दो शिकारियों के बीच फंसा आम आदमी

माओवादी हमला
Image caption माओवादियों ने दंतेवाड़ा में सुरक्षाबलों के 73 जवानों की हत्या कर दी है

'ऑपरेशन ग्रीनहंट' औपचारिक नाम हो या अनौपचारिक.. लेकिन उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में माओवादी छापामारों के ख़िलाफ़ शुरू की गई यह अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई है, जिसके तहत लाखों जवान जंगलों और बीहड़ों का चप्पा चप्पा छान रहे हैं.

पिछले छह महीने से यह अभियान ज़ोर शोर से चल रहा है. यह अभियान माओवादी प्रभावित राज्यों के उन इलाक़ों में चलाया जा रहा है जो खनिज संपदा के धनी हैं, लेकिन ये इलाक़े दुर्गम और कठिन हैं.

गृह मंत्री पी चिदंबरम भी स्वीकार करते हैं कि इन राज्यों के बहुत सारे इलाक़े ऐसे हैं जहाँ स्थानीय प्रशासन पिछले दो दशक से नहीं जा पाया है. यानी ये वो इलाक़े हैं जो पूरी तरह से माओवादियों के नियंत्रण में हैं, जहाँ इनकी सामानांतर व्यवस्था चलती है.

चिदंबरम का तर्क है कि 'ऑपरेशन ग्रीनहंट' का मकस़द उन इलाक़ों पर नियंत्रण स्थापित करना है जहाँ आजतक सरकार नहीं पहुँच पाई है.

सरकार का नियंत्रण नहीं है

मिसाल के तौर पर छत्तीसगढ़ के अबुजमाड़ के इलाक़े को ले लीजिए, जो 40 हज़ार वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है. यहाँ के अस्पताल, स्कूल और सरकारी तंत्र पर माओवादियों का क़ब्ज़ा है. छत्तीसगढ़ से लेकर महाराष्ट्र तक फैले इस इलाक़े को माओवादी मुक्ताँचल कहते हैं.

छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक विश्व रंजन का दावा है कि अभियान के दौरान मुक्तांचल के 40 फ़ीसदी इलाक़े पर अब सरकार का नियंत्रण स्थापित हो गया है. उसी तरह सरकार का दावा है कि झारखंड और इससे सटे हुए पश्चिम बंगाल के लालगढ़ के जंगलों, पहाड़ियों और बीहड़ों में भी अब सुरक्षाबलों का नियंत्रण है.

इस अभियान ने देश के कई राज्यों को युद्ध क्षेत्र में तब्दील कर दिया है. एक तरफ़ माओवादी छापामार तो दूसरी तरफ सुरक्षा बल के जवान हैं.

सुरक्षाबलों की अपनी रणनीति है तो माओवादियों का छापामार हमला. कौन किसपर हावी हो रहा है कहना मुश्किल है, लेकिन इतना ज़रूर है कि अभियान के दौरान अब तक सुरक्षाबलों को अधिक नुक़सान उठाना पड़ा है.

चाहे वो छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में मंगलवार को सुरक्षाबलों पर हुआ हमला हो, जिसमें 73 जवान मारे गए हैं या उड़ीसा के मलकानगिरी में 11 जवानों की हत्या या फिर पश्चिम बंगाल के सिलदा में सुरक्षाबलों के कैंप पर हमला. अब तक इस अभियान के बावजूद छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, झारखंड, उड़ीसा और बिहार में माओवादियों ने जो चाहा है उसे अंजाम दिया.

माओवादियों के होसले

तो सवाल उठता है कि आख़िर इन इतने बड़े अभियान के बावजूद माओवादियों के हौसले क्यों बुलंद हैं?

मंगलवार को दंतेवाडा में 75 जवानों की हत्या के बाद गृह मंत्री ने कहा कि यह घटना रणनीतिक चूक के कारण हुई. सुरक्षाबल के जवान माओवादियों के ज़रिए बिछाए गए जाल में फँस गए. पुलिस का सूचना तंत्र भी नाकाम रहा. सूचना तंत्र मज़बूत हो भी कैसे?

अभियान में तैनात अर्धसैनिक बल के जवान न तो इलाक़े की भौगोलिक स्थिति से वाक़िफ़ हैं और न ही भाषा से. इसलिए उनका काम और मुश्किल हो गया है.

दूसरा पहलू यह है कि कोई भी भूमिगत आंदोलन को बहुत दिनों तक बिना स्थानीय लोगों के समर्थन के चलाया नहीं जा सकता. लोग माओवादियों का डर से समर्थन कर रहे हैं या फिर मर्ज़ी से. लेकिन बकौल चिदंबरम, "जब एक बड़े इलाक़े में सरकार पहुँच ही नहीं पाई है तो वहां के लोग आख़िर क्या करें."

