जरवा जनजाति की नुमाइश पर पाबंदी

Image caption अभी सफ़ारी में जरवा जाति के लोगों की झलक दिखाई जाती है

केंद्र प्रशासित प्रदेश अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की एक जनजाति की नुमाइश पर सरकार रोक लगाने की तैयारी में है.

अंडमान द्वीप समूह में रहने वाली जरवा जाति को पर्यटन के लिए इस्तेमाल कर कई टूर ऑपरेटर उनकी झलक दिखाने के लिए सफ़ारी का विज्ञापन देते रहे हैं.

कई स्वंयसेवी संगठनों के हस्तक्षेप के बाद अब सरकार ने इन टूर ऑपरेटर्स पर कार्रवाई करने के लिए उप राज्यपाल को दरख्वास्त भेजी है.

क़रीब 55000 साल से भारत के अंडमान द्वीप समूह में रह रही जरवा जाति पूरे तरीके से आत्मनिर्भर है.

इस जाति का बाहरी दुनिया से कोई लेना-देना नहीं है. ये जहां रहते हैं उस जगह को जरवा रिज़र्व कहा जाता है और इसके बीचोंबीच से जाती है अंडमान ट्रंक रोड.

इसी सड़क पर एक लंबे समय से चल रही है एक खास तरीके की सफ़ारी.

इस सफ़ारी में कोई जानवर नहीं बल्कि इंसान दिखाए जाते हैं - जरवा जाति के लोगों की झलक दिखाई जाती है.

इंसानों की नुमाइश

इस जाति के साथ काम करने वाली स्वयंसेवी संस्था सर्वाइवल इंटरनेश्नल की सदस्य सोफी ग्रिग बताती हैं,''ये टूर ऑपरेटर अपनी वेबसाइट पर विज्ञापन देते हैं कि आएं और हमारी सफ़ारी का आनंद लें. अंडमान ट्रंक रोड पर कार में सफ़ारी पर चलें और जरवा जनजाति की झलक पाने की कोशिश करें. ऐसा लगता है कि किसी जंगल में जानवर को देखने के लिए सफ़ारी की बात हो.''

सोफी बताती हैं कि टूर ऑपरेटर ये जानते हैं कि जरवा जनजाति की ऐसी नुमाइश करना ग़ैरकानूनी है.

सरकार ने जरवा रिज़र्व में अंडमान ट्रंक रोड पर गाड़ी रोकने और इस जनजाति की तस्वीरें खींचने पर पाबंदी भी लगाई है.

लेकिन सोफी के मुताबिक टूर ऑपरेटर बेखौफ़ इन नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं.

अंडमान निकोबार द्वीप समूह के जनजाति कल्याण विभाग के असिस्टेंट कमिश्नर एमके त्रिवेदी भी इस बात को मानते हैं.

उनका कहना है,''ये फ़ाइल अभी प्रोसेस में है और इस मसले पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करने के लिए हमने उच्च स्तर पर दरख्वास्त डाली है. फ़ाइल में हमने लिखा है कि इन टूर ऑपरेटर को अपनी वेबसाइट से ये विज्ञापन हटाने का आदेश दिया जाए नहीं अन्यथा हमें उनका काम बंद करवाने की अनुमति दी जाए.''

एमके त्रिवेदी के मुताबिक इस मुद्दे पर अब उनके विभाग को उप राज्यपाल के फैसले का इंतज़ार है जिसके बाद वो इन टूर ऑपरेटर पर पुलिस कार्रवाई करेंगे.

सोफी ग्रिग बताती हैं कि जरवा जनजाति के करीब तीन सौ लोग ही बचे हैं और इस जनजाति में पहले ही दो बार महामारी फैल चुकी है.

अफ्रीका से भारत आई इस जनजाति की प्रतिरक्षा का स्तर काफ़ी कम है और बाहरी लोगों के संपर्क में आने से बीमारियों के फैलने का डर बढ़ जाता है.

सोफी के मुताबिक पूरी समस्या की जड़ अंडमान ट्रंक रोड है. 1996 में इस सड़क के बनाए जाने के बाद ही ये जनजाति बाहरी दुनिया के संपर्क में आई.

एमके त्रिवेदी मानते हैं कि इस सड़क पर विवाद है लेकिन बताते हैं कि ये सड़क अपर अंडमान और लोअर अंडमान को जोड़ने का एकमात्र ज़रिया है.

उनके मुताबिक़ इसे बंद करने का फैसला गृह मंत्रालय के स्तर पर ही लिया जा सकता है और इसपर भी फाइल बनी हुई है.

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