नक्सली ऑपरेशन: न ताल न मेल

सीआरपीएफ़ के जवान

छत्तीसगढ़ में केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (सीआरपीएफ़) के जवानों पर नक्सलियों के ताज़ा हमले ने सरकारी महकमों में एक बहस छेड़ दी है. सवाल उठ रहे हैं कि कहीं देश के विभिन्न इलाकों से आए इन अर्द्धसैनिक बल के जवानों को बलि का बकरा तो नहीं बनाया जा रहा है ?

नारायणपुर में 29 जुलाई को हुए हमले में सीआरपीएफ़ के 28 जवानों की मौत हो गई थी. पिछले तीन महीनों में यह नक्सलियों का चौथा बड़ा हमला था.

लगातार हो रहे इन हमलों में सबसे ज़्यादा नुक़सान अर्धसैनिक बलों को उठाना पड़ रहा है.

अर्धसैनिक बलों के इन जवानों को छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग के जंगलों में तैनात किया गया है जहाँ की भौगोलिक स्थिति से ये जवान और अधिकारी वाकिफ़ नहीं हैं. ऐसे में इनकी पूरी निर्भरता स्थानीय पुलिस पर रहती है.

यही वजह है कि केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम ने बार-बार नक्सल प्रभावित राज्यों के अधिकारियों के साथ बैठकें कीं ताकि राज्य और केंद्रीय पुलिस बलों के बीच बेहतर ताल-मेल स्थापित किया जा सके . नारायणपुर में हुए नक्सली हमले के बाद राज्य के पुलिस प्रशासन को आलोचना का शिकार होना पड़ा लेकिन इस आलोचना के जवाब में छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन ने ठीकरा केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल के मत्थे ही फोड़ दिया.

एक निजी चैनल को दिए गए बयान में उन्होंने कथित तौर पर कहा, "अगर सीआरपीएफ़ पर लगातार घात लगाकर हमले हो रहे हैं तो क्या इसके लिए हमें जवाब देना पड़ेगा? ज़िम्मेदारी का क्या मतलब है? इसका मतलब है हर संभव सुविधाएँ मुहैया कराना. ज़िम्मेदारी का मतलब नहीं है कि हम उनको चलना सिखाएँ." हालांकि विश्वरंजन ने सफ़ाई देते हुए कहा है कि उनके बयान को तोड़मरोड़ कर पेश किया गया है.

मामले की गंभीरता को देखते हुए छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह भी विश्वरंजन के बचाव में आगे आए. उन्होंने कहा कि पुलिस महानिदेशक का उद्देश्य केंद्रीय बल को नीचा दिखाना नहीं था.

नाराज़गी

Image caption सीआरपीएफ़ के साथ पुलिस के जवान न होने पर सवाल उठाए गए हैं

मगर विश्वरंजन के बयान से सीआरपीएफ़ के अधिकारी और जवानों में आक्रोश है. सूत्रों का कहना है कि अधिकारियों नें इसकी शिकायत केंद्रीय गृह मंत्रालय से की है. इस बयान के बाद केंद्रीय पुलिस बल और राज्य पुलिस के बीच मतभेद गहराता जा रहा है. खुलकर तो नहीं मगर दबी जुबान से केंद्रीय अर्द्धसैनिक बल सीआरपीएफ़ के अधिकारियों ने इस बयान पर अपनी नाराजगी ज़ाहिर की है.

सूत्रों का कहना है कि सीआरपीएफ़ ने बस्तर के कई स्थानों से कैंप हटाए जाने का सुझाव दिया है.

अधिकारियों ने सुझाव दिया है कि जो कैंप बीहड़ों में स्थापित किये गए हैं उन्हें हटाकर हाईवे पर लाया जाए मगर राज्य की पुलिस इसके लिए तैयार नहीं है. अधिकारियों नें कैम्पों में रह रहे जवानों की बदतर जिंदगी की बात भी उजागर की है. अधिकारियों का कहना है कि बस्तर इलाक़े में तैनात किए गए जवानों को बुनियादी ज़रूरतों का भी अभाव झेलना पड़ रहा है. यहाँ तक कि उन्हें खाना और पानी जैसी सुविधाओं का अभाव भी झेलना पड़ रहा है. इन बातों का ज़िक्र सीआरपीएफ़ की इनहाउस पत्रिका 'सीआरपीएफ़ समाचार' में महानिरीक्षक आशुतोष शुक्ला के एक लेख में किया गया है.

सिर्फ़ सीआरपीएफ़ ही नहीं, छत्तीसगढ़ में चलाए जा रहे अभियान में सीमा सुरक्षा बल, सशस्त्र सीमा बल और आईटीबीपी जैसे केंद्रीय अर्द्ध सैनिक बल के जवानों को तैनात किया गया है.

हाल ही में सीमा सुरक्षा बल के अधिकारियों ने छत्तीसगढ़ का दौरा किया और यहाँ पर जवानों को मिल रही सुविधाओं पर अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की है.

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