दिग्विजय और चिदंबरम के विवाद की जड़

चिदंबरम और दिग्विजय सिंह
Image caption नक्सली समस्या को दोनों नेता अलग नज़रिए से देखते हैं

नक्सलियों या माओवादियों से निपटने को लेकर केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम और कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह

के बीच जो मतभेद है, उसकी पृष्ठभूमि में एक दशक पुरानी एक रिपोर्ट है.

नक्सलवाद पर यह रिपोर्ट दिग्विजय सिंह ने तब तैयार करवाई थी जब वे अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री थे.

इस रिपोर्ट का शीर्षक ही है - ग़रीबी और शोषण से नक्सलवाद.

रिपोर्ट में कहा गया है कि नक्सलवाद मूल रूप से सामाजिक-आर्थिक समस्या है और यह सिर्फ़ सतही तौर पर क़ानून व्यवस्था की समस्या है.

बीबीसी के पास इस रिपोर्ट की एक प्रति उपलब्ध है और इस रिपोर्ट में ही कहा गया है कि नक्सलियों को आतंकवादी गुटों की तरह देखना ग़लत होगा.

दिग्विजय सिंह ने गत 14 अप्रैल को एक अंग्रेज़ी दैनिक में लिखे अपने लेख में कहा था कि नक्सलियों से निपटने की केंद्र की नीति बहुत पुलिस केंद्रित है.

उन्होंने केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम पर बौद्धिक अहंकारी होने का आरोप भी लगाया था लेकिन बाद में वे उनसे माफ़ी मांग आए थे.

अब उन्होंने यह कहकर इस विवाद को हवा दे दी है कि वे अपने लेख पर क़ायम हैं.

लेकिन दूसरी ओर केंद्रीय गृहमंत्रालय की नीति इस समय नक्सलियों को क़ानून-व्यवस्था की समस्या की तरह देखती है.

केंद्र सरकार इस समय 'क्लियर, होल्ड एंड डवलप' की नीति पर अमल कर रही है यानी नक्सलियों का सफाया करो, इलाक़े पर कब्जा करो और फिर विकास करो.

'राजनीतिक समस्या'

1996 में नक्सलियों पर यह रिपोर्ट प्रोफ़ेसर हीरालाल शुक्ल ने तैयार की थी. इसमें कुछ प्रशासनिक अधिकारियों ने उनका सहयोग किया था.

Image caption नक्सली समस्या को मनमोहन सिंह सबसे बड़ी समस्या बता चुके हैं

प्रोफ़ेसर शुक्ला को रिपोर्ट तैयार करने की ज़िम्मेदारी दिग्विजय सिंह सरकार में गृहमंत्री चरण दास महंत ने सौंपी थी.

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि नक्सली समस्या को राजनीतिक समस्या की तरह देखने की हिमायत की गई है.

रिपोर्ट में कहा गया है, "नक्सलवाद को पंजाब के खालिस्तान समस्या और असम के बोडो और उल्फ़ा समस्या की तरह राजनीतिक समस्या की तरह देखा जाना चाहिए और इसका हल सिर्फ़ राजनीतिक ही हो सकता है."

यह रिपोर्ट नक्सली हिंसा से निपटने के लिए हिंसा का सहारा लेने को भी उचित नहीं मानती.

इसमें कहा गया है,"हिंसा को हिंसा से रोका जा सकता है लेकिन सिर्फ़ एक हद तक ही. लेकिन हिंसा किसी सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक समस्या का हल नहीं हो सकती."

शोषण

कहा जाता रहा है कि आदिवासी क्षेत्रों के विकास से नक्सली समस्या को हल किया जा सकता है लेकिन मध्यप्रदेश सरकार की ओर से तैयार करवाई गई यह रिपोर्ट विकास की अवधारणा पर भी सवाल खड़ा करती है.

304 पृष्ठों की इस रिपोर्ट में विस्तार से ज़िक्र किया गया है कि जब इन इलाक़ों में आर्थिक विकास के काम शुरु हुए तो आदिवासियों का किस तरह से शोषण शुरु हुआ.

रिपोर्ट में कहा गया है, "आर्थिक विकास की परियोजनाओं की वजह से परियोजना कर्मचारियों, ठेकेदारों और व्यावसायियों के रुप में बहुत से ग़ैर-आदिवासी जंगलों में आ गए जिनमें न तो आदिवासी संस्कृति को समझने की इच्छा थी और न वे आदिवासी जीवन मूल्यों का सम्मान करते थे."

रिपोर्ट के लेखक हीरालाल शुक्ल लिखते हैं, "इन बाहरी लोगों को आदिवासियों ने परदेसी का नाम दिया, इसका अर्थ था, ग़ैर आदिवासी लोग जिनका काम आदिवासियों का शोषण करना है."

वे कहते हैं, "आदिवासियों के लिए यह त्रासदी की बात रही कि ग़ैर आदिवासी लोगों ने उनकी संस्कृति को आदिम और अवमानवीय कहकर उसका तिरस्कार किया."

रिपोर्ट में कहा गया है कि पुलिस और वन विभाग के अधिकारियों की प्रताड़ना का असर यह हुआ कि उनका आत्मविश्वास ख़त्म हो गया और प्राकृतिक रुप से लड़ाकों को आपस में संघर्ष करने वाले, घातक डकैतियाँ डालने वाले और शराबखोर लोगों में बदल दिया.

इसके अनुसार आदिवासी इलाक़े में विकास की कोई परियोजना बनाई जाती है तो आदिवासी को लगता है कि अगर

विस्थापन होना ही है तो यह उसके लिए जीवन-मरण का प्रश्न है और वे इसका विरोध करते हैं.

आदिवासियों के विरोध को एक हद तक सही ठहराते हुए कहा गया है कि यह क़ानून व्यवस्था का सवाल नहीं बल्कि यह मानवाधिकार, जीवित रहने का और मनुष्य की तरह उनके अस्तिस्व का सवाल हो जाता है.

मतभेद

Image caption आदिवासी इलाक़े बहुत पिछड़े हुए हैं

हालांकि इस रिपोर्ट पर दिग्विजय सिंह सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की थी लेकिन ऐसा दिखता है कि वे इस रिपोर्ट से पूरी तरह से सहमत थे.

इसलिए आज भी उनका मानना है कि नक्सली समस्या को सिर्फ़ क़ानून व्यवस्था की समस्या के रूप में देखना ठीक नहीं है और वे कह रहे हैं कि केंद्र की नक्सल-नीति बहुत पुलिस केंद्रित है.

अब वे कह रहे हैं कि जो उनका मत है वह पार्टी का भी मत है. अपने समर्थन के लिए वे उस लेख का हवाला भी दे रहे हैं जो सोनिया गांधी ने कांग्रेस के मुखपत्र में लिखा था.

इस लेख के बाद मनमोहन सिंह भी कई बार नक्सल प्रभावित इलाक़ों में विकास की बात कह चुके हैं.

उन्होंने पिछले दिनों मुख्यमंत्रियों के एक सम्मेलन में स्वीकार किया था कि वहां पुलिस से लेकर प्रशासन के दूसरे अधिकारियों की छवि आदिवासियों के मन में ठीक नहीं है.

उन्होंने कहा था,"काफ़ी समय से हमारे आदिवासी भाई और बहनें प्रशासन को लोभी फॉरेस्ट गार्ड, क्रूर पुलिस वाले और लालची पटवारी की तरह देखते रहे हैं."

उन्होंने राज्यों के मुख्यमंत्रियों से प्रशासन की इस छवि को बदलने की अपील की थी.

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