नई याचिका नीति ताकि भोपाल जैसी त्रासदी फिर न हो...

क़ानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने राष्ट्रीय याचिका नीति (नेशनल लिटिगेशन पॉलिसी) की घोषणा की है ताकि ऐसे क़ानूनी मामलों के निपटारे में तेज़ी लाई जा सके जिनमें केंद्र सरकार भी एक पक्ष के तौर पर जुड़ा हुआ है.

नई दिल्ली में वीरप्पा मोइली ने कहा कि इस नीति के तहत शुरु की जाने वाली निगरानी प्रणाली से भोपाल गैस त्रासदी जैसे अहम मामलों में देरी नहीं होगी.

उन्होंने कहा कि भोपाल जैसी घटना दोबारा घटित होने नहीं दी जाएगी.

इस नीति का मुख्य मकसद अदालतों में सरकारी मामलों को कम करना है ताकि कोर्ट का कीमती समय अन्य मामलों पर खर्च किया जा सके जिससे कोर्ट में लंबित मामलों की अवधि 15 सालों से घटकर तीन साल हो जाए.

राष्ट्रीय याचिका नीति में प्रस्ताव रखा गया है कि मामलों को कोर्ट के सामने रखने के लिए कार्यकुशल और संवेदनशील लोग चुने जाएँ जो क़ानूनी रूप से दक्ष हों.

वीरप्पा मोइली ने कहा कि नई नीति में इस बात पर ग़ौर किया गया है कि अदालतों और ट्राइब्यूनलों के ज़्यादातर मामलों में सरकार और उसकी एजेंसियों की ओर से याचिका दायर होती है.

नीति में इस बात भी पर ध्यान दिया गया है कि नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना सरकार की ज़िम्मेदारी है. क़ानून मंत्री ने कहा कि याचिक्र प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों को ये बात कभी नहीं भूलनी चाहिए.

वीरप्पा मोइली ने बताया कि नीति के अंतरगत सरकार मामलों का वर्गीकरण करेगी ताकि सरकार की ओर से मामलों पर काम करने वाले लोग उन पर ध्यान दे सकें.

'वर्ष 1996 का फ़ैसला ग़लत'

इस मौके पर मौजूद अटॉर्नी जनरल जीई वाहनवती ने भोपाल मामले पर कहा कि 1996 में सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला क़ानूनी दृष्टि से ग़लत था.

वर्ष 1996 में सुप्रीम कोर्ट ने उन लोगों के ख़िलाफ़ आरोपों की संगीनता कम कर दी थी जिनके ख़िलाफ़ भोपाल गैस त्रासदी के सिलसिले में आरोप लगाए गए थे.

फ़ैसले में ग़ैर इरादतन हत्या से बदलकर आपराधिक अनदेखी का का आरोप लगाया गया था.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक वाहनवती ने कहा, “मैं फ़ैसले की आलोचना नहीं कर रहा लेकिन मैं ये तो कह ही सकता हूँ कि ये ग़लत है. मुझे लगता है कि फ़ैसले में विरोधाभास है और फ़ैसला आने के बाद से कई नई चीज़ें सामने आई हैं.”

जब अटॉर्नी जनरल से उस पुनर्विचार याचिका( क्यूरेटिव पेटिशन) के बारे में पूछा गया जिसके बारे में मंत्रीसमूह विचार कर रहा है तो उन्होंने कहा कि क़ानून मंत्री ने केवल एक सुझाव दिया है.

इस पुनर्विचार याचिका के तहत मामले में अभियुक्तों के ख़िलाफ़ आरोपों को कमज़ोर करने संबंधी 1996 के सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को चुनौती दी जा सकती है.

वाहनवटी ने कहा कि भोपाल पर जीओएम की रिपोर्ट पहले कैबिनेट के पास जाएगी जिसे सुझाव को मंज़ूरी देनी होगी.

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