अफ़ीम की खेती पर ऊहापोह

अफ़ीम
Image caption राजस्थान के कुछ इलाकों में अफ़ीम की खेती पर रोक लगाने की मांग हो रही है

राजस्थान में अफ़ीम की पैदावार बढ़ रही है लेकिन राज्य में इस पर पाबंदी की मांग भी उठने लगी है.

इस साल 337 मीट्रिक टन अफ़ीम की पैदावार हुई है. यह पैदावार पिछले साल से ज्यादा है.

यहां पर अफ़ीम काश्तकारों की संख्या और खेती का रकबा भी बढ़ा है. लेकिन राज्य के मरुस्थली भू-भाग में इसकी खेती पर पाबंदी की आवाज उठ रही है.

इन इलाकों में अफ़ीम सेवन की परम्परा रही है. अफ़ीम उत्पादक दक्षिणी और दक्षिण पूर्वी राजस्थान में राजनैतिक कार्यकर्ता पाबंदी की इस मांग से सहमत नहीं हैं.

राजस्थान के सात जिलों में अफ़ीम की खेती होती है जिसके लिए भारत सरकार अपनी शर्तों पर किसानों को अफ़ीम की खेती के पट्टे देती है.

मादक पदार्थ नियंत्रण विभाग के उपायुक्त जेपी चंदेलिया ने बीबीसी को बताया कि इस साल राजस्थान में 337 मीट्रिक टन अफ़ीम पैदा हुई है. गत वर्ष 211 मिट्रिक टन अफ़ीम पैदा हुई थी.

इस बार 27,300 किसानों को अफ़ीम की खेती के लाइसेंस दिए गए थे जबकि गत वर्ष अफ़ीम की खेती के सत्रह हजार पट्टे जारी किए गए थे.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस बार राज्य में 5700 हेक्टेयर क्षेत्रफल में अफ़ीम की खेती की गई जबकि पिछले साल अफ़ीम की खेती का रकबा 3595 हेक्टयर था. अफ़ीम की खेती सरकार की निगरानी में की जाती है.

जेपी चंदेलिया का कहना है, “पैदा की गई अफ़ीम कड़ी सुरक्षा में गाजीपुर और नीमछ की सरकारी फैक्टरियों में पहुंचाई जाती है. अगर कोई किसान अफीम की खेती की शर्तों का उल्लंघन करता हुआ पाया जाता है तो उसका पट्टा रद्दकर उसे खेती से वंचित कर दिया जाता है.”

सरकार हर साल अफ़ीम की खेती की समीक्षा करती है और उसी हिसाब से खेती के लाइसेंस जारी करती है.

अफ़ीम खेती की वैधता

दुनिया में भारत अफ़ीम की इस तरह वैध खेती करने वाला अकेला देश है. क्योंकि उसने संयुक्त राष्ट्र संघ के 1961 में नारकोटिक्स पर बने चार्टर पर दस्तखत किए हैं, इसी से उसे खेती का अधिकार मिला है. ये अफ़ीम जीवन रक्षक दवाएं बनाने के काम में ली जाती हैं.

राज्य के रेगिस्तानी हिस्से में अफ़ीम की कभी खेती नहीं होती लेकिन रियासत काल से वहां अफ़ीम सेवन कुछ सामाजिक परम्पराओं का ऐसा हिस्सा बना कि तमाम कानूनी उपायों के बावजूद वहां इसके सेवन के उदाहरण मिल जाते हैं.

राज्य सभा के नामित सदस्य रहे नारायण सिंह माणकलाव ने अफ़ीम मुक्ति पर थार रेगिस्तान में बड़ा काम किया है. वो स्वीकार करते हैं कि मरुस्थली भू-भाग में अफ़ीम का सेवन अब भी जारी है.

ताकतवर लॉबी

माणकलाव का कहना है, “इस पर पूरी तरह पाबंदी लगनी चाहिए या फिर सरकार खुद अफ़ीम की खेती करे ताकि अफ़ीम लोगों तक नहीं पहुंचे. लेकिन अफ़ीम किसानों की लॉबी बहुत ताकतवर है और कोई तीस से ज्यादा विधान सभा क्षेत्रों में उनका डंका बजता है, इसलिए कोई नहीं सुनता है.”

माणकलाव ने वर्ष 1987 में पश्चिमी राजस्थान में अफ़ीम मुक्ति का अभियान शुरू किया था. उनके मुताबिक उनकी संस्था अब तक कोई डेढ़ लाख लोगों को इसकी लत से मुक्ति दिला चुकी है. मगर समस्या अब भी बनी हुई है.

स्थानीय लोगों के मुताबिक, पश्चिमी राजस्थान में शादी-विवाह और समारोह में अफ़ीम परोसने की परम्परा सदियों पुरानी है. यह परम्परा अभी भी जारी है.

अब कुछ स्थानों में वोटों का फैसला भी अफ़ीम की जाजम पर होता है.

माणकलाव कहते हैं कि न केवल रेगिस्तानी क्षेत्र में बल्कि अब अफ़ीम उत्पादक इलाकों में भी कई लोग नशीले पदार्थों के लती होकर जीवन बर्बाद कर रहे हैं.

राज्य का चितोरगढ़ जिला एक प्रमुख अफ़ीम उत्पादक इलाका है.

दोषपूर्ण सरकारी नीति

वहां से सांसद रहे श्रीचंद कृपलानी कहते हैं, “अगर अफ़ीम का कहीं गलत उपयोग हो रहा है तो सरकार उस पर कार्यवाही करे. मगर उसकी खेती पर रोक लगाने का सुझाव ठीक नहीं है. हम चाहते हैं कि सरकार अफ़ीम पैदावार के दाम बढ़ाए, जो पट्टे रद्द किए गए हैं, उन्हें बहाल किया जाए.”

कृपलानी का कहना है, “सरकार की अफ़ीम खेती की नीति दोषपूर्ण है. अफ़ीम दवा के लिए जरूरी है. उसकी खेती पर पाबंदी से हम सहमत नहीं है.”

यह बात सही है कि अफ़ीम की खेती से राज्य के कुछ जिलों में समृद्धि आई है. किसी के लिए ये काला सोना है तो बीमारी से लड़ रहे लोगों के लिए अफ़ीम से बनी दवा एक बड़ा सहारा है.

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