नेपाल में संवैधानिक संकट

माओवादी नेता प्रचंड
Image caption सरकार परिवर्तन की मांग को लेकर प्रचंड के नेतृत्व में पिछले दिनों देशव्यापी प्रदर्शन भी हुए थे

नेपाल एक संवैधानिक संकट की ओर बढ़ रहा है.

शुक्रवार को मौजूदा संसद अथवा संविधान सभा का कार्यकाल ख़त्म हो रहा है लेकिन अभी तक संविधान नहीं लिखा जा सका है.

संविधान लिखने की आख़िरी तारीख़ आगे बढ़ाने को लेकर अगर अंतिम समय में राजनीतिक दलों के बीच कोई समझौता नहीं होता है तो नेपाल का आंतरिक संविधान भी रद्द हो जाएगा.

दस साल तक सरकार और माओवादियों के बीच चली हिंसा की समाप्ति के बाद 2008 में मौजूदा संसद या संविधान सभा का गठन किया गया था जिसका मुख्य उद्देश्य दो साल के अंदर नेपाल के लिए नया संविधान लिखना था लेकिन इस काम में संविधान सभा पूरी तरह असफल रही.

संविधान सभा के चुनाव के लिए हुए चुनावों में सबसे बड़े दल के रूप में उभरने के बाद माओवादियों के नेतृत्व में एक सरकार का गठन हुआ था लेकिन पिछले साल सेनाध्यक्ष को हटाने के मुद्दे पर वे सरकार से हट गए थे.

तीन मुख्य पार्टियाँ पिछले कई सप्ताह से बातचीत कर रहीं हैं लेकिन कोई भी दल किसी समझौते के लिए तैयार नहीं दिखता.

गुरूवार को राष्ट्रपति राम बरन यादव ने एक आपातकालीन बैठक बुलाई थी लेकिन वहां कोई नतीजा नहीं निकल सका.

सरकार चाहती है कि मौजूदा संसद के कार्यकाल को छह महीने के लिए बढ़ा दिया जाए ताकि संविधान लिखने का काम पूरा किया जा सके लेकिन प्रमुख विपक्षी दल कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ नेपाल (माओवादी) ने इस प्रस्ताव को ठुकराते हूए कहा कि किसी भी समझौते पर पहुंचने के लिए ज़रूरी है कि मौजूदा प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल पहले इस्तीफ़ा दें और संसद में सबसे बड़े दल होने के नाते माओवादियों के नेतृत्व में एक राष्ट्रीय सरकार का गठन किया जाए.

चिंता

संसद की मियाद बढ़ाने के लिए मतदान होने से ठीक पहले संयुक्त राष्ट्रसंघ महासचिव बान की मून ने नेपाल की तमाम राजनीतिक पार्टियों से अनुरोध किया है कि वे राष्ट्र हित को सबसे ऊपर रखें.

बान की मून ने कहा कि संविधान सभा का गठन और नेपाल के लिए नए संविधान को लागू किए जाने के सिलसिले में आज तक उनके ज़रिए किए गए काम शांति प्रक्रिया के तहत एक महत्वपूर्ण और बड़ी मुश्किल से हासिल की गई सफ़लता को दर्शाते हैं.

नेपाल के अख़बार आशंका जता रहे हैं कि किसी समझौते तक नहीं पहुंचने की सूरत में सिर्फ़ चार साल के बाद देश एक दफ़ा फिर हिंसक संघर्ष का शिकार हो जाएगा.

शुक्रवार को नेपाली अख़बार न्याय पत्रिका ने अपने संपादकीय में लिखा कि इसकी बहुत अधिक संभावना है कि ये दिन देश के इतिहास में सबसे ख़राब दिन साबित हो.

सत्तारूढ़ 22 दलों के गठबंधन एकीकृत मार्क्सवादी लेनिनवादी पार्टी के चेयरमैन झालनाथ खनाल ने शुक्रवार की सुबह पार्टी के वरिष्ट नेताओं से मिलने के बाद कहा कि लागों की आज़ादी बचाने के लिए सारे विकल्प खुले हुए हैं.

विश्लेषकों का मानना है कि सकता है कि अंत में माओवादी संसद की समयसीमा बढ़ाने के लिए तैयार हो जाएँ लेकिन इसका अर्थ होगा नेपाल में एक और सत्ता परिवर्तन जिसने पिछले दस सालों में दस सरकारों को देखा है.

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