गंगा के लिए अनशन

जीडी अग्रवाल
Image caption प्रोफ़ेसर जीडी अग्रवाल आमरण अनशन पर बैठे हैं.

गंगा भागीरथी पर बन रही परियोजनाओं के विरोध में आईआईटी के सेवानिवृत प्रोफ़ेसर और मशहूर पर्यावरणवादी प्रोफेसर जीडी अग्रवाल फिर से आमरण अनशन पर बैठ गए हैं.

उनकी मांग है कि गोमुख से 100 किलोमीटर तक गंगा के प्रवाह पर कोई बांध न बने.

वर्ष 2008 में प्रोफ़ेसर अग्रवाल के अनशन के बाद यहां की 600 मेगावाट की लोहारीनागपाला परियोजना को बंद कर दिया गया था. अग्रवाल का कहना है कि, “केंद्र इस योजना को बहाल करना चाहता है जबकि इसे रद्द कर दिया जाना चाहिये.”

योगगुरू बाबा रामदेव और शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती ने भी उनका समर्थन किया है और यहां तक कि राज्य सरकार ने भी उनके साथ सैद्धांतिक सहमति जताई है.

तीर्थनगरी हरिद्वार में अनशन पर बैठे 78 साल के जीडी अग्रवाल ने कहा कि, “गंगा राष्ट्रीय धरोहर है और सरकार को तय करना पड़ेगा कि वो राष्ट्रीय धरोहर को बचाना चाहती है या फिर राष्ट्रीय पनबिजली निगम जैसी कंपनियों को.”

उन्होने कहा कि, “कम से कम गोमुख से लेकर उत्तरकाशी तक तो गंगा का प्रवाह अविरल और अवरूद्ध रहने दिया जाए.”

राज्य सरकार भी साथ

अभी तीन महीने पहले ही महाकुंभ के दौरान संतों के आंदोलन के दबाव में गंगोत्री के पास दो ऊर्जा परियोजनाओं भैरोंघाटी और पाला मनेरी को बंद किया गया है जिनपर करोड़ों खर्च हो चुके थे.

राज्य में 2012 में चुनाव होने हैं और गंगा पर्यावरण के साथ-साथ हिंदू भावनाओं से जुड़ी है लिहाजा सत्ताधारी बीजेपी भी किसी को नाराज नहीं करना चाहती.

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने कहा कि ,”हम सहमत हैं कि गंगा को अविरल बहना चाहिये और उसकी पवित्रता बनी रहनी चाहिये.”

राज्य को ऊर्जा प्रदेश बनाने का दावा करनेवाले निशंक ने गोलमोल अंदाज में कहा कि “गंगा की सहयोगी नदियो पर ऐसे बांध बन सकते हैं जिससे गंगा प्रभावित न हो.”

अधर में ऊर्जा प्रदेश

प्रो.अग्रवाल के अनशन के बाद एक बार फिर राज्य की बिजली परियोजनाओं पर तलवार लटकती नजर आ रही है और ऊर्जा प्रदेश का नारा खटाई में पड़ गया है. गंगा पर बांध के विवाद के अलावा राज्य की दूसरी नदियों पर बिजली परियोजनाएं का काम भी सुचारू ढंग से नहीं चल पाया है.

इनके आवंटन में घोटालों के आरोपो से घिरी निशंक सरकार ने पिछले ही हफ्ते बिजली परियोजनाएं लगाने के 56 ऐसे प्रस्ताव निरस्त कर दिये जिन्हें कंपनियों को आवंटित किया जा चुका था.

ख़बर है कि पर्यावरण औऱ आस्था पर बार-बार उठ रहे विवादों और सरकार के इस फैसले से घबराई कई कंपनियों ने राज्य में बिजली योजनाओं से अपने हाथ खींच लिये हैं और कई और भी अपना काम समेटने की तैयारी में हैं.

आखिर किसकी गंगा

इस बीच गंगा और परियोजनाओं का मुद्दा राजनीतिक रंग अख्तियार करता जा रहा है. उत्तराखंड के प्रमुख स्वयंसेवी संगठन रूलक ने अग्रवाल और हिंदू संगठनों के विरूद्ध कई स्थानीय लोगों को एकजुट करके परियोजनाओं पर काम शुरू करने की मांग की है.

रूलक के अध्यक्ष अवधेश कौशल ने आरोप लगाया कि, “प्रो अग्रवाल विदेशी संस्थाओं के एजेंट हैं और उनसे पैसा लेकर राज्य में विकास का विरोध कर रहे हैं. उत्तराखंड में गंगा को लेकर आंदोलन करनेवाले प्रो अग्रवाल और उनके समर्थकों को कानपुर और बनारस में गंगा का प्रदूषण क्यों नहीं दिखता.”

रूलक ने भी परियोजनाओं की बहाली की मांग लेकर 15 अगस्त से आंदोलन की धमकी दी है.

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