चुप्पी चुप्पी और चुप्पी

थान स्वे
Image caption थान स्वे पिछले छह वर्षों में दूसरी बार भारत आए हैं.

चुप्पी...चुप्पी...और सिर्फ़ चुप्पी....

बर्मा के सैन्य जनरल थान स्वे जब भारत की पाँच दिवसीय यात्रा पर रविवार को बोधगया पहुंचे तो उन्होंने इसी चुप्पी की अपेक्षा की थी.

बर्मा की सैन्य सत्ता इसी साल देश में चुनाव करवाने वाली है. थान स्वे की चुनावी योजनाओं पर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की चुप्पी उनके लिए बहुत ज़रुरी है क्योंकि चुनावों से पहले कई वरिष्ठ जनरल अपनी सैन्य वर्दी छोड़ने वाले हैं.

जब थान स्वे राजधानी दिल्ली के हैदराबाद हाउस में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिलेंगे तो वहां न तो कोई प्रेस कांफ्रेंस होगी और न ही कोई बाइट तक देने की व्यवस्था.. चुप्पी और शांति की पूरी गारंटी.

बर्मा में 1990 में हुए लोकतांत्रिक चुनावों को भारत ने पूरा समर्थन दिया था लेकिन उसके बाद भारत ने बर्मा की सैन्य सरकार से संबंध अच्छे रखे हैं. थान स्वे पहले कुछ समय रंगून में रहे लेकिन अब पिछले एक दशक से वो नेपिटाउ में रह रहे हैं.

चीन पहले ही बर्मा की सैन्य सरकार का समर्थन करता रहा है. अब थान स्वे चुनावों के मामले में भारत से चुप्पी की और आगे चलकर समर्थन (अगर मिल सके तो) की भी उम्मीद कर रहा है. चुनाव भी ऐसे जिसमें जेल में बंद लोकतंत्र समर्थक नेता आंग सान सू की पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी हिस्सा नहीं ले सकेगी.

अपनी यात्रा के दौरान थान स्वे महात्मा गांधी की समाधि पर भी जाएंगे. वो पिछले छह वर्षों में दूसरी बार भारत आए हैं.

2004 में जब थान स्वे राजघाट पहुंचे थे तो फ़िल्ममेकर अमर कंवर ने गांधी की समाधि पर फूल चढ़ाते स्वे का वीडियो बना लिया था. इस वीडियो में बर्मा के कई सैन्य विरोधी कार्यकर्ता को नारे लगाते भी देखा जा सकता था.

कंवर के शब्दों में वो अपनी फ़िल्म ‘ फेस’ में दुनिया को दिखाना चाहते थे कि कैसे दुनिया के सबसे क्रूर लोगों में से एक शांति और अहिंसा के प्रतीक गांधी की समाधि पर फूल चढ़ा रहा है.

कंवर ने बीबीसी से कहा, ‘‘यह शर्मनाक है कि भारतीय समाज की ओर से इस सैन्य जनरल के ख़िलाफ़ कोई प्रदर्शन नहीं हुआ. हां बोधगया में कुछ पोस्टर ज़रुर दिखाए गए.’’

पिछले कुछ वर्षों में भारत ने बर्मा में सड़कें बनाई हैं, सेटेलाइट डाटा और सैन्य उपकरण उपलब्ध कराए हैं. साथ ही सैन्य सरकार की किसी आलोचना से भी भारत सरकार बची रही है.

इस साल मार्च में टाटा समूह ने घोषणा की कि वो बर्मा के मागवे में भारी ट्रक बनाने का कारखाना खोलेगा.

बर्मा के मामलों से जुड़े रहे विदेश मंत्रालय के एक पूर्व अधिकारी नीलम देव की राय में भारत के पास सैन्य जनरल से बात करने के अलावा कोई और रास्ता नहीं है.

नीलम कहती हैं, ‘‘ बर्मा में चुनाव होने के बाद भी कोई आधारभूत बदलाव नहीं होने वाला है. भारत सरकार के पास सैन्य सरकार के साथ बात नहीं करने के अलावा और कोई चारा बचता नहीं है.’’

भारत और बर्मा के बीच 1600 किलोमीटर लंबी सीमा है और इससे लगते कई पूर्वोत्तर राज्यों में चरमपंथ एक बड़ी समस्या है. भारत सरकार को उम्मीद है कि इससे निपटने में जनरल स्वे मददगार साबित हो सकते हैं.

भारत सरकार लगातार यह मानती रही है कि पूर्वोत्तर के चरमपंथियों को बर्मा से कोई मदद नहीं मिलना भी अच्छा संकेत है और इसके एवज़ में भी सैन्य सरकार से संबंध ठीक रखना बुरी रणनीति नहीं है.

Image caption बर्मा में कुछ वर्ष पहले भी लोगों ने विरोध प्रदर्शन किए थे लेकिन सेना ने विरोध को दबा दिया.

हालांकि नीलम ये बात मानती हैं कि यह निर्धारित करना कठिन है कि चरमपंथ से लड़ाई में बर्मा की मदद से भारत को फ़ायदा हो रहा है या नहीं. ये रणनीति उस कूटनीति का हिस्सा है कि पूर्वोत्तर में स्थित ख़राब होने से पहले ही स्थिति पर नियंत्रण के उपाय किए जाएं.

नीलम मानती हैं कि पश्चिमी देशों ने भी बर्मा पर कुछ ख़ास नहीं किया है. वो कहती हैं कि अमरीका भी बर्मा की समस्या को लेकर गंभीर नहीं दिखता है.

थान स्वे की यात्रा का अभी भी विरोध कर रहे दिल्ली में रहने वाले थिन थिन आंग कहते हैं कि भारत को बर्मा में लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बहाली के लिए प्रयास करना चाहिए. वो कहते हैं, ‘भारत को चाहिए कि वो लोकतंत्र के लिए लोगों की मदद करे न कि जनरलों की.’

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव प्रकाश कारट ने बीबीसी से कहा कि सरकार को सैनिक जनरल से कहना चाहिए कि बर्मा में संसदीय लोकतंत्र की बहाली आवश्यक है.

1990 में बर्मा में हुए संसदीय चुनावों में आंग सान सू कि की पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी को जीत मिली थी लेकिन उसके बाद सेना ने सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया. उसके बाद जब बर्मा के छात्र देश से भागने लगे तो भारत ने उन्हें शरण दी थी.

1993 में तत्कालीन कांग्रेस पार्टी सरकार ने आंग सान सू की को प्रतिष्ठित जवाहर लाल नेहरु अवार्ड फॉर इंटरनेशनल अंडरस्टेंडिग दिया था.

यह अवार्ड देकर भारत ने साफ किया था कि वो शांति और अहिंसा का समर्थक है.

विडंबना यही है कि सैन्य जनरल थान स्वे बोध गया से दिल्ली आकर शांति और अहिंसा के पुजारी की समाधि पर फूल चढ़ा रहे होंगे और दूसरी तरफ़ इस पथ पर चलने वाली सू कि अपने ही घर में नज़रबंद होंगी.

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