अभियान के दौरान सुरक्षाबलों ने जंगलों में आदिवासियों के प्रवेश पर रोक लगा रखी है. जबकि आदिवासी अपनी जीविका के लिए पूरी तरह से जंगल पर निर्भर हैं. जंगलों से वह पत्ते और दूसरी चीज़ों को चुराकर अपनी जीविका चलाते हैं.

माओवादियों के प्रभाव वाले इलाक़ों में घोर आभाव है. न सिंचाई की व्यवस्था, न पीने का पानी, न सड़क, न बिजली, न अस्पताल और न जीविका अर्जित करने का कोई उपाय. उसपर पुलिस एक ऐसे किरदार के रूप में उनके सामने आती रही है जो निर्दोष लोगों को माओवादी कहकर झूठे मुक़दमों में फंसाती है. ऐसे में वह पुलिस पर विश्वास करे तो करे कैसे? यह ही वजह है कि पुलिस स्थानीय लोगों का विश्वास नहीं जीत पाई है.

जनवाद से भटकाव

तीसरा सबसे अहम पहलू है बारूदी सुरंगों का. बिहार से लेकर झारखंड, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा में माओवादियों ने बारूदी सुरंगों का जाल बिछा रखा है. पिछले एक दशक के दौरान सबसे ज़्यादा सुरक्षा कर्मियों को बारूदी सुरंगों के विस्फोट में अपनी जान गंवानी पड़ी है. इससे निपटने के लिए सरकार ने बारूदी सुरंग निरोधक वाहन उपलब्ध तो कराए हैं, लेकिन माओवादियों ने अपनी तकनीक को विकसित कर लिया है और अब वह इन वाहनों को भी उड़ा रहे हैं. दंतेवाड़ा की घटना इसकी ताज़ा मिसाल है.

जहाँ तक माओवादियों का सवाल है तो वह दुर्गम इलाक़ों, घने जंगलों और पहाड़ियों का फ़ायदा उठाकर छापामार युद्ध में बीस साबित हो रहे हैं.

अभियान के बावजूद उन्होंने पूर्वी भारत के चार राज्यों और छत्तीसगढ़ में कई बड़ी घटनाओं को अंजाम दिया है. ऐसा नहीं है की उनका आधार क्षेत्र बढ़ा है. नई जनवादी क्रांति के अनुयायी अब अपनी विचारधारा से काफ़ी दूर नज़र आते हैं. जब माओवाद की नीव पड़ी थी तो यह आंदोलन उन लोगों का था जिनपर ज़मींदारों, साहूकारों और पूंजीपतियों के ज़ुल्म का एक लम्बा चक्र चला था. तब किसी के हाथ में बंदूक़ नहीं थी और जन समर्थन से ही कोई कार्रवाई की जाती थी.

1998 में सीपीआई (एमएल) पीपुल्स वार ग्रुप का विलय हुआ. 2004 में माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर और पीपुल्स वार का विलय हुआ और भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) का गठन हुआ.

इसके बाद से हथियारों का ज़ोर क़ायम हुआ. आज माओवादी जन मुद्दों से भटक कर झारखंड, छत्तीसगढ़, बिहार और पश्चिम बंगाल में स्थित कोयले और लोह की खदानों से यह संगठन बड़े पैमाने पर लेवी वसूल रहे हैं.

ऐसे कई मामले सामने आए हैं जब संगठन के कमांडर लेवी का पैसा लेकर भाग खड़े हुए. शोषित, मेहनतकश मज़दूर और किसान माओवादियों के वर्ग शत्रु नहीं रहे. लेकिन लगातार हो रही हिंसा में माओवादियों ने आम आदमी को ही अपना निशाना बनाया है. ऐसे में संगठन के पास बहुत दिनों तक आम जनता का समर्थन रहेगा, इसकी अनदेखी तो माओवादी नेता भी नहीं कर सकते हैं.

अब हो यह रहा है कि आम आदमी अभियान में दोनों पाट के बीच पिस रहा है. गाँव में घुसकर माओवादी खाना मांगते हैं. नहीं देने पर मारते पीटते हैं. खाना देने पर पुलिस माओवादी या माओवादी समर्थक कहकर झूठे मुक़दमों में फंसती है.

'ऑपरेशन ग्रीनहंट' के दौरान आम आदमी ख़ास तौर पर जंगलों में रहने वाले आदिवासियों की हालत ऐसी हो गई है जैसे दो शिकारियों के बीच फंसा शिकार.

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