आम की मिठास नहीं कूड़े की बदबू...

देश और दुनिया को एक उम्दा किस्म का आम देने वाले दशहरी गाँव और आस- पास में फलदार वृक्षों से हरे भरे इलाक़े को अब उत्तर प्रदेश सरकार लखनऊ शहर का आधुनिक कूड़ाघर बनाना चाहती है.

मगर गाँव वाले हैं कि मानने को तैयार नहीं. गाँव वालों का कहना है कि इस कूड़ाघर से क्षेत्र की पूरी फल पट्टी और जनजीवन को खतरा है.

लेकिन अफसरों का कहना है कि कूड़ाघर के लिए यही सबसे उपयुक्त जगह है. लखनऊ शहर से पश्चिम हरदोई रोड पर काकोरी, माल और मलिहाबाद कानूनन फल पट्टी क्षेत्र घोषित हैं. इसी क़ानून के तहत यहाँ से ईंट-भट्ठों को हटाया गया.

आमों की फसल को बढ़ावा देने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों ने रिसर्च सेंटर खोले. आमों को देश-विदेश भेजने में सहूलियत के लिए दुबग्गा में एक बड़ी मंडी बनाई गई.

इन सबसे यहाँ फल उत्पादन को बढ़ावा मिला. लोगों को लाभदायक रोज़गार मिला.लेकिन अब उत्तर प्रदेश सरकार ने बाकायदा गैज़ेट में छापकर एलान कर दिया है कि दशहरी ,सलेमपुर पतौरा और रायपुर गाँवों की लगभग 90 एकड़ ज़मीन पर एक विशाल कूड़ा घर बनाया जाएगा.

किसानों की आपत्तियों को नामंजू़र करते हुए चार लाख रूपए एकड़ की दर से मुआवज़ा भी तय कर दिया गया ,जबकि शहर के करीब होने के कारण इस इलाके में ज़मीनों के रेट कई गुना ज़्यादा हैं.

लोगों में नाराज़गी

जिस ज़मीन पर सरकार कूड़ाघर बनाने जा रही है उसमें आम का वह लगभग ढाई तीन सौ साल पुराना पेड़ भी शामिल है ,जिसे दशहरी आम का जनक कहा जाता है.

दशहरी गाँव के प्रधान जसवंत सिंह यादव का कहना है, “ दूर-दूर से लोग यह पेड़ देखने आते हैं. यह पेड़ हमारी पुरानी धरोहर है.इसी से दशहरी फैला है पूरे देश में.हम इसको कटने नही देंगे. यहाँ से कूड़ा गाड़ी निकलेगी ,बदबू आएगी हमें गाँव छोडना पड़ेगा.’’

इसी गाँव के रामशंकर और शिव नारायण ने भी ग्रामप्रधान की बात का समर्थन करते हुए कहा कि इतना बड़ा कूड़ाघर बनाने से बीमारी फैलेगी और बाग भी खराब होंगे.

गाँव वालों का कहना ही कि वे किसी कीमत पर ज़मीन नहीं देंगे. उन्हें शिकायत है कि ज़िला मजिस्ट्रेट या कोई बड़ा अफ़सर उनकी बात सुनने को तैयार नहीं है.

अब कई गाँवों के लोग किसान यूनियन के बैनर से छग जुलाई को धरना प्रदर्शन की तैयारी कर रहे हैं.

इस लड़ाई में आस पास काकोरी, माल और मलिहाबाद के किसान भी शामिल हो रहे हैं. काकोरी निवासी आमिर अब्बासी कहते हैं, “कूड़ाघर के लिए तो कोई ऊसर या बेकार ज़मीन लेनी चाहिए. यहाँ तो फल फूल सब्ज़ी अनाज सब होता है. सब किसान बर्बाद हो जाएँगे.”

आमिर अब्बासी कहते है कि फल पट्टी बचाने के लिए वे हर स्तर पर लड़ाई लड़ेंगे और ज़रूरत पड़ेगी तो कोर्ट भी जाएँगे.

ज़मीन को नुकसान

Image caption भारत में आम बेहद लोकप्रिय है

पद्मश्री से सम्मानित मलिहाबाद के मशहूर बागवान कलीमुल्लाह ने भी यह कहते हुए योजना का विरोध किया है कि इससे ज़मीन खराब होगी और गर्मी बढ़ाने से आम के बागों को नुकसान होगा. कूड़ा सड़ने से मखियाँ और दूसरे तमाम तरह के कीड़े मकोड़े पैदा होंगे.

