करगिल के कमांडर ने लिखी ग़लत रिपोर्ट

करगिल यु्द्ध (फ़ाइल फ़ोटो)

करगिल युद्ध क़रीब 80 दिनों तक चला था

वर्ष 1999 में हुए कारगिल युद्ध के सैन्य नेतृत्व पर गंभीर सवाल उठाते हुए आर्म्ड फ़ोर्स ट्राइब्यूनल ने पूर्व लेफ़्टिनेंट जनरल को अपने मातहत एक अधिकारी के बारे में ग़लत रिपोर्ट लिखने का दोषी पाया है.

ट्राइब्यूनल ने पाया कि कारगिल युद्ध के समय लेफ़्टिनेंट जनरल किशन पाल ने बटालिक सेक्टर में 70 इंफ़्रेंट्री ब्रिगेड का नेतृत्व कर रहे ब्रिगेडियर देवेंद्र सिंह की उपलब्धियों को कम करके दिखाया.

इस रिपोर्ट की वजह से ब्रिगेडियर देवेंद्र सिंह न केवल अपनी बहादुरी के लिए मेडल पाने से वंचित रह गए बल्कि उन्हें पदोन्नति भी नहीं मिली.

अब ट्राइब्यूनल ने आदेश दिए हैं कि सेवानिवृत्त हो चुके ब्रिगेडियर देवेंद्र सिंह के रिकॉर्ड सुधारते हुए उन्हें प्रतीकात्मक पदोन्नति दी जाए और कारगिल युद्ध के इतिहास को फिर से लिखा जाए.

इस फ़ैसले के बाद ब्रिगेडियर देवेंद्र सिंह ने कहा है, "मैं सही साबित हुआ."

ब्रिगेडियर सिंह ने दिल्ली हाईकोर्ट में इस मामले को लेकर याचिका दायर की थी लेकिन रक्षामंत्री एके एंटनी ने जब आर्म्ड फ़ोर्ड ट्राइब्यूनल का गठन किया तो यह मामला हाईकोर्ट से ट्राइब्यूनल भेज दिया गया.

मामला

करगिल युद्ध (फ़ाइल फ़ोटो)

ब्रिगेडियर देवेंद्र सिंह ने बटालिक सेक्टर से सबसे पहली बार पाकिस्तानी घुसपैठ होने की आशंका व्यक्त की थी लेकिन कथित रुप से लेफ़्टिनेंट जनरल किशन पाल ने उनको अनदेखा कर दिया.

करगिल युद्ध के बाद कुछ समय तक ब्रिगेडियर सिंह की बहादुरी के क़िस्से सुनाए जाते रहे. सेना ने अधिकृत रुप से उनकी तारीफ़ की. सेना की ओर से कहा गया कि 'हालांकि वे घायल हो गए थे लेकिन उन्होंने अपनी जान की परवाह किए बग़ैर दुश्मन से मुक़ाबला किया'.

लेकिन बाद में लेफ़्टिनेंट जनरल किशन पाल ने जो रिपोर्ट लिखी उसमें ब्रिगेडियर सिंह की उपलब्धियों को छोटा करके बताया गया, जिसका परिणाम यह हुआ कि उनका नाम महावीर चक्र के लिए भेजा गया था लेकिन उन्हें मिला सिर्फ़ विशिष्ट सेवा मैडल. इसके अलावा मेजर जनरल के रूप में उनकी पदोन्नति भी नहीं हो सकी.

बुधवार को दिए गए अपने फ़ैसले में जस्टिस एके माथुर और लेफ़्टिनेंट जनरल नायडू ने कहा है, "लेफ़्टिनेट जनरल पाल की रिपोर्ट पर भरोसा नहीं किया जा सकता."

उन्होंने कहा है कि किशन पाल ने वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (एसीआर) भी तटस्थ भाव से नहीं लिखी.

देरी

ब्रिगेडियर देवेंद्र सिंह ने अपने ख़िलाफ़ हो रहे इस अन्याय की शिकायत वर्ष 2000 में ही कर दी थी, लेकिन दो साल बाद सेना ने उनकी शिकायतों को ख़ारिज कर दिया था.

साधारण शिकायत से लेकर वैधानिक शिकायत और क़ानूनी नोटिस से लेकर कई याचिकाओं के बाद यह फ़ैसला हो सका है

ब्रिगेडियर देवेंद्र सिंह

वर्ष 2004 में हालांकि सेना ने करगिल युद्ध में ब्रिगेडियर सिंह के प्रदर्शन पर लेफ़्टिनेंट जनरल पाल की रिपोर्ट को भी ख़ारिज कर दिया लेकिन सेना ने ब्रिगेडियर सिंह की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (एसीआर) में तब्दीली से इनकार कर दिया.

इसके बाद वर्ष 2006 में उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया. दिल्ली हाईकोर्ट की उनकी याचिका को ही आर्म्ड फ़ोर्स ट्राइब्यूनल में स्थानांतरित किया गया था. जिस पर यह फ़ैसला आया है.

समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार इस फ़ैसले के बाद ब्रिगेडियर देवेंद्र सिंह ने कहा, "साधारण शिकायत से लेकर वैधानिक शिकायत और क़ानूनी नोटिस से लेकर कई याचिकाओं के बाद यह फ़ैसला हो सका है."

उन्होंने कहा, "ट्राइब्यूनल के फ़ैसले के अनुसार अब मुझे मेजर जनरल के पद पर प्रतीकात्मक पदोन्नति मिल सकेगी और करगिल युद्ध में मेरे ब्रिगेड की बहादुरी के रिकॉर्ड भी सही तरह से दर्ज हो सकेंगे."

लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि इस फ़ैसले के बाद भी ब्रिगेडियर सिंह को लंबी यात्रा तय करनी है. अभी उन्हें सेना मुख्यालय का दरवाज़ा खटखटाना होगा, जो यह तय करेगा कि प्रतीकात्मक पदोन्नति देनी है या नहीं.

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