ऑस्ट्रेलिया में नस्लभेद नहीं

भारतीय छात्र
Image caption भारतीय छात्रों का मानना है कि मेलबर्न जैसे हमले दुनिया के किसी भी शहर में हो सकते हैं

मेलबर्न के बारे में मैंने बहुत कुछ सुना था.

कुछ परिवारजनों और दोस्तों से जो वर्षों से ऑस्ट्रेलिया में रह रहे हैं और कुछ भारतीय मीडिया के ज़रिए.

इसलिए जब व्यक्तिगत काम के लिए मेलबर्न जाने की बारी आई तो मन में कई सवाल उठ रहे थे.

मेरी यात्रा मात्र दो दिन की थी. इसलिए मैं मेलबर्न शहर के बारे में टिप्पणी नहीं कर रही हूं.

समय का उपयोग करते हुए मैंने मेलबर्न स्थित ला ट्रोब यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे कुछ भारतीय छात्रों से बात की.

फ़िलहाल भारतीय मीडिया में मेलबर्न में भारतीयों पर हुए हमलों का मामला ठंडा है और कम से कम पिछले दो महीनों में मेलबर्न से भारतीयों के ख़िलाफ़ कथित नस्लवाद से संबंधित किसी अप्रिय घटना की खबर नही आई है.

फिर भी मेरी जिज्ञासा मुझे ला ट्रोब यूनिवर्सिटी तक ले गई.

वहां मेरी मुलाकात नीना, नितिन, नीलेश, सोनम, राज और सर्वेश से हुई जो अलग अलग पाठ्यक्रमों में पढ़ रहे हैं .

राज, सर्वेश और सोनम कुछ महीने पहले ही मेलबर्न आए हैं.

मैंने ये जानना चाहा कि भारतीय मीडिया में इतना सुनने के बाद भी उन्होंने मेलबर्न आना ठीक क्यों समझा?

सर्वेश का कहना था कि जिस तरह के हमले मेलबर्न में हुए वो दुनिया के किसी भी शहर में हो सकते हैं.

वहीं राज ने बताया कि वो कुछ छात्रों को जानते थे जो मेलबर्न में पढ़ रहे थे और उनके अनुसार मेलबर्न सुरक्षित जगह थी. इसीलिए उन्होंने मेलबर्न आने का फैसला किया.

छात्र काफ़ी मददगार

सोनम जो एक महीने पहले ही यहाँ आई हैं, यहां पर काफी सुरक्षित महसूस करती हैं.

सोनम का अभी तक का अनुभव अच्छा ही रहा है.

सोनम कहती हैं, “यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले ऑस्ट्रेलियाई और भारतीय छात्र काफी मददगार हैं. वे बता देते हैं कि कहाँ जाना चाहिए, कहाँ नहीं जाना चाहिए, क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए.”

यह तो हुई उन छात्रों की बात जो हाल ही में मेलबर्न पहुंचे हैं.

लेकिन उन छात्रों का क्या मत था जो पिछले एक-दो साल से वहां पढ़ाई कर रहे थे ?

बढ़ा-चढ़ाकर लिखा

बंगलौर से आईं नीना करीब डेढ़ साल से ला ट्रोब में पढ़ रही हैं.

उन्होंने कहा, “जब ये खबरें मीडिया में आने लगीं तो हमारे ऑस्ट्रेलियाई मित्र भी इन घटनाओं से काफी घबरा गए थे और ये मेरी सुरक्षा सुनिश्चित करने लगे. जब भी मैं पार्ट टाइम काम कर अपने हॉस्टल लौट रही होती तो कोई न कोई साथ छोड़ने ज़रूर आता.”

Image caption यह दुर्भाग्य की बात है कि कुछ भारतीयों का सामना असामाजिक तत्वों से हो गया

नीना के अनुसार ऑस्ट्रेलिया के अधिकतर लोग बहुत अच्छे हैं.

चर्चा फिर भारतीय मीडिया पर पहुंची तो नितिन का कहना था कि हमलों के बारे में सुन कर वो घबराए ज़रूर थे.

नितिन ने कहा,''ये अच्छी बात हुई कि जो पहला हमला हुआ, उसके बारे में भारतीय मीडिया ने रिपोर्टिंग की. लेकिन बाद में जिस तरह से भारतीय मीडिया ने बातें सामने रखीं, ऐसा लगा कि मीडिया बढ़ा-चढ़ाकर तथ्यों को पेश कर रहा है.''

नितिन कहते हैं, “भारतीय विदेश मंत्री ने काफी मदद की, भारत सरकार का साथ रहा लेकिन ऑस्ट्रेलिया ने भी अपनी तरफ से साथ दिया.”

नितिन मानते हैं कि इतनी बातें सामने आने के बाद अब लोग एजेंट्स के बहकावे में नहीं आएंगे और अच्छी तरह से वस्तुस्थिति की छानबीन करेंगे.

'नस्लभेद नहीं'

जहाँ तक नस्लभेद की बात है तो नितिन नहीं मानते हैं कि ऑस्ट्रेलिया में नस्लभेद है.

उनके अनुसार ऑस्ट्रेलिया एक अच्छा और शांतिपूर्ण देश है.

वहीं नीलेश भी मानते हैं कि भारतीय मीडिया ने बढ़ा-चढ़ाकर बातें पेश कीं.

बकौल नीलेश, “अगर आप सतर्क रहते हैं तो आपके साथ किसी अप्रिय घटना घटने की संभावना बहुत कम है. मेलबर्न आम तौर पर सुरक्षित है लेकिन बुरे लोग हर जगह होते हैं और यह बड़े ही दुर्भाग्य की बात है कि कुछ भारतीयों का सामना इन असामाजिक तत्वों से हो गया.”

जिन छात्रों से मैंने बात की वो भारत के अलग-अलग हिस्सों से आए थे लेकिन मेलबर्न के बारे में उन सभी का विचार था कि यह अच्छी जगह है और यहां नस्लभेद का डर नहीं है.

लेकिन हर बड़े शहर की तरह मेलबर्न में भी असामाजिक तत्व हैं, यहां भी आपराधिक घटनाएं होती हैं. इसलिए सावधानी भी ज़रूरी है.

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