पाकिस्तान में एनआरओ की सुनवाई

Image caption पाकिस्तान में सुप्रीम कोर्ट ने 2009 में एनआरओ को अवैध क़रार दिया था.

पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट में संविधान के 18वें संशोधन और नेशनल रिकंसिलिएशन आर्डिनेंस या एनआरओ के मुक़दमों की सुनवाई सोमवार से शुरू होगी.

इस मौक़े पर सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम किए गए हैं. सुप्रीम कोर्ट इन मामलों में दिए गए अपने पूर्व के फ़ैसलों की समीक्षा के आवेदनों पर सुनवाई करेगा.

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री सैयद यूसुफ़ रज़ा गिलानी ने कहा है कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश जस्टिस इफ़्तेख़ार मोहम्मद चौधरी को फ़ोन करके ये बताया है कि सरकार न्यायपालिका का सम्मान करती है.

सुप्रीम कोर्ट की तरफ़ से शनिवार को जारी एक बयान में कहा गया है कि इस्लामाबाद के पुलिस कमिश्नर ने सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार से मुलाक़ात की जिसमें उन्होंने बताया कि अगले सप्ताह होने वाली सुनवाईयों के लिए सुरक्षा के पुख़्ता इंतज़ाम कर लिए गए है.

भारी संख्या में पुलिस बल और रेंजर्स के साथ साथ काफ़ी तादाद में मजिस्ट्रेटों की भी तैनाती की गई है.

इसके अलावा लोगों पर नज़र रखने के लिए स्पेशल कैमरे भी लगाए गए हैं.

Image caption पूर्व राष्ट्रपति मुशर्रफ़ ने इस अध्यादेश के तहत कई नेताओं और अधिकारियों को माफ़ी दी थी

सुप्रीम कोर्ट में सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम ऐसे समय में किए जा रहे हैं जब स्थानीय सूत्रों से ख़बरें आ रहीं थीं कि 18वें संशोधन और नेशनल रिकंसिलिएशन आर्डिनेंस या एनआरओ के मुक़दमों की सुनवाई के दौरान पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के समर्थक वकील अदालत के अंदर और बाहर भारी संख्या में जमा होंगे.

लेकिन इसी दौरान प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी ने शनिवार को लाहौर में एक कार्यक्रम के बाद पत्रकारों से बातचीत में कहा कि उन्होंने मुख्य न्यायाधीश को फ़ोन करके कहा है कि सरकार न्यायपालिका और मुख्य न्यायाधीश का सम्मान करती है.

लाहौर से बीबीसी संवाददाता एबादुल हक़ ने बताया कि प्रधानमंत्री ने साफ तौर पर कहा है कि उन्होंने पीपीपी के समर्थक वकीलों से कहा है कि अदालत में सुनवाई के दौरान वो अदालत में ना जाएं और सिर्फ़ कुछ मंत्री ही इस दौरान अदालत में रहें.

गिलानी ने कहा कि अगर वहां कोई अप्रिय घटना होती है तो ये बिल्कुल भी सरकार के हक़ में नहीं होगा और सरकार किसी को भी ऐसा मौक़ा नहीं देना चाहती है.

याद रहे कि सुप्रीम कोर्ट के पांच सदस्यीय बेंच ने एनआरओ के बारे में अदालती फ़ैसलों पर किए गए आवेदनों पर सुनवाई करते हुए क़ानून मंत्री को मंगलवार के दिन अदालत में तलब किया है.

प्रधानमंत्री ने आगे कहा कि स्विटज़रलैंड में चल रहे मामलों के बारे में संविधान के अनुसार कार्रवाई की जाएगी और सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन किया जाएगा.

उन्होंने जनवरी में राष्ट्रीय असेंबली में बयान दिया था कि सरकार राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी के ख़िलाफ़ दोबारा स्विस मुक़दमों को नहीं खोल सकती है, क्योंकि राष्ट्रपति होने के नाते ज़रदारी को संवैधानिक छूट हासिल है.

पाकिस्तान की एक अदालत ने इस विवादास्पद अध्यादेश को दिसंबर 2009 में अवैध क़रार दिया था जिसके तहत वहां के कई राजनेताओं और वरिष्ठ अधिकारियों के ख़िलाफ़ दर्ज भ्रष्टाचार के मामले खत्म हो गए थे.

एनआरओ की पृष्ठभूमि

Image caption प्रधानमंत्री यूसूफ़ रज़ा गिलानी ने कहा है कि अदालत में कोई अप्रिय घटना होती है तो वो सरकार के हक़ में नहीं है.

इस अध्यादेश के तहत वर्ष 2007 में तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज़ मुशरर्फ़ ने कई नेताओं और अधिकारियों को आम माफ़ी दी थी. 90 के दशक के दौरान इन लोगों पर कई तरह के आरोप लगे थे.

नैशनल रिकंसिलिएशन आर्डिनेंस या एनआरओ के नाम से प्रचलित इस क़ानून का लाभ उठाने वालों में राष्ट्रपति आसिफ अली ज़रदारी, गृह मंत्री रहमान मलिक, कई अन्य मंत्री, वरिष्ट नेता और सरकारी कर्मचारी शामिल हैं.

राष्ट्रपति बनने से पहले ज़रदारी कई सालों तक जेल में थे और उन पर भ्रष्ट्राचार के कई आरोप लगे थे.

हालांकि ज़रदारी का कहना है कि ये आरोप राजनीति से प्रेरित थे.

इसी माफ़ीनामे को बेनज़ीर भुट्टो और परवेज़ मुशर्रफ़ के बीच सत्ता को लेकर हुए समझौते का आधार माना जाता है जिसके बाद बेनज़ीर पाकिस्तान लौटी थी लेकिन बेनज़ीर भुट्टो की दिसंबर 2007 में हत्या कर दी गई थी.

ये बात 2009 में ही सामने आई थी कि आठ हज़ार से ज़्यादा राजनेताओं और अधिकारियों को माफ़ीनामे से फ़ायदा हुआ है.

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