गुमनामी की ज़िंदगी जी रहा है नायक

गुरुचरण सिंह खनुजा

सेना के सेवानिवृत्त कर्नल गुरुचरण सिंह खनुजा उन बिरले लोगो में हैं जिन्होंने औरों को ज़िंदगी अता करते-करते ख़ुद अपनी ज़िंदगी का बहुत कुछ दाँव पर लगा दिया.

भोपाल के यूनियन कार्बाइड संयंत्र से जिस रात गैस का रिसाव हुआ, खनुजा अपने जवानों के साथ वहाँ सबसे पहले पहुँचने वाले लोगो में थे.

उस रात इस फौजी अफसर ने कोई 10 हज़ार लोगों को अस्पताल पहुंचाया. इसमें उनके फेफड़े खराब हो गए, आंखें भी अब दग़ा दे गईं.

इतिहास के उन त्रासद लम्हों में एक नायक की तरह उभरा ये किरदार अब जयपुर में गुमनामी की ज़िंदगी जी रहा है. और सरकार ने क्या दिया- महज दो लाख चार हज़ार रूपए!

खनुजा को अपने काम पर बहुत फ़ख़्र है. सेवानिवृत्ति के बाद वे जयपुर में रह रहे हैं. उनका पूरा परिवार और रिश्तेदार फौज में है और देशभक्ति 71वर्षीय खनुजा की रग-रग में समाई है.

ख़ौफ़नाक रात

Image caption उस भयानक रात खनुजा ने सूझबूझ और बहादुरी से एक मिसाल क़ायम की

गैस से निढाल हुए फेफड़े और उम्र के तकाजे के बीच खनुजा ने जब उस ख़ौफ़नाक रात का मंज़र बयान किया तो उनकी आँखों में गैस हादसे की तस्वीर उतर आई. कहने लगे उस वक़्त वे भोपाल में सेना की तीन इलेक्ट्रिकल और मेकनिकल इंजीनियरिंग का नेतृत्व कर रहे थे.

उन्होंने बताया, "हमें सूचना मिली कि कोई हादसा हो गया है, मदद के लिए चलना है. मैं अपनी 13 गाड़ियों और हर गाड़ी पर दो चालक लेकर निकल पड़ा. उस वक़्त रात के दो बजे थे. हम पंद्रह मिनट में वहाँ पहुंच गए."

खनुजा बताने लगे हमें फैक्ट्री गेट पर लोगों को निकालने को भेजा गया था. ''जब मैं जा रहा था तो भोपाल से इंदौर और सिहोर जाने वाली सड़क पर लोग बदहवास हो कर भाग रहे थे, हमने मौक़े से लोगों को गाड़ी में बैठा कर अस्पताल भेजना शुरू किया़. फिर मेरे पास सिर्फ सेना की एक गाड़ी रह गई, मैं उस गाड़ी से निशातपुर के रेलवे गेट तक गया, तब दोनों तरफ शव ही शव पड़े थे. मुझे जो ज़िंदा थे उनको बचाना था."

खुला वाल्व

फिर खनुजा याद कर बताते हैं कि "तभी किसी ने वहां बताया कि एक वाल्व खुला है और गैस का रिसाव हो रहा है. हमने लोगों की मदद से इस वाल्व को बंद किया. मैं नहीं जानता कि कैसे ईश्वर ने मुझे ने इतनी शक्ति दी."

इस दौरान तीसरी शिफ्ट के लिए लोग आए, उन्हें भी सुरक्षित जगह भेजा. इस दौरान सवेरे चार-पांच बजे हमीदिया अस्पताल से इत्तिला आई कि अब और घायलों और शवों को लेने की हालत में नहीं है. लिहाज़ा हमने बाकी को बैरगढ़ और सेना के अस्पताल में भेजा. मेरे पास जो तेरह और चालक थे उनसे मैंने कहा जो भी प्राइवेट गाड़ियां हैं, उनको उठा लो और लोगों को अस्पताल पहुँचाओ.

खनुजा कहते है कि फिर दिन में हमें बताया गया कि हमारे प्रयासों से कोई दस हज़ार लोगों को इलाज के लिए मदद मिल सकी. इसके एक दिन बाद मुझे अस्पताल में भर्ती होना पड़ा और बताया गया कि मेरे फेफड़े 60 फीसदी ख़राब हो गए हैं. फिर मुझे लखनऊ अस्पताल भेजा गया. इसके बाद तो अस्पतालों के चक्कर लगते ही रहे.

गैस त्रासदी में संकट के लम्हों के इस नायक को दर्द है कि सरकार ने उनकी कोई सुध नहीं ली. क्या कोई मुआवज़ा मिला? श्री खनुजा उदासी के साथ कहते हैं- पहले काफ़ी विवाद के बाद पचास हज़ार रूपए दिए गए, फिर अपील की तो 70 हज़ार का आदेश हुआ, फिर आयुक्त ने इसे घटाकर चालीस कर दिया. हमने हाईकोर्ट में अपील की तो एक लाख दो हजार रूपए मिले और फिर इतनी ही राशि और मिली.

खनुजा को ज्यादा अफ़सोस अपने साथ बचाव में लगे जवानों का है. कहने लगे जवानों को तो एक पैसा भी नहीं मिला. ''मैंने जवानों को तब कहा कि वो पानी पीते रहें और गीले कपड़े से आंखें साफ़ करते रहें. हालाँकि कोई जनहानि नहीं हुई, मगर जवानों को कुछ नहीं मिलने का अफ़सोस ज़िंदगी भर रहेगा. फिर उन जवानों से कभी संपर्क नहीं हो पाया."

दुख की दास्तां

खनुजा की ज़िंदगी गोया एक दर्दभरा बयान हो. इस त्रासदी के पहले उनके परिवार के सात लोगों को उस वक़्त पलवल के पास उन्मादी भीड़ ने ज़िंदा जला दिया जब वो पंजाब से धार्मिक यात्रा पूरी कर वापस मध्यप्रदेश आ रहे थे. ''मेरे दो सगे भाई और पांच अन्य रिश्तेदार सिख विरोधी हिंसा के भेंट चढ़ गए. ये एक नवम्बर 1984 की बात है."

इस समय उनकी पत्नी अपने और बेटी के इलाज के लिए पुणे गए हुए हैं. मगर खनुजा फरिश्ताई अंदाज में कहते हैं- "आदमी में इंसानियत का जज्बा होना जरूरी है." वो कबीर को याद कर कहते हैं- "हम आए तो जग हँसा, हम रोए. मगर जाएँ तो कुछ ऐसा कर कि जग रोए हम हँसें."

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