महिलाओं का कारवां

महिलाओं का कारवां

कारवां में शामिल महिलाएं अपने लिए देश में एक जागृति पैदा कर रही हैं

संसद और दूसरे निकायों में 33 फ़ीसदी आरक्षण की मांग को लेकर महिला संगठनों का एक कारवां देश भर में घूम रहा है.

महिला आरक्षण एक्सप्रेस नाम से औरतों का समूह तीन हिस्सों में बंटकर पन्द्रह हजार किलोमीटर का सफ़र तय करेगा और फिर दिल्ली में दाखिल होगा.

इस कारवां में शामिल महिलाओं का कहना है कि वो अपने लिए देश में एक जागृति पैदा कर रही हैं ताकि आरक्षण की राह रोक रही ताकतों पर दबाव बने.

यह कारवां गत बीस मई को उत्तर प्रदेश के झांसी से तीन अलग-अलग दिशाओं में देश को नापने निकला और भारत के कोई छप्पन शहर और कस्बों से गुजरता हुआ आगामी छह जून को दिल्ली में कदम रखेगा.

राजस्थान से पहले ये कारवां गुजरात के विभिन्न इलाकों में गया और गांव-देहात की औरतों से बात की.

अभियान से जुड़ी शबनम हाश्मी ने बीबीसी से कहा, “ये यात्रा उन लोगों को एक माकूल जवाब है जो महिला आरक्षण को कभी जाति के नाम पर और कभी धर्म के बहाने रोकना चाहते हैं.”

हाश्मी कहती हैं, ''हम जहाँ भी गए, महिलाएं इस मांग के पक्ष में खड़ी मिलीं. हम चाहते हैं कि संसद जल्द ही आरक्षण पर अपनी मुहर लगाए. फिर देश की विभिन्न विधान सभाएं भी इसे पारित करें.”

एकजुट हुई महिलाएं

इस कारवां में ज्यादातर महिलाएं या तो वामपंथी रुझान की थीं या फिर कांग्रेस पक्ष की. मगर भाजपा से जुड़ी महिला कार्यकर्ता भी इसकी हिमायत करने पहुंचीं.

मेरी बेटी को उसके शौहर ने छोड़ दूसरा निकाह कर लिया, उसके दो छोटे छोटे बच्चे हैं. अगर औरतें संसद में ठीक तादाद में पहुंचेंगी तो उन्हें ऐसे सितम से निजात मिलेगी.

आबिदा, महिला आरक्षण एक्सप्रेस में शामिल महिला

जयपुर से मेयर का चुनाव लड़ चुकी भाजपा की सुमन शर्मा कहती हैं, “ये किसी ख़ास पार्टी की बात नहीं है. इस मुद्दे पर तमाम महिलाएं एक साथ हैं.”

ये औरतों का कारवां था. लिहाजा आबिदा जैसी मुस्लिम महिलाएं भी पहुंचीं जिन्हें लगता है कि अगर औरतें संसद में पहुंचीं तो उन महिलाओं को न्याय मिलेगा जिन्हें या तो उनके शौहर ने छोड़ दिया है या फिर तलाक उनकी जिन्दगी का हिस्सा बना दिया गया.

बकौल आबिदा, “मेरी बेटी को उसके शौहर ने छोड़ दूसरा निकाह कर लिया, उसके दो छोटे छोटे बच्चे हैं. अगर औरतें संसद में ठीक तादाद में पहुंचेंगी तो उन्हें ऐसे सितम से निजात मिलेगी.”

कामयाबी के किस्से

इस कारवां के साथ गुजरात से चलीं मानसी शर्मा कहती हैं, “हम जहाँ-जहाँ भी गए, औरतों को कही सरपंच के रूप में और कहीं प्रधान के बतौर काम करते देखा. उनकी कामयाबी के किस्से सुने और देखे. यह बताता है कि अगर महिलाओं को मौका मिले तो वो भी पुरुषों के मुकाबिल काम कर सकती हैं. मुझे इस यात्रा से लगा कि अब महिला को बिरादरी और मजहब के नाम पर बाँट कर रोका नहीं जा सकता.”

इन महिलाओं ने इतिहास के एक अहम किरदार रानी लक्ष्मी बाई को अपनी हक़-ए-बुलंदी का प्रतीक माना और इसीलिए अपनी यात्रा को झांसी से रवाना किया. अब वे ऐसे भू भाग से गुजर रही हैं जहाँ इज्जत के नाम पर औरत को मारे जाने की घटनाएं हाल में सामने आईं हैं.

इनका कारवां तो निकल पड़ा है लेकिन न जाने बराबरी का दर्जा पाने के लिए अभी उन्हें कितना और चलना पड़ेगा ?

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