किर्गिस्तान में नस्ली हिंसा, 40 मरे

किर्गिस्तान

मध्य एशियाई देश किर्गिस्तान के दूसरे सबसे बड़े शहर औश में किर्गिज़ और उज़्बेक के बीच नस्ली हिंसा में कम से कम 40 लोग मारे गए हैं और 600 से अधिक लोग घायल हुए हैं.

हालात को देखते हुए वहां की अंतरिम सरकार ने आपातकाल लागू कर दिया है. पुलिस और सेना को उपद्रवकारियों को देखते ही गोली मारने के आदेश दिए गए हैं.

कार्यवाहक राष्ट्रपति रोज़ा ओटुनबायेवा ने टेलीविज़न पर दिए गए अपने बयान में कहा, "मैंने अपनी दक्षिणी राजधानी (ओश) में आपातकाल की घोषणा कर दी है."

ओटुनबायेवा ने कहा कि यह दंगा दो समुदायों के युवा समूहों के बीच संघर्ष के बाद शुरू हुआ और समूचे ओश, उसके पड़ोसी जिलों करासू, अरावन और उज्गेन में फैल गया. उन्होंने कहा कि स्थानीय सरकार का स्थिति पर नियंत्रण नहीं रहा. सेना को क़ानून व्यवस्था को बहाल करने के लिए बुलाया गया है और कर्फ़्यू लगा दिया गया है.

रोज़ा ने कहा, "हमने जो सख़्त कदम उठाए हैं उससे विध्वंसक ताक़तों को क़ाबू करने में हमें सफलता मिली है. शहर में सेना तैनात कर दी गई है. हवाई फ़ायरिंग भी की गई है. हिंसा पर उतारू पांच लोगों को हिरासत में लिया गया है. पूरे किर्गिस्तान में सुरक्षा बलों को अलर्ट कर दिया गया है."

लेकिन बावजूद इसके शहर के कई इमारतों में आग लगी हुई है. सैकड़ो सैनिक सड़कों पर हालात को क़ाबू करने में लगे हैं.स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर उनके यानी उज़बेक नस्ल के लोगों के ख़िलाफ़ हिंसा जारी रही तो उन्हें उम्मीद है कि पड़ोसी देश की उज़बेक सेना उनकी मदद के लिए ज़रूर आएगी.

'सीमा बंद'

उन्होंने बताया कि उनकी महिलाएं और बच्चे उज़बेकिस्तान की सीमा पर चले गए हैं.लेकिन उज़बेकिस्तान की सीमा बंद है. औश हवाईअड्डे पर लगभग एक सौ लोग फंसे हुए हैं जिनमें ज़्यादातर बच्चे और औरतें हैं.

स्थानीय लोगों का कहना है कि गुरुवार रात को दो गिरोह के बीच लड़ाई शुरु हुई और फिर फ़ायरिंग होने लगी.शुक्रवार को हिंसा जारी रही.

Image caption किर्गिस्तान में शुक्रवार को भी हिंसा जारी रही.

औश किर्गिस्तान के दक्षिण में स्थित है जबकि देश की राजधानी उत्तर में है.

दोनों हिस्सों के बीच ऊचें पहाड़ है लेकिन देश के दोनों क्षेत्रों में केवल भौगोलिक अंतर नहीं है.

दोनों इलाक़ों में रहने वाले लोग भी अलग अलग नस्ल के हैं और उनकी आर्थिक स्थिति भी अलग है.

दक्षिणी किर्गिस्तानराष्ट्रपति कुरमानबेक बाकियेव का गढ़ समझा जाता है.

इस साल अप्रैल में जातीय हिंसा भड़कने के बाद राष्ट्रपति कुरमानबेक बाकियेव देश छोड़कर भाग गए थे.सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसा में उस समय 85 लोग मारे गए थे.

उसके बाद एक अंतरिम सरकार का गठन हुआ जो देश में क़ानून व्यवस्था को बहाल करने की कोशिश कर रही है.

लेकिन दक्षिणी किर्गिस्तान में हालात नियंत्रण में नहीं आ पा रहे हैं.हाल के दिनों में नस्ली हिंसा की कई घटनाएं सामने आई हैं.

कुछ लोगों का अनुमान है कि हिंसा के पिछे पूर्व राष्ट्रपति कुरमानबेक बाकिये के समर्थकों का हाथ हो सकता है.

औश में अल्पसंख्यक उज़्बेक जाती की एक बड़ी संख्या रहती है.

किर्गिस्तान सामरिक दृष्टिकोण से बहुत अहम देश है.

किर्गिस्तान में अमरीका और रूस दोनों के सैनिक अड्डे हैं. अफ़ग़ानिस्तान में कार्रवाई के लिए अमरीका किर्गिस्तान के रास्ते रसद और दूसरे सामान भेजता है. चीन जो कि ठीक पूरब में है वो भी किर्गिस्तान में स्थिरता देखना चाहता है.

अंतरिम सरकार ने अक्तुबर में चुनाव करवाने का वादा किया है. किर्गिस्तान मध्य एशियाई देशों में सबसे ज़्यादा प्रजातांत्रिक देश माना जाता है जहां कि ज़्यादातर देशों में तानाशाही सरकारें हैं.

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