फ़ैक्ट्री से हर दिन 2200 गाड़ियाँ निकलती हैं. साल भर में लगभग छह लाख गा़ड़ियाँ.

कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी वी रमेश कहते हैं कंपनी के अंदर लगभग दस हज़ार लोगों को नौकरियां मिली हैं. "आसपास कम से कम 121 छोटे उद्दोग पनपे हैं जो इस इंडस्ट्री को माल सप्लाई करते हैं और पूरे देश में एक लाख से ज़्यादा लोगों की नौकरियां इस कंपनी की वजह से है."

सड़कें अच्छी हैं तो कंपनी की 120 बसें 70-80 किलोमीटर दूर स्थित गांवों से टेक्निशियनों को फ़ैक्ट्री लाती हैं और उसी दिन वापस घर छोड़कर आती हैं. महीने के मात्र तीस रूपए में कंपनी में ही खाना, चाय और नाश्ता मिल जाता है.

नैनो फ़ैक्ट्री के आसपास भी लोगों ने ज़मीन खरीदी थी. कार के कल पुर्जे बनानेवाले उद्दोगों के लिए. दुकानों के लिए. ढाबों के लिए. बैंकों को किराए पर मकान देने के लिए.

Image caption हर रोज़ 2200 गाडियाँ निकलती हैं इस फ़ैक्ट्री से

बाप्पा बंगाल की भी नैनो में नौकरी लग गई थी. तब महीने के बस 1700 मिलते थे लेकिन खर्च कुछ भी नहीं होता था. "सब कुछ घर के पास था, पूरा पैसा बचता था. बाहर ऐसी ही नौकरी करूं तो एक पैसा नहीं बचेगा.”

हल या हथौड़ा

हल या हथौड़ा, खेती या उद्दोग, सिंगूर और श्रीपेरमबदूर दोनों ही जगह ये बहस का विषय है.

दोनों ही की नई पीढ़ियां कह रही हैं खेती से भला नहीं होनेवाला.

बाप्पा बंगाल कहते हैं कि आलू की खेती करें या धान की हमेशा एक अनिश्चितता बनी रहती है कि इस साल फसल ठीक हुई तो अगले साल शायद नहीं.

महादेवन कहते हैं कि कन्याकुमारी में उनके गांव का हर बच्चा बाहर निकलना चाहता है - कुछ शहरों की ओर हर रोज़ बस रही कंपनियों की ओर तो कुछ सात समंदर पार.

तमिलनाडू में चप्पे-चप्पे पर आईटीआई यानि तकनीकी प्रशिक्षण केंद्र खुल गए हैं और वहां की डिग्री युवाओं के लिए रास्ता खोल रही है - ह्यूंडाई, फ़ोर्ड, निसान, नोकिया, सैमसंग, मोटोरोला जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों में.

सिंगूर में फ़िलहाल बस खेती होती है और जिनकी ज़मीन नैनो की फ़ैक्ट्री की चारदीवारी के अंदर क़ैद है उनके लिए खेती भी नहीं है. टाटा ने फ़ैक्ट्री की ज़मीन पर अपना स्वामित्व बनाए रखा है और लीज़ की रकम भी हर साल चुका रहे हैं.

सिंगूर में ही रहनेवाले श्रीकांत कहते हैं कि अगर सरकार ने किसानों की ज़मीन लौटा भी दी तो कोई फ़ायदा नहीं क्योंकि वो अब पूरी तरह से कंक्रीट में तब्दील हो गई है, उस पर खेती नहीं हो सकती.

नैनो के ख़िलाफ़ लड़नेवालों का कहना है कि उन्होंने टाटा को वहां से भगाकर आधी लड़ाई जीत ली है. जिस दिन किसानों को उनकी ज़मीन वापस मिल जाएगी जीत पूरी हो जाएगी.

राजनेता और उद्दोगपति शायद इसे जीत और हार की तरह देखें लेकिन सिंगूर में नैनो फ़ैक्ट्री के आसपास रहनेवाले किसानों की सोच श्रीकांत के आंसू भरे शब्द बयान करते हैं.

वे कहते हैं - "सिंगूर से चला गया नैनो. मेरा खाना नज़रों के सामने कोई ले गया गुजरात में. बहुत बुरा लगता है. बच्चों को कैसे पालूंगा…"

आंसूओं ने उनके शब्दों को पूरा नहीं होने दिया.

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