ईको फ्रेंडली स्कूल

इको फ्रेंडली स्कूल
Image caption इस इको फ्रेंडली स्कूल में बच्चों को प्राकृतिक जगहों पर ले जाकर शिक्षा दी जाती है

मुंबई के पहले ईको-फ्रेंडली स्कूल का उदघाटन हो चुका है और इसकी शुरुआत जून महीने से होने वाली है.

मुंबई के एक दंपत्ति परेश और निकिता पिंपले पिछले चार साल से अपने इस मक़सद में जुटे हैं.

फिलहाल ये लोग कुछ स्कूलों के बच्चों को पर्यावरण से जुड़ी शिक्षा दे रहे हैं.

इसके तहत बच्चों को नेशनल पार्क, एलिफैंटा की गुफाएं और मरीन ड्राईव जैसी जगहों पर ले जाया जाता है और उन्हें प्रकृति के बारे में जानकारी दी जाती है.

पहला पर्यावरण स्कूल

मुंबई स्थित पश्चिमी उपनगर गोरेगाँव में मुंबई का पहला पर्यावरण अनुकूल स्कूल खुल रहा है.

इस स्कूल के संस्थापक परेश पिंपले कहते हैं, "हम पिछले चार साल से अपने प्रयास में जुटे हैं. जिस तरह से आजकल बच्चे सिर्फ कंप्यूटर और टीवी सेट्स से ही दोस्ती करते हैं, उसे देखकर बहुत बुरा लगता है. पर्यावरण के प्रति हमारी कोशिश ज़रूर कामयाब होगी."

अंग्रेजी माध्यम से शुरू होने वाले वाल्मीकि इको स्कूल में बच्चों का प्रवेश शुरू हो गया है. इस स्कूल में पर्यावरण के अनुकूल संसाधनों के उपयोग को बढ़ावा दिए जाने का प्रयास किया जाएगा.

स्कूल के बच्चे सामान्य बैग की जगह कपड़े और जूट बैग लेकर जाएंगे.

इसके अलावा स्कूल के ज़रूरत की सारी चीज़ें जैसे पानी और बिजली इको-फ्रेंडली तरीके से ही तैयार की जाएंगी. बिजली उत्पन्न करने के लिए सौर ऊर्जा और पानी के लिए वर्षा जल का उपयोग किया जाएगा.

“शून्य कचरे का लक्ष्य”

परेश कहते हैं, "स्कूल का लक्ष्य है शून्य कचरा (जीरो गारबेज़). सूखे कचरे को आगे उपयोग के लिए रिसाइकिल किया जाएगा और गीले कचरे का उपयोग खेती के लिए प्राकृतिक खाद बनाने में किया जाएगा. बिजली की बचत और हवा में ताजगी लाना और युवाओं को पर्यावरण के प्रति जागरूक करना ही हमारा लक्ष्य है."

पहले साल शुरुआत जूनियर केजी और पहली क्लास से होगी और इसकी फीस 250 रुपए महीने होगी.

इस जोड़े का मानना है कि युवा अगर शिक्षित है तो फिर उससे पूरा देश शिक्षित हो जाता है.

निकिता पिंपले कहती हैं, "आजकल हर चीज़ का दुरूपयोग हो रहा है. पहले एक कक्षा की पुस्तक कम से कम तीन से चार साल तक उपयोग की जाती थी लेकिन आज समय के अभाव या फिर नई किताब की लालच ने इस परंपरा को तोड़ दिया है. इससे प्रकृति को कितना नुक़सान हो रहा है ये किसी को ज्ञात नहीं है."

यह दंपत्ति कक्षाएं लेने के लिए छात्रों को प्रकृति और उस विषय से जुडी जगहों पर ले जाते हैं और उन्हें व्यावहारिक तौर पर विषय की जानकारी देते हैं.

इनके अनुसार छात्रों को किताबों से ज्यादा व्यावहारिक तौर पर बताने और पढ़ाने से ज्यादा समझ में आता है और वो ज़िन्दगी भर उसका ध्यान रखते हैं.

आनंददायक अनुभव

डोन बोस्को स्कूल के विज्ञान अध्यापक रिचर्ड डिसूजा इस पहल की खूब सराहना करते हैं.

बकौल डिसूजा, "इस तरह पढ़ाई में छात्रों को मज़ा भी आता है और वे जल्दी सीखते हैं. उन्हें पेड़-पौधों को नज़दीक से देखने का मौका मिलता है. नौवीं और दसवीं के छात्रों के लिए सप्ताह में दो बार पर्यावरण की कक्षा आयोजित होती है जिसमें वो खूब आनंदित होते हैं. मेरे ख़याल से हर स्कूल को पढ़ाने का यह तरीका अपनाना चाहिए. बच्चों के लिए यह पहला अनुभव है."

पिंपले दंपत्ति का कहना है, "हम बच्चों को निजी वाहनों के बदले सार्वजनिक वाहनों में जाने की सलाह देंगे."

देखना होगा कि इनकी इस पहल का असर कितनी दूर तक दिखाई देता है.

संबंधित समाचार