ममता की दोहरी रणनीति!

ममता बनर्जी
Image caption नंदीग्राम और सिंगूर में ममता को माओवादियों से मदद मिली

ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) के बीच जब-जब खींचतान बढ़ी है, माओवादियों ने ममता का ही पक्ष लिया है.

नंदीग्राम और सिंगूर में सीपीएम के रेड ब्रिगेड के ख़िलाफ़ जब तृणमूल कांग्रेस ने संघर्ष किया था, वहां पर सीपीएम को रोकने के लिए तृणमूल कांग्रेस के पास न तो मज़बूत संगठन था और न ही वहाँ उनका कोई प्रभाव था. उनको माओवादियों से बाक़ायदा मदद मिली.

बंगाल में जहां-जहां माओवादी फैले हैं, उस इलाक़े में सीपीएम की हालत ख़राब हुई है.

जिस इलाक़े में ट्रेन का इतना बड़ा हादसा हुआ, वो जंगलमहल का इलाक़ा है. इस इलाक़े की सीमा झारखंड से जुड़ी है. यहां पर सीपीएम का क़रीब-क़रीब सफ़ाया हो गया है. हालांकि यहां पहले हुए चुनावों में सीपीएम का प्रदर्शन काफ़ी अच्छा था.

आपसी समझ की राजनीति?

राज्य में जहां-जहां सीपीएम का सफ़ाया होता है, वहां ममता बनर्जी फ़ायदे में रहती हैं.

ममता बनर्जी और माओवादियों के बीच अगर सांठगांठ नहीं तो कम से कम एक आपसी समझ तो है ही.

पश्चिम बंगाल में जो भी घटना घटती है, उसका दोष वे सत्ताधारी सीपीएम पर ही मढ़ देती हैं. ममता की राजनीति का यही तरीक़ा रहा है. इससे उनकी राजनीति आगे बढ़ती है और उनको राजनीतिक फ़ायदा मिलता है.

ममता बनर्जी का दल एक क्षेत्रीय दल है. असल में, वे अपने राजनैतिक भविष्य को ध्यान में रखकर ही काम कर रही हैं.

कांग्रेस के साथ दोहरा व्यवहार

पश्चिम बंगाल और केंद्र में कांग्रेस के साथ ममता का दोहरा व्यवहार उनकी दीर्घकालिक रणनीति पर आधारित है.

वह अभी भी कहती रही हैं कि जब तक कि उनको यूपीए से निकाल नहीं दिया जाता, वे यूपीए में बनी रहेंगी.

वह एक तरफ़ तो सीपीएम का सफ़ाया करना चाहती हैं लेकिन साथ ही वो क्षेत्रीय राजनीति में कांग्रेस को भी हाशिए पर रखना चाहती हैं.

इसीलिए पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के अध्यक्ष प्रणव मुखर्जी और कांग्रेस की राज्य इकाई के साथ ममता की तनातनी बनी रहेगी.

संबंधित समाचार