एक करोड़ 55 लाख रूपए की बोली

दरगाह
Image caption प्रसाद बांटने की ये परंपरा कोई 400 वर्षों से बदस्तूर जारी है

भारत में अजमेर स्थित महान सूफी संत ख़्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में बनने वाले प्रसाद के ठेके की बोली इस बार एक करोड़ 55 लाख रूपए से ज्यादा की लगी है.

ये अब तक की सबसे बड़ी बोली है और इसे लगानेवाले चढ़ावे से अपनी कमाई करते हैं.

इस प्रसाद को सालाना उर्स के दौरान बड़ी और छोटी देग़ में पौष्टिक पदार्थों से तैयार किया जाता है.

इन देग़ों में से एक को मुग़ल बादशाह अकबर ने ख़्वाजा की शान में भेंट किया था जबकि दूसरी देग़ बादशाह जहांगीर ने श्रद्धा में भेंट की थी.

तभी से ही इन विशाल देगों में श्रद्धालुओं के लिए प्रसाद बनता आ रहा है. इस बार उर्स नौ जून से शुरू हो रहा है.

दरगाह में इन देग़ों को ठेका देने का काम ख़ादिमों की संस्था अंजुमन के हाथों किया जाता है.

सदियों से चली आ रही परंपरा

अंजुमन के सदर ग़ुलाम किबरिया ने बीबीसी को बताया कि ये ठेका उर्स और उसके बाद 25 दिन के लिए दिया गया है.

इस दौरान ज़ियारत के लिए आने वाले श्रद्धालु ख़्वाजा के प्रति अपनी अगाध आस्था से वशीभूत होकर देग़ में प्रसाद पकवाते हैं जिसे ख़्वाजा के दरबार में चढ़ाया जाता है और बाद में श्रद्धालुओं में बांटा जाता है. ये काम सदियों से चल रहा है.

दरगाह के एक ख़ादिम सरवर चिश्ती ने बीबीसी को बताया, “इन देग़ों में चावल, मैदा, चीनी, घी-मेवे और ज़ाफ़रान को मिलाकर प्रसाद पकाया जाता है. बड़ी देग़ में कोई 120 मन और छोटी देग़ में 60 मन सामग्री पकाई जाती है.”

ये कई हज़ार लोगों में ख़्वाजा के श्रद्धालुओं में प्रसाद के तौर पर बांटी जाती है.

चिश्ती बताते हैं कि ये सिलसिला कोई 400 वर्षों से बदस्तूर जारी है. विभिन्न धातुओं से बनी ये दोनों देग़ दरगाह में श्रद्धालुओं के लिए सदा तैयार रहती हैं.

ये गोलाकार देग़ इतनी ऊँची और बड़ी हैं कि इनमें पकवान बनाने के लिए लोग सीढ़ी के जरिए अंदर उतरते हैं. इन देग़ों ने सदियों तक ज़ायरीनों की श्रद्धा के मुताबिक़ अपनी सेवाएं दी हैं.

इसके साथ ही दरगाह में लंगरख़ाने के क़रीब ही एक बड़ी कड़ाह है जिसमें हर दिन कोई 130 किलो दलिया बना कर बांटी जाती है.

भाईचारे का पैग़ाम

दरगाह के नाज़िम अहमद रज़ा ने बीबीसी को बताया, “ये परंपरा अकबर-ऐ-आज़म के दौर से चली आ रही है. अकबर की इतनी गहरी आस्था थी कि वो ख़्वाजा के दर पर पैदल चल कर अजमेर आते थे.”

ख़्वाजा के अक़ीदतमंदों में हर मज़हब, जाति बिरादरी के लोग होते हैं.

इनमें बड़ी संख्या में हिंदू श्रद्धालु भी मौजूद होते हैं शायद इसीलिए इन देग़ों में पकने वाला प्रसाद शाकाहारी होता है क्योंकि ख़्वाजा साहिब ने धार्मिक भाईचारे और अमन का पैगाम दिया था.

ख़्वाजा के प्रति श्रद्धा न तो किसी मज़हब तक महदूद रही और न ही किसी मुल्क की सरहदों तक. इसीलिए हर धर्म, जाति और मुल्क के लोग ख़्वाजा की चौखट पर शीश नवाते हैं और मोहब्बत और भाईचारे का संदेश लेकर लौट जाते हैं.

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