लड़ाई बराबरी के हक़ की है

दलित महिलाएं
Image caption मिर्चपुर की दलित महिलाओं ने मुख्यमंत्री के विरोध में नारे भी लगाए.

हरियाणा के मिर्चपुर गांव में जाटों के ग़ुस्से का शिकार बना दलित समुदाय अब इस गांव में रहना नहीं चाहता है.

दलित समुदाय की मांग है कि उन्हें गांव से कहीं दूर बसाया जाए लेकिन राज्य सरकार ने यह मांग मानने से इनकार कर दिया है.

दीपक की बहन और उनके पिता की इस घटना में मौत हो गई थी. दीपक की मां अपनी बेटी और पति को याद करते हुए कहती हैं कि वो अब मिर्चपुर गांव नहीं जाना चाहती हैं.

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वो कहती हैं, ‘‘ मैं पेट से भी खाली और सिर से भी खाली हो गई. मैं उस खूनी गांव में नहीं जाना चाहती. मुझे पाकिस्तान भेज दो लेकिन उस गांव में नहीं रहूंगी.’’

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जाटों के कोपभाजन बने ग़रीब दलित समुदाय के लगभग हर व्यक्ति की यही मांग है कि उन्हें अलग ज़मीन देकर कहीं और बसाया जाए.

परवीन की दुकान भी पिछले हफ्ते की आग में स्वाहा हो गई थी. वो कहते हैं, '' मैंने पाई-पाई जोड़कर दुकान बनाई थी. ये हमेशा हमें तंग करते हैं. पहले तो सुलह हो जाती थी लेकिन इस बार पुलिस ने कुछ नहीं किया तो जाटों ने हमारे घर जला दिए.''

गांव की एक महिला मीनाक्षी कहती हैं, ‘‘जाट लोग शराब पीकर हमारी बहू-बेटियों को छेड़ते हैं. तंग करते हैं. अब तो हद हो गई. लड़कियां जलाई जा रही हैं. हमें इस गांव से बाहर कहीं जगह दे दो.’’

मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा ने जब एक हफ्ते के बाद गांव का दौरा किया तो लोगों ने यही मांग रखी जिसे उन्होंने मानने से इंकार कर दिया.

राज्य सरकार ने मृतक परिवार को दस लाख रुपए और नौकरी देने जबकि प्रभावित परिवारों को भी मुआवज़े की घोषणा की है. कई लोगों ने मुख्यमंत्री की मौजूदगी में ही विरोध में नारे लगाए.

Image caption परवीन अपाहिज हैं और आगज़नी में उनकी दुकान जल गई.

हालांकि दलित समुदाय के ही कुछ अन्य लोग गांव छोड़ना नहीं चाहते थे. इस बारे में पूछे जाने पर स्थानीय नेता गजय सिंह ने कारण स्पष्ट किया, ‘‘ जो लोग बाहर काम करते हैं गांव में नहीं रहते वो चाहते हैं कि यहां चौकी बन जाए. वो संपन्न भी हैं लेकिन जो ग़रीब है और जिनकी रोज़ीरोटी इसी गांव के आसपास है वो इस गांव में नहीं रहना चाहता है.’’

लड़ाई बराबरी की

हरियाणा में ऊंची और नीची जाति की लड़ाई नई नहीं है. पिछले दस वर्षों में दलितों के ख़िलाफ़ हमलों के सौ रजिस्टर्ड मामले हैं जिसमें दुलीना और गोहाना कांड लोगों को अब भी याद है.

हरियाणा में जाटों और दलितों के बीच वैमनस्य पुराना है और इसके पीछे दलित विकास और सामाजिक बराबरी की एक लंबी कहानी है.

हरियाणा के दलितों में से वाल्मीकि समुदाय सबसे निम्न वर्ग का कार्य किया करते थे लेकिन आज़ादी के दौरान वो महात्मा गांधी से जुड़े और उन्होंने शिक्षा का महत्व समझा.

मिर्चपुर गांव के एक युवा वीरेंद्र कहते हैं, '' हमारे पास सबकुछ है. पैसा है, शिक्षा है. हम किसी से कम नहीं है. ये बात जाटों को हजम नहीं हो रही है. राज्य में सरकार जाटों की है हमें इस सरकार से उम्मीद नहीं है. हमें केंद्र सरकार से मदद चाहिए.''

दलित मामलों की अच्छी जानकारी रखने वाले चंद्रभान प्रसाद कहते हैं, ‘‘ये वो समुदाय है जो पखाना इत्यादि साफ करने का काम करते थे. लेकिन हरियाणा में दलितों का

विकास हुआ है. ये दलित चुपचाप हर बात को चुपचाप सहने को तैयार नहीं है. वो पढ़ा लिखा है. अत्यंत ग़रीब भी नहीं है. वो लड़ने को तैयार है.’’

यानी कि ये लड़ाई जातिगत कम और बराबरी की लड़ाई अधिक है. चंद्रभान कहते हैं, ‘‘आर्थिक सुधारों के बाद दलितों में आर्थिक उन्नति हुई है. इसके बाद अब वो सामाजिक उन्नति चाहते हैं जिसे हरियाणा का जाट या उच्च जाति समुदाय मानने को तैयार नहीं है. इसी कारण मिर्चपुर में आप देखेंगे कि दलितों के पास आर्थिक संपन्नता के जो निशान थे उन पर हमला हुआ है. ’’

हरियाणा में जाटों की संख्या अधिक है और दलितों की कम लेकिन आज वो हर स्तर पर जाटों या उच्च जाति के बराबर आ खड़े हुए हैं. वो गांवों में हर वो काम करने को तैयार है और सक्षम हैं जो पहले जाट किया करते थे. सामाजिक जागरुकता के साथ उनमें राजनीतिक जागरुकता भी आई है.

नई लड़ाई

राजनीतिक विश्लेषक महेश रंगराजन कहते हैं, ‘‘हरियाणा का दलित बिहार के दलित से अलग है. वो ग़रीब नहीं है.वो संपन्न है. एक बात जो गौर करने लायक है वो ये कि आर्थिक संपन्नता आपको समाज में बराबरी का स्तर नहीं दे सकती है. ज़रुरी नहीं कि एक दलित वकील, डॉक्टर या इंजीनियर को समाज वही महत्व दे जो किसी उच्च जाति के वकील को देता हो. ये एक नई लड़ाई है जो आर्थिक संपन्नता से आगे की है.’’

भारत की आज़ादी को साठ से अधिक साल बीत गए हैं. ऐसे में दलितों के ख़िलाफ़ अपराध कम हुए हैं और एक हद तक विकास भी हुआ है लेकिन देखा जाए तो उन्हें सामाजिक बराबरी अभी भी नहीं मिली है.

हां ये ज़रुर है कि दलित समुदाय ने अब सामाजिक बराबरी के लिए कमर कस ली है.

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