क्यों मिला कांग्रेस को माया का साथ?

Image caption कई विश्लेषकों का कहना है कि इस साथ के पीछे कोई गुप्त समझौता है.

बहुजन समाज पार्टी ने कांग्रेस से कटुतापूर्ण रिश्तों के बावजूद संसद में केंद्र सरकार को समर्थन जारी रखने का फैसला करके कई लोगों को चौंका दिया.

पहले पार्टी अध्यक्ष मायावती ने एक प्रेस कांफ्रेंस में मंहगाई और बेरोजगारी जैसे मुद्दों को लेकर कांग्रेस को जमकर कोसा और उसकी आर्थिक नीतियों में बदलाव की मांग की.

मगर अंत में उन्होंने यही कहा, ''ऎसी स्थिति में सही मायने में हमारी पार्टी को कटौती प्रस्ताव को लेकर केंद्र सरकार के खिलाफ वोट देना चाहिए था, लेकिन बसपा नही चाहती कि केंद्र में इन मुद्दों की आड़ में सांप्रदायिक ताक़तें फिर से सता में वापस आ जाएँ. इसलिए बसपा संसद में भारतीय जनता पार्टी के कटौती पास्ताव का विरोध करेगी.''

एक पत्रकार ने सवाल किया कि क्या अपने खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले में सीबीआई जांच के चलते उन्होंने यह निर्णय किया है?

मायावती ने जवाब दिया कि यह मामला कांग्रेस सरकार ने नहीं बल्कि भाजपा सरकार के समय में दर्ज हुआ था. दूसरे उन्होंने याद दिलाया कि पिछले लोक सभा चुनाव के बाद ही उनकी पार्टी ने कांग्रेस को बाहर से बिना शर्त समर्थन दिया था. और समर्थन जारी है.

मायावती ने भले ही यह सफाई दी कि केंद्र सरकार को उनके समर्थन जारी रखने का सीबीआई जांच से संबंध नही है, लेकिन ज़्यादातर राजनीतिक प्रेक्षक मानते हैं कि इस मामले पर दोनों पार्टियों के बीच कोई गुप्त समझौता हुआ है.

याद दिला दें कि इससे पहले राष्ट्रपति चुनाव में बसपा ने कांग्रेस का साथ दिया था और उस समय गवर्नर ने सीबीआई को मायावती पर ताज कॉरिडोर मामले में मुक़दमा चलाने की अनुमति देने से इनकार कर दिया था.

दोहरी मजबूरी

इलाहाबाद स्थित गोविंद वल्लभ सामाजिक विज्ञान संस्थान में दलित मामलों के विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर बद्री नारायण का कहना है कि मायावती की दोहरी मजबूरी है.

एक मजबूरी यह कि भ्रष्टाचार के मामलों में सीबीआई जांच के चलते वह केंद्र सरकार को नाराज़ नही करना चाहतीं. दूसरी यह कि हिंदुत्ववादी ताक़तें यानि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ इस समय उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में दलितों को अपने साथ जोड़ने का ज़बरदस्त अभियान चला रहा है.

प्रोफ़ेसर बद्री नारायण का कहना है क़ि दरअसल कांग्रेस नेता राहुल गांधी का अभियान बहुत सतही है और मायावती को असल चुनौती भाजपा और उसकी हिंदुत्ववादी सहयोगी ताकतों से है.

मगर मायावती की राजनीति पर नजर रखने वाले यह जानते हैं कि बसपा उत्तर प्रदेश में तीन बार भाजपा से मिलकर सरकार बना चुकी है. गुजरात में मायावती मोदी के पक्ष में चुनाव प्रचार कर चुकी हैं.

पिछली लोक सभा में परमाणु क़रार मुद्दे पर कांग्रेस सरकार गिराने के लिए मायावती ने इस उम्मीद में भाजपा से हाथ मिला लिया था कि शायद प्रधानमंत्री बनने का मौक़ा मिल जाए.

मगर उसके बाद लोक सभा चुनाव में बहुत खराब प्रदर्शन के कारण मायावती को मालूम है क़ि अगर कांग्रेस सरकार गिरती है, तो भी उसका लाभ उन्हें नहीं बल्कि भाजपा को मिलेगा.

इसलिए मायावती बेवजह इस समय भारतीय जनता पार्टी के साथ खड़ी होकर मुस्लिम समुदाय को नाराज़ नही करना चाहेंगी, जबकि उत्तर प्रदेश में अगले विधान सभा चुनाव के लिए रणनीति बननी शुरू हो गई है.

संबंधित समाचार