वतन वापस आने की उम्मीद

रिहाई के लिए प्रदर्शन
Image caption पाक जेलों में बंद भारतीयों के परिजन उनकी रिहाई के लिए लंबे समय से संघर्ष कर रहे

भारत-पाकिस्तान की सरहद पर उनका गांव है. कोई अनपढ़ चरवाहा है और कोई दिहाड़ी मजदूर. वो भूल से सरहद लाँघ गए और फिर कभी नहीं लौटे.

पाकिस्तान के सुरक्षा बलों ने उनको गिरफ़्तार कर लिया. परिजनों के मुताबिक ज्यादा तकलीफ़ ये है कि ख़ुद उनका मुल्क़ उन्हें भूल गया. राज्य के सीमावर्ती जिलों के चार लोग कोई दो दशक से पाकिस्तान की जेलों में हैं.

पाकिस्तान ने हाल में सीमावर्ती बाड़मेर और जैसलमेर जिलों के छह लोगों को रिहा किया है. इससे वहां जेलों में बंद इन चार लोगों के परिजनों में रिहाई की उम्मीद जगी है.

बाड़मेर जिले के धनाऊ गांव के भग सिंह 1986 में मवेशी चराते सरहद पार चले गए और उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया. तब से उनकी कोई खबर नहीं है.

पत्नी लक्ष्मी पर परिवार और चार संतानों की परवरिश का भार आ पड़ा. दोनों बेटियों की शादी हुई तो कन्यादान के वक़्त पिता भग सिंह नहीं थे. लक्ष्मी कहती हैं,"अपने सुहाग को देखने के लिए आंखें तरस गईं."

जैसलमेर के जमालदीन की भी ये ही कहानी है. वर्ष 1986 में गलत दिशा में बढ़ा एक पाँव उसे सीमा के उस पार ले गया. आखिरी बार 1990 में पाकिस्तान के कराची जेल से जमालदीन का ख़त आया. मगर उसके बाद पत्नी हनीफ़ा को अपने शौहर की कोई चिठ्ठी नहीं मिली. सत्तर साल के बूढ़े पिता मिसरी ख़ान और माँ चांदनी की हसरत है कि वो दुनिया से विदा होने से पहले अपने चिराग को एक बार देख लें.

कुछ ऐसी ही कहानी

Image caption बाड़मेर जिले के भग सिंह मवेशी चराते समय भूलवश सरहद पार चले गए

बाड़मेर के साहुरम का खेत तो सरहद के उस हिस्से में है जहां एक पत्थर का स्तम्भ धरती को दो देशों में बांटने की मुनादी करते खड़ा नजर आता है.

साल 1989 में वो ईंधन के लिए लकड़ी जमा करते सरहद लाँघ गए और फिर पाकिस्तानी सीमा रक्षकों के हाथ लग गए. इस दौरान उनके ख़त भी आये. अब तो ख़त भी आने बंद हो गए हैं.

पत्नी लक्ष्मी और बेटी दया जुदाई का दर्द सहन नहीं कर पाए और उन दोनों का निधन हो गया.

रिहाई की कोशिश

साहुरम का आखिरी ख़त सिंध के हैदराबाद की जेल से आया था. अब बेटा मेघराम अपने पिता की रिहाई के लिए फ़रियाद करता घूम रहा है.

बाड़मेर के टीलाराम तो उस वक़्त नाबालिग थे जब गलती से सीमा लाँघ गए. आख़िरी ख़बर मिली तब वो अमरकोट की जेल में थे.

'पाकिस्तान इंडिया पीपुल्स फॉर्म फॉर पीस एंड डेमोक्रेसी' इन बंदियों की रिहाई के लिए अभियान चला रही है. संगठन के रवि हेमाद्री ने बीबीसी को बताया कि दोनों ओर के मानवाधिकार कार्यकर्ता इन मुल्क़ों की जेलों में बंद लोगों की रिहाई के लिए प्रयास कर रहे हैं.

हेमाद्री ने बीबीसी को बताया, ''हमने दोनों ओर के बंदियों की सूची भी तैयार की है. मगर अभी ये मुकम्मल नहीं है. दोनों देशों के बंदियों की रिहाई के लिए हम न्यायिक अधिकारियों के भी सम्पर्क में हैं. कोशिश जारी है, उम्मीद है कोई हल निकलेगा."

इन बंदियों के परिजनों के लिए हर सवेरा उम्मीद की रोशनी लेकर आता है. लेकिन साँझ ढले ये उम्मीद निढाल होने लगती है.

संदेश आए, ख़त आए. पर वो ना आए जिनके लिए आंखें निर्झर पानी बहाती रही हैं.

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