तलाक़ को आसान बनाने का प्रयास

फ़ाइल फ़ोटो
Image caption नए प्रावधान से तलाक़ के लिए दोनों पक्षों की सहमति आवश्यक नहीं रह जाएगी

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने हिंदू विवाह अधिनियम में संशोधन करते हुए तलाक़ के मौजूदा प्रावधानों में एक और प्रावधान जोड़ने का फ़ैसला किया है. यह प्रावधान है - 'विवाह को बचाने की गुंजाइश न बची हो.'

यानी यदि विवाह के किसी मामले में कोई एक पक्ष अदालत में यह साबित कर सके कि अब विवाह को बचाया नहीं जा सकता तो इस आधार पर तलाक़ मिल सकता है.

कहा जा रहा है कि इससे तलाक़ लेना कुछ आसाना हो जाएगा.

लेकिन महिलाओं से जुड़े मसलों पर नज़र रखने वाली वक़ील कामिनी जायसवाल का कहना है कि यह संशोधन भारत बहुसंख्या महिलाओं के पक्ष में नहीं हैं और इससे तलाक़ का मामला एकतरफ़ा हो जाएगा.

तलाक़ के मामले में संशोधन का फ़ैसला ऐसे समय में आया है जब आंकड़े बता रहे हैं कि भारत में तलाक़ के मामले बढ़ रहे हैं.

संशोधन

सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फ़ैसले में पिछले साल कहा था कि न्याय व्यवस्था को यह प्रयास करना चाहिए कि विवाह किसी तरह से बच सके लेकिन जब यह बिल्कुल न चल रहा हो तो संबंध विच्छेद को या तलाक़ को बहुत समय तक नहीं रोकना चाहिए.

विधि आयोग ने भी सुझाव दिया था कि हिंदू विवाह अधिनियम में संशोधन किया जाना चाहिए.

इसके बाद क़ानून मंत्रालय ने इसके लिए हिंदू विवाह अधिनियम 1955 और विशेष विवाह अधिनियम 1954 में संशोधन का प्रस्ताव सरकार के समक्ष रखा था.

इस प्रस्ताव पर विचार करने के बाद मंत्रिमंडल ने इसे मंज़ूरी दे दी है.

इस संशोधन के तहत वैवाहिक संबंध विच्छेद करने के लिए मौजूदा प्रावधानों में एक नया प्रावधान जो़ड़ने का फ़ैसला किया गया है.

इस नए प्रावधान के तहत यदि अदालत में यह साबित किया जा सके कि 'इस विवाह को बचाने की कोई गुंजाइश नहीं रही' तो तलाक़ मिल सकेगा.

इस संशोधन की विशेषता यह है कि यदि संबंध विच्छेद करने वाले दोनों पक्ष में से एक भी यदि यह साबित कर दे तो तलाक़ मिल सकेगा.

इस फ़ैसले के बारे में जानकारी देते हुए कहा, "इस प्रावधान से उन दंपतियों को आसानी हो जाएगी जो आपसी सहमति से तलाक़ के लिए अर्ज़ी देते हैं. यह ऐसे लोगों को भी परेशानी से छुटकारा दिलवाएगा तो दूसरे पक्ष के अदालत में पेश न होने से लंबे समय तक फँसे रहते हैं."

इस समय तलाक़ के जो प्रावधान हैं उनमें, विवाहेतर संबंध, क्रूरता, साथी को अकेला छोड़ देना, धर्म परिवर्तन, पागलपन, कुष्ठ रोग, संक्रमित होने वाले यौन रोग, संन्यास ले लेना और सात साल से किसी तरह का संपर्क न होना शामिल है.

यह नया प्रावधान इन प्रावधानों के अतिरिक्त होगा.

'महिलाओं के पक्ष में नहीं'

सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वकील कामिनी जायसवाल ने बीबीसी से हुई बातचीत में कहा कि यह प्रावधान उन शहरी महिलाओं के लिए तो ठीक है जो आर्थिक रुप से आत्मनिर्भर हैं लेकिन यह उन ग्रामीण महिलाओं के लिए ठीक नहीं है जो आत्मनिर्भर नहीं हैं.

उनका कहना है कि इससे ग्रामीण और आम शहरी महिलाओं के लिए मुसीबत हो जाएगी.

कामिनी जायसवाल का कहना है, "अब पुरुष कहेगा कि उसका विवाह चल नहीं पा रहा है और वह अलग होना चाहता है और यह तलाक़ के लिए आधार बन जाएगा."

उनका कहना है, "जिस समाज में सब कुछ पुरुषों के पक्ष में हो तो यह अच्छा नहीं है क्योंकि इससे तलाक़ का मामला एकतरफ़ा भी हो जाएगा."

वे मानती हैं कि इससे तलाक़ लेने के लिए पुरुष अपनी पत्नी को प्रताड़ित करेगा और दूसरे हथकंडे अपनाकर उसे मायके भेज देगा और अदालत से कहेगा कि अब शादी चल ही नहीं पा रही है, चूंकि यह मामला अब दोनों पक्षों का नहीं है इसलिए इससे महिलाओं को परेशानी होगी.

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