एक म्यान में दो तलवारें नहीं हो सकतीं

नक्सलियों के हाथों मारे गए जवानों के शव
Image caption पिछले एक साल में सीआरपीएफ़ के सौ से अधिक जवान मारे गए हैं

छत्तीसगढ़ में लगातार हो रहे नक्सली हमलों की गाज केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (सीआरपीएफ़) के विशेष महानिदेशक विजय रमन पर गिरी.

नक्सलियों के ख़िलाफ़ गठित की गई विशेष टास्क फोर्स के कमांडर रमन की ज़िम्मेदारियाँ अब सिर्फ प्रशासनिक कार्यों तक ही सीमित रह जाएँगीं.

उनकी जगह आईजी ऑपरेशंस के रूप में ए. पुन्नुस्वामी ने कमान संभाल ली है. रमन को न सिर्फ ऑपरेशंस से दूर रखा गया है बल्कि उनके कार्यालय को भी कोलकाता स्थानांतरित कर दिया गया है. अब कोलकाता में ही सीआरपीएफ़ के मध्य ज़ोन का मुख्यालय होगा. पिछले साल नवंबर में विजय रमन को नक्सल विरोधी अभियान या यूँ कहें ऑपरेशन ग्रीन हंट का कमांडर बना कर रायपुर में तैनात किया गया था.

1975 बैच के आईपीएस अधिकारी विजय रमन ने कश्मीर में सीआरपीएफ़ के आईजी ऑपरेशंस के रूप में जो काम किया, उसकी बहुत तारीफ़ हुई थी.

इसीलिए उन्हें सात राज्यों पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, बिहार, झारखण्ड और महाराष्ट्र में चल रहे नक्सल विरोधी अभियान का कमांडर बनाया गया. हालांकि रमन का कहना है कि यह फ़ेरबदल सुरक्षा के दृष्टिकोण के किया जा रहा है.

उन्होंने कहा कि सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ़) का मुख्यालय कोलकाता में है उसी तरह सीआरपीएफ़ के मध्य ज़ोन के मुख्यालय के रायपुर में होने का कोई औचित्य नहीं है. उनका कहना है कि इससे पहले भी इस मुद्दे पर चर्चा हो चुकी है.

तालमेल का अभाव

Image caption नक्सलियों के ख़िलाफ़ अभियान छत्तीसगढ़ में सफल होता नहीं दिख रहा है

केंद्र सरकार का यह क़दम छत्तीसगढ़ में लगातार हो रहे नक्सली हमलों के बाद लिया गया है . साथ ही यह क़दम केंद्रीय गृह सचिव जी के पिल्लई के दो दिवसीय दौरे के फ़ौरन बाद लिया गया है.

सवाल पूछे जा रहे हैं कि कहीं छतीसगढ़ पुलिस और सीआरपीएफ़ के बीच तालमेल के अभाव की वजह से तो विजय रमन को नहीं हटाया गया? पिछले 29 जून को बस्तर संभाग के नारायणपुर में नक्सली हमले के बाद छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन के बयान के बाद साफ़ हो गया था कि नक्सल विरोधी अभियान में लगी राज्य पुलिस और सीआरपीएफ़ में तालमेल का अभाव है.

दोनों ही पक्ष एक दूसरे पर आरोप लगा रहे थे. तालमेल के अभाव की बात पिल्लई ने भी स्वीकार की थी और कहा था कि इसे दूर कर लिया गया है.

दो ध्रुव

छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन 1973 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं.

यही वजह थी कि छत्तीसगढ़ में चल रहे अभियान में कमांड के दो ध्रुव बन गए थे.

कहा जा रहा है कि नक्सल विरोधी अभियान दो महानिदेशकों के अहम में फँस कर रह गया था.

ज़ाहिर सी बात है कि इन परिस्थितियों का लाभ नक्सालियों को मिला और उसका सबसे ज़्यादा नुक़सान अर्धसैनिक बलों के जवानों को उठाना पड़ा. वैसे भी एक ही रैंक के दो अधिकारियों के मौजूद होने की वजह से अहम फैसलों में परेशानियाँ भी हो रहीं थीं.

ज़ाहिर है फ़ैसले सरकार के होते हैं.

ऐसे समय पर जब सिर्फ तीन नक्सली हमलों में सौ से ज्यादा जवानों को अपनी जान गँवानी पड़ी इस तरह के फैसलों से अभियान में मदद मिलेगी ?

यह एक अहम सवाल है, जिसका उत्तर भविष्य में ही मिल सकेगा.

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