क्यों करीब आ रहे हैं कंज़र्वेटिव?

विंस्टन चर्चिल
Image caption विंस्टन चर्चिल ब्रिटिश साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद के प्रखर पक्षधर थे

भारत की यात्रा पर निकले ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन उसी कंज़र्वेटिव पार्टी के प्रधानमंत्री हैं जिसके प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने जी-जान से भारत की आज़ादी का विरोध किया था और ये कहा था - मैं ब्रिटेन के सम्राट का मंत्री, ब्रिटिश साम्राज्य को लुटवाने के लिए नहीं बना हूँ.

आख़िर चर्चिल के सत्ता से बाहर होने के बाद भारत को आज़ादी मिली. तब लेबर पार्टी का शासन था, जिसके प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली ने सदा भारत को स्वाधीन किए जाने की हिमायत की थी.

भारत और भारतीयों के लिए उपनिवेशकाल के अनुभवों से बनी ब्रिटिश राजनीति की उस छवि में हमेशा से यही भाव रहा - कंज़र्वेटिव से दूरी, लेबर से निकटता.

कंज़र्वेटिव पार्टी से जुड़ी रहीं सांसद बैरोनेस श्रीला फ़्लेदर कहती हैं,"एक समय तो टोरी (कंज़र्वेटिव) के साथ भारत का कोई रिश्ता था ही नहीं, अस्सी के दशक में कांग्रेस की सरकारों के साथ टोरी सरकारों का बहुत कम रिश्ता था."

मगर अब समय बदल गया है, टोरी पार्टी भी बदल गई है.

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बदलाव

Image caption डेविड कैमरन ने भारत के साथ अमरीका की ही तरह विशेष संबंध की हिमायत की है

लंदन स्थित स्कूल ऑफ़ ओरिएंटल एंड ऐफ़्रीकन स्टडीज़ में प्राध्यापक सुबीर सिन्हा बताते हैं,"कंज़र्वेटिव पार्टी के रिश्ते भारत से बहुत अच्छे नहीं रहे हैं लेकिन अभी जो कंज़र्वेटिव पार्टी है उसमें कम-से-कम एक धारा अवश्य है जो पुरानी कंज़र्वेटिव पार्टी से अलग है."

वर्तमान कंज़र्वेटिव सरकार के साथ एक अंतर ये भी है कि ये गठबंधन सरकार है और सरकार में छोटी पार्टी लिबरल डेमोक्रेट्स के साथ होने से फ़र्क पड़ता है."

सुबीर सिन्हा कहते हैं,"निक क्लेग ने हाल ही में संसद में कहा कि वे इराक़ युद्ध को ग़ैरक़ानूनी मानते हैं और बतौर उप प्रधानमंत्री उनका ये कहना महत्वपूर्ण बात है."

ये सिर्फ़ एक कंज़र्वेटिव सरकार नहीं है बल्कि इसमें सहयोगी दल लिबरेल डेमोक्रेट्स शामिल है जिसकी विचारधारा पुरानी कंज़र्वेटिव विचारधारा से अलग है.

कंज़र्वेटिव-लिबरल डेमोक्रेट्स सरकार पिछली लेबर सरकारों से भी अलग दिखती है.

सुबीर सिन्हा कहते हैं,"पिछली लेबर सरकार पूरी तरह से अमरीका की नीतियों पर चलती थी, लेकिन इस सरकार में ऐसे लोग हैं जो ये जताना चाहते हैं उनकी एक अपनी स्वतंत्र सोच है."

चेतावनी

हालाँकि प्राध्यापक और लेबर पार्टी से मनोनयन के बाद हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में सांसद भीखू पारिख कंज़र्वेटिव पार्टी के लिए दिल बड़ा करने में जल्दबाज़ी करने से बचने की सलाह देते हैं.

लॉर्ड पारिख कहते हैं,"केवल शब्दों से बात नहीं बनेगी, हमें देखना होगा कि जो चीज़ें भारत के हित में हैं, उनके बारे में वो क्या करते हैं, वो कश्मीर के बारे में क्या कहते हैं, सीमापार से आतंकवादियों को रोकने के लिए पाकिस्तान पर दबाव डालने के बारे में क्या करते हैं, इसके बाद ही हम ये कह सकेंगे कि दोनों देशों के संबंधों में कुछ नयापन आया है कि नहीं."

इससे पहले भी कई बार ऐसा हुआ था, जब जॉन मेजर और जिम कैलाहन भारत गए थे, सब कहते थे कि हम भारत से नया नाता बनाना चाहते हैं, मगर कुछ निकला नहीं."

मगर पिछले एक दशक में अंतरराष्ट्रीय राजनीति में व्यापक बदलाव आया है और विश्लेषकों के अनुसार दक्षिण एशियाई राजनीति में शक्ति संतुलन के लिए भी ब्रिटेन और अमरीका जैसे देश भारत की अहमियत को बढ़ाना चाहते हैं.

लेकिन विश्लेषक ये भी कहते हैं कि भारत के महत्व की बातों में चर्चा बेशक राजनीति और रणनीति की होती हो, ज़ेहन में तस्वीर तो बस उस भारत की बसी होती है जिसकी अर्थव्यवस्था दुनिया में चीन के बाद सबसे तेज़ गति से बढ़ रही है.

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