शहरी ठोस कूड़ा-कचरा सुरक्षित तरीके से निबटाने की यह योजना सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर केंद्र सरकार की आर्थिक सहायता से देश के तमाम शहरों में चलाई जा रही है.

एक अनुमान के मुताबिक लखनऊ में लगभग १३०० टन कूड़ा रोज़ निकलेगा जिसे ट्रकों के ज़रिए ढोकर कूड़ा घर तक ले जाया जाएगा. मशीनों के ज़रिए कूड़ा शोधन के बाद अवशेष कूड़ा ज़मीन के अंदर गाड़ा जाएगा.

कागज़ पर यह योजना नगर निगम की है. नगर निगम को ही कूड़ा घर बनाने और चलाने के लिए पैसा देना है. लेकिन पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि कूड़ा निस्तारण की इस योजना पर लखनऊ नगर निगम को विश्वास में नहीं लिया गया.

लखनऊ के मेयर डाक्टर दिनेश शर्मा बड़े अफ़सोस के साथ कहते हैं कि बगैर महापौर से बात किए और बगैर नगर निगम के सदन में चर्चा कराए इस स्थान का निर्धारण कर दिया गया.

दिनेश शर्मा को यह भी शिकायत है कि नगर निगम की सहमति के बिना ही राज्य सरकार ने यह काम जल निगाम को सौंप दिया और केंद्र से आने वाला पैसा भी दे दिया.

डॉक्टर शर्मा का कहना है कि उन्होंने विरोध में शासन को पत्र लिखा,गवर्नर से कहा ,केंद्र सरकार से कहा लेकिन कहीं सुनवाई नही हुई.

जल निगम ने इस पूरे काम का ठेका ज्योतिबिल्ड टेक नाम की एक कंपनी को दिया है. लेकिन जल निगम के एक अधिकारी ने बताया कि मेयर ने टेंडर के करार पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया है.

मेयर का कहना है कि यह कूड़ाघर दशहरी गाँव अथवा फल पट्टी क्षेत्र में न लगाया जाए.

संवेदनशील मामला

जल निगम अधिकारियों का कहना है कि कूड़े से निकालने वाली कार्बन डाई आक्साइड गैस से पेड़ों को फायदा होगा. मगर यह तर्क गाँव वालों को मंज़ूर नहीं.

अभी परियोजना को पर्यावरण विभाग से स्वीकृति नहीं मिली. पर्यावरण निदेशक डॉक्टर यशपाल सिंह का कहना है कि जल निगम को कहा गया है वह दोबारा सर्वे करके इस तरह से परियोजना बनाएँ कि कम से कम पेड काटने पड़ें.

डॉक्टर यशपाल का मानना है कि यह बेहद संवेदनशील मामला है. एक ओर पर्यावरण के लिए सुरक्षित कूड़ा निस्तारण जरुरी है तो दूसरी ओर पेड़ों को बचाना जरुरी है.

कानूनन फल पट्टी घोषित होने के कारण उद्यान विभाग इस इलाके का रखवाला है और उसकी सहमति पर ही वन विभाग पेड़ काटने की अनुमति दे सकता है.लेकिन उद्यान विभाग के निदेशक चन्द्रिका प्रसाद तिवारी कहते हैं कि शासन ने उन्हें इस मामले में चुप रहने को कहा है.

कूड़ाघर के लिए ज़मीन का चयन करने की ज़िम्मेदारी लखनऊ विकास प्राधिकरण की है. उसी की सिफ़ारिश पर शासन ने ज़मीन अधिग्रहण की अधिसूचना जारी की.

प्राधिकरण के चेयरमैन और लखनऊ के कमिश्नर प्रशांत त्रिवेदी का कहना है कि कूड़ाघर के लिए यही ज़मीन सबसे उपयुक्त है वे इस मुद्दे पर और कोई बात करने को तैयार नहीं हुए.

मुख्यमंत्री तक किसी की पहुँच नही है. ऐसे में किसान या तो सड़कों पर आंदोलन करें या फिर अदालत का दरवाज़ा खटखटाएं.