ई-रिक्शा से संवर सकती है ज़िंदगी?

पुरानी दिल्ली
Image caption पुरानी दिल्ली में पंरपरागत बाजार आकर्षण पैदा करते हैं

दिनभर रिक्शा खींचना काफ़ी थका देने वाला काम है. लेकिन एक नए इलेक्ट्रिक रिक्शे की खोज इस दिशा में दूरगामी नतीजे ला सकती है.

मैंने हिम्मत की दिल्ली शहर के बीचोबीच खूबसूरत, हरे-भरे इलाके में रिक्शे से जाने की.

हमारी यात्रा शुरू हुई इंडिया गेट से. नई दिल्ली में तेज़ रफ्तार से दौड़ती, हॉर्न बजाती बस और टैक्सियों का तांता. और ये सब ऐसे लगते थे मानो वे सीधे मुझे टक्कर मारने ही वाले हों.

पुरानी दिल्ली का इलाक़ा कुछ ज्यादा ही भीड़-भाड़ वाला है. लेकिन यहां साइकिल चलाने का अनुभव कहीं अधिक आरामदायक है.

ऐसा इसलिए है क्योंकि यहां की तंग गलियां बस और कारों के आने-जाने के लिए दिक्कत भरी हैं.

रिक्शेवाले की कहानी

इस शहर में रिक्शा चलाने वाले लोगों की संख्या तकरीबन पाँच लाख है-तीन पहियों वाली साइकिल जिसकी पीठ पर सवार होकर आप अगल-बगल के नज़ारे देख सकते हैं.

लाल क़िले से आगे बढ़ते ही दिखती है जामा मस्जिद-भारत की सबसे बड़ी मस्जिद. स्वादिष्ट कबाब के इंतज़ार में मैने थोड़ा समय बिताया करीम के रेस्तरां में जहां पर 'आम आदमी को शाही भोजन परोसने' का दावा किया जाता है.

पुरानी दिल्ली में पंरपरागत चीज़ों का बाज़ार है-शादी के मौके पर ज़रूरी चीजों के बाज़ार, गहनों का मार्केट और कपड़ों का मार्केट.

रिक्शा बड़े नाम वाली छोटी दुकानों से होकर गुज़रता है. हाउस ऑफ इम्ब्राइडरी, कॉस्मोपोलिटन ट्रेडिंग कंपनी, सुपर फैशन प्राइवेट लिमिटेड. हर ओर बक्से और पैकेट लाए जा रहे थे या ढोए जा रहे थे. एक व्यक्ति 50 की संख्या में रंगीन गठ्ठर अपने सिर पर लादे जा रहा है.

आखिर में मुझे दिखे मसालों का बाज़ार जहां पर लाल मिर्ची, लहसुन, हल्दी और हर तरह के सूखे मेवे के गठ्ठर तकरीबन हर कोने पर मिल जाएँगे.

साथ ही मिलेंगे धूल के साथ बह रहे मिर्ची के कण. गली के हर मोड़ पर आंखों में जलन और छींक मानो रूकने का नाम नहीं लेती है.

यह अनुभव अपनी पूरी तीव्रता के साथ बना रहा, यह एक ऐसा भारत है जो सबसे ज़्यादा गतिशील रहता है, लेकिन यह हर किसी के लिए मज़ाक नहीं है.

थकावट भरा काम

पुरानी दिल्ली में मेरी मुलाकात हुई मुहम्मद इलियास से जो पिछले 35 वर्षों से रिक्शा चला रहे हैं. नारंगी और हरे रंग में रंगा था उनका रिक्शा. सफ़ेद हो चुकी काफ़ी बड़ी दाढ़ी और सिर पर टोपी पहने इलियास हर रोज़ आठ घंटे रिक्शा चलाते हैं.

Image caption दिल्ली में करीब 5 लाख रिक्शावाले दिन-रात मेहनत करके मामूली कमाई ही कर पाते हैं

हर रोज़ वे करीब ढाई सौ रूपए कमा लेते हैं.

इलियास कहते हैं, "जब तक शरीर में जान है, मैं रिक्शा चलाता रहूंगा. मैं कुछ और नहीं कर सकता. रिक्शा चलाना काफ़ी थकावट भरा है." वे सिर्फ़ तभी रिक्शा नहीं चलाते हैं जब तेज़ बरसात की वजह से सड़कों पर लबालब पानी भर जाता है.

इलियास कहते हैं, "यह मेरे लिए हफ़्ते का पसंदीदा दिन होता है. मैं घर पर रुक जाता हूं और बरसात के मज़े लेता हूं."

नींबू पानी पीने के लिए हम एक जगह पर रूकते हैं. तभी इलियास ने बुदबुदाया, "मुझे बिहार में अपने गांव में ही रूक जाना चाहिए था. वहां कम से कम हम अपने लिए सब्ज़ियां उगा सकते थे. यहां से तो वह बेहतर ही था."

ई-रिक्शा एक अच्छा विकल्प

सो, दिल्ली के रिक्शावालों वालों के दिन बदलने की कोई उम्मीद है? ई-रिक्शा इसका विकल्प हो सकता है. यह न तो गोल्फ गाड़ी होती है और न ही रिक्शा होता है. इसमें स्टील और मज़बूत प्लास्टिक के फ्रेम से बना इलेक्ट्रिक मोटर है जो बैटरी से चलता है.

बैटरी को छोड़कर इसकी सभी चीज़ें रीसाइकिल की जा सकती हैं. इनमें पैडल भी लगे होते हैं जिससे पैर नहीं थकते.

दिल्ली की गलियों में ई-रिक्शा आने ही वाला है. ईको-गाड़ी के तौर पर इसे बेचा जा रहा है लेकिन शायद यह मौज मस्ती के लिए नहीं है. लोगों की प्रतिक्रिया कैसी होगी, 300 साल पुराने बाज़ार में 21वीं शताब्दी की चीज़ को लोग कैसे स्वीकार करेंगे?

लेकिन मुझे यकीन है कि यह बाज़ार में पकड़ बना लेगा. ई-रिक्शा पर मुहम्मद इलियास जैसे लोग अपनी उम्मीद से कहीं अधिक वर्षों तक लोगों को सवारी करा सकेंगे. इलियास बिहार के अपने गांव वापस लौटने के पहले पर्याप्त पैसा कमा चुके होंगे. लेकिन अभी ये एक सपना ही है.

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