फ़िल्मी नहीं, सच्ची कहानी...

Tambi at his work place
Image caption सपने में अकसर मुझे लगता जैसे मां मुझे आवाज़ दे रही है.

असल जिंदगी की कहानी पर तो कई फ़िल्में बनती हैं लेकिन फ़िल्मी सी लगने वाली कोई कहानी अगर ज़िंदगी में सच हो जाए तो क्या अनुभव होगा.

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में रहने वाले 50 वर्षीय राजेंद्र कुमार अय्यर ऊर्फ तंबी की जिंदगी किसी पटकथा से कम नहीं. 47 साल पुरानी एक धुंधली सी याद ने उन्हें किस तरह अपनों से जोड़ा, पेश है ये कहानी खुद ‘तंबी’ की ज़ुबानी.

"सच कहूं तो मुझे तो याद भी नहीं है लेकिन पिता ने बताया था कि जब मैं तीन साल का था तभी मेरे माता-पिता के बीच झगड़ा हुआ और मेरे पिता मुझे लेकर घर से निकल पड़े.

बचपन की याद

बचपन की मेरी पहली याद यही है कि मेरे पिता बिलासपुर शहर के एक छोटे से होटल में बरतन धो रहे हैं और मैं वहीं भट्टी के पास बैठा खेल रहा हूं. पिता दिन भर होटल में काम करते और रात में हम दोनों बाप-बेटे वहीं होटल के बरामदे में सो जाते.

पांच साल का होते-होते मैंने होटल में छोटे-छोटे काम करने शुरु कर दिये थे. तेज धार वाले चाकू से बारीक प्याज काटना तो मेरे लिये बायें हाथ का खेल था. होटल में मुझे सभी तंबी पुकारते थे. तंबी यानी ‘छोटा भाई’.

एक दिन मुझे इस तरह काम करते देख एक ग्राहक ