अस्पताल, ज़िंदगी और कफ़न

पीएमसीएच का गेट
Image caption पीएमसीएच के गेट पर दाह संस्कार के लिए ज़रूरी सामान की दुकानें.

वह दिन भर रोटी की तलाश में मौत की आस लगाए रहते हैं. उनकी आँखें हर उन चेहरों को पढ़ने की कोशिश करती है, जो पटना मेडिकल कॉलेज ऐंड हॉस्पिटल यानि पीएमसीएच परिसर में स्थित कफ़न और पचाठी वाली उनकी दुकानों से हो कर गुज़रते हैं.

हर शाम उनके चेहरे पर तब सुकून नज़र आता है जब कम से कम छह से सात मरीज़ों की मौत के बाद उनके दाह संस्कार के लिए आवश्यक सामग्री बेच कर वह पैसे कमाते हैं.

पीएमसीएच बिहार का सबसे बड़ा अस्पताल है जहाँ प्रति दिन दो हज़ार से अधिक रोगी इलाज़ के लिए आते हैं. इस अस्पताल में प्रतिदिन दर्जनों मरीज़ो की मौत हो जाती है.

बिहार के कोने-कोने और पड़ोसी देश नेपाल से आए इन मरीज़ों में कुछ ऐसे भी होते हैं जिनके रिश्तेदार उनकी मौत के बाद लाश को अपने घर ले जाने के बजाय पवित्र गंगा के घाट पर ही अंतिम संस्कार कर देते हैं. इसलिए उनके लिए आसानी से अस्पताल परिसर में ही अंतिम यात्रा के लिए आवश्यक सामग्री का मिल जाना सुविधाजनक होता है.

सुरेश कुमार का परिवार पिछले 25 वर्षों से पीएमसीएच के मेन गेट पर पचाठी और कफ़न समेत अन्य सामग्री बेचता है. वे मानते हैं कि मौत से जूझ रहे लोगों के लिए पचाठी और कफ़न जैसी चीज़ों को देख कर ज़िंदगी की आस के बजाए मौत की सच्चाइयों से रू-ब-रू होना उन्हें निराश करता होगा.

उनका कहना हैं, “यह तो ज़िंदगी की सच्चाई है, मौत तो आनी ही है और अगर हम उनके लिए सारी चीज़ें अस्पताल के निकट ही सुलभ करा देते हैं तो उनके रिश्तेदारों को इससे काफ़ी सुविधा होती है”.

सुरेश के अलावा गोपाल प्रसाद ने भी अपनी दुकान फुटपाथ पर लगा रखी है. वह कहते हैं, "मैं अपनी आत्मा की सच्ची आवाज़ आपको बताता हूँ, हम कभी यह दुआ नहीं करते कि भगवान यहाँ आए रोगियों को मौत दे. हम तो चाहते हैं कि वह स्वस्थ हो कर लौटें लेकिन यह भी सच्चाई है कि जिस किसी दिन हमारी पचाठी नहीं बिकती उस दिन हमें चिंता होती है कि आज हमारे घर में चूल्हा कैसे जलेगा?”

डोम जाति से ताल्लुक रखने वाले सुरेश मानते हैं कि ज़्यादातर दुकानें अस्पताल परिसर में अनाधिकृत रूप से चलती है. इसलिए तमाम दुकानदार डरे-सहमे रहते हैं.

इतना ही नहीं ये लोग मीडिया के लोगों से भी डरते हैं. कारण पूछे जाने पर बताते हैं कि उनलोगों को हमेशा डर लगा रहता हैं कि अख़बार में अवैध रूप से चल रही इन दूकानों की तस्वीर न छप जाए. जिससे हमारा रोजी-रोटी छिन सकता है.

दूसरी तरफ अस्पताल प्रशासन को हमेशा उनकी ज़रूरत भी रहती है. पोस्टमार्टम के बाद लावारिश लाशों को जब कोईपूछने वाला नहीं होता तो यही लोग अस्पताल और पुलिस प्रशासन का काम आसान करते हैं.

चाचा की अंतिम इच्छा

Image caption एक ही जगह सभी सामान मिलने से लोगों को काफ़ी सुविधा होती है.

गुड्डू कुमार सीवान से अपने चाचा का इलाज कराने पटना आए थे, लेकिन अफ़सोस उनके चाचा की मौत हो गई. अपने चाचा के अंतिम संस्कार के लिए गुड्डू ने 500 रुपए में पचाठी, कफ़न और रस्सी खरीदा है.

गुड्डू बताते हैं, “जब मेरे चाचा इलाज के लिए पटना आ रहे थे तो उन्होंने अपनी इच्छा जताई थी कि अगर उनकी मौत हो जाए तो उनका अंतिम संस्कार गंगा नदी के तट पर स्थित बाँसघाट पर कर दिया जाए.”

उनकी अंतिम इच्छा पूरा करने के लिए जो ज़रूरी सामान उन्हें चाहिए उसकी एक ही जगह उपलब्धता के बारे में गुड्डू कहते हैं, “अस्पताल के निकट ही हमें अंतिम संस्कार के लिए सभी ज़रूरी चीज़ें मिल गईं है, इससे हमें काफ़ी सुविधा हुई.”

इसके उलट पीएमसीएच के अधिकारियों के लिए अस्पताल के निकट ही ऐसी दुकानों का होना काफ़ी दुविधापूर्ण है. उन्हें पचाठी और कफ़न जैसी चीज़ों को खुलाआम देख कर मरीजों के ऊपर पड़ने वाले मनोवैज्ञानिक कुप्रभाव की चिंता रहती है.

पीएमसीएच के अधीक्षक डॉक्टर ओपी चौधरी कहते हैं, “निश्चित तौर पर ज़िंदगी की उम्मीद लिए अस्पताल में आने वाले मरीज़ों को पचाठी और कफ़न जैसी चीज़ें देख कर हताशा होती है.”

जो भी हो, डॉक्टरों को भी इन दुकानों से होने वाली सुविधा का अहसास है.

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