'पंडितों बिना अधूरा कश्मीर'

कश्मीरी विस्थापित
Image caption कश्मीर की नई पीढ़ी ने पंडितों को नहीं देखा है

भारत प्रशासित जम्मू कश्मीर में अलगाववादी हिंसा के दौर में पलायन कर चुके तीन लाख से ज़्यादा कश्मीरी पंडितों को पुनर्स्थापित करने के लिए राज्य और केंद्रीय सरकार ने कोशिशें शुरु कर दी है.

राज्य सरकार ने इस दिशा में अगले दो महीनों में तीन हज़ार भर्तियां करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है.

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने वर्ष 2008 में इन विस्थापितों के कश्मीर घाटी में पुनर्वास के लिए 24 हज़ार करोड़ रूपए के पैकेज की घोषणा की थी. इस योजना के तहत अब इन विस्थापित नौजवानों को घाटी में नौकरियां दी जाएगी.

राज्य सरकार ने घोषणा की थी कि विस्थापितों को घाटी में 15 हज़ार नौकरियां दी जाएंगी और यह प्रधानमंत्री के पैकेज के अंतर्गत होंगी.

विस्थापितों का विभाग देख रहे राज्य के राजस्व मंत्री रमण भल्ला कहते है, "कई कश्मीरी विस्थापित नौजवान इन नौकरियों के लिए अपनी मर्ज़ी से आगे आए हैं. यह जानते हुए कि उन्हें वापिस आना है."

उन्होंने यह भी कहा, "वो भी जानते हैं कि कश्मीर उनके बिना अधूरा है, तो यही एक रास्ता निकल पाया है. इन बच्चों को जब कश्मीर में रोज़गार मिलेगा तो उनके परवार वाले भी यहां आ जा सकेंगे."

कठोर नियम

लेकिन इन नौकरियों के साथ सरकार ने एक शर्त रखी हैं. शर्त है कि चुने गए लोगों को लिखित रूप में देना होगा कि वो घाटी में ही नौकरी करेंगे, किसी सूरत में भी वहाँ से वापस नहीं जाएंगे और स्थानांतरण की मांग भी नहीं करेंगे.

इस तरह के नियमों को कश्मीरी पंडित "कठोर नियम" मानते हैं.

कश्मीरी पंडितों की बिरादरी के नेता डॉक्टर अग्निशेखर कहते हैं, "ऐसे नियम कहीं भी नहीं होते जो सरकार ने कश्मीरी पंडितों के लिए रखे हैं. चाहे कुछ भी हो यह लोग उस जगह को नहीं छोड़ेंगे. वहां (घाटी में) अभी हालात सुरक्षित नहीं हैं."

सरकार का कहना है कि इन नौकरियों के लिए विस्थापित नौजवानों में काफी जोश है. एक प्रत्याशी अंशू कौल नौकरी पाने को उत्साहित हैं. "यही एक रास्ता है कि हम वापिस जा पाएंगे."

परंतु अधिकतर प्रत्याशी इसे जोश नहीं "मजबूरी" मानते हैं.

अध्यापक पद के लिए आवेदन कर चुके दीपक रैना कहते है, "आप इसे जोश नहीं कह सकते... जोश तब होता है जब कोई काम अपनी मर्ज़ी से किया जाए. यह तो नौकरी लेने के लिए मजबूरी है."

जब बीबीसी ने उनसे पूछा कि उत्साह नहीं है तो इन 3 हज़ार नौकरियों के लिए 16 हज़ार से अधिक अर्जियाँ कैसे आई हैं, तो उनका उत्तर था, "हमें उम्मीद है कि शायद यह शर्त और बांड लिखवाने का प्रावधान वापस हो जाए."

हालात सही नहीं

Image caption राजस्व मंत्री रमण भल्ला कहते हैं कि वापस आने वालों को पूरी सुरक्षा दी जाएगी

कुछ गिने चुने लोगों को छोड़ इन सभी की राय है कि अब भी हालात कश्मीर घाटी में वापिस जाने के लिए सही नहीं है. हालात सही होते तो कश्मीरी पंडित खुद वापिस जाने का क़दम उठाते.

वो कहते हैं, ‘‘आए दिन ब्लास्ट हो रहे हैं, ग्रेनेड फट रहे हैं, हिंसा हो रही है. मुश्किल तो बहुत होगी, पर मजबूरी है हर तरफ़ से."

सरकार का मानना है कि इस क़दम से विस्थपितों की घाटी में वापसी हो सकती है, परंतु यहां के कुछ प्रत्याशी और बिरादरी के नेता इससे विपरीत राय रखते हैं.

अग्निशेखर कहते हैं, "हमें नहीं लगता कि ऐसी नौकरी देने से विस्थापन की समस्या ख़त्म हो जाएगी. वैसे भी विस्थापन को इस रोज़गार पैकेज के साथ जोड़ कर नहीं देखना चाहिए.’’

वहीं सरकार विस्थापितों को पूर्ण सुरक्षा का आश्वासन भी दे रही है. राजस्व मंत्री रमण भल्ला कहते है, "नौकरियां लेने वाले नौजवानों और उनके परिवारवालों को हम हर संभव सुरक्षा देंगे."

जम्मू विश्वविद्यालय की प्रोफ़ेसर रेखा चौधरी भी आकलन करती हैं कि ऐसी नौकरियां देने का मक़सद ये है कि कश्मीर घाटी में पंडितों को वापिस लाया जाए क्योंकि वहां उनकी उपस्थिति बहुत महत्वपूर्ण है.

वो कहती हैं, "पिछले वर्षों में कश्मीर में एक ऐसी पीढ़ी आई जिसने वहां पंडित देखे ही नहीं. उन लोगों को दूसरे धर्म और दूसरी संस्कृति के बारे में पता ही नहीं. कश्मीरी पंडित का वहां होना उस कश्मीरियत, जो वहां कि एक पहचान थी, उसके लिए ज़रूरी है. कुछ लोग अब भी हैं जो ये मानते है कि कश्मीर पंडितों के बिना अधूरा है."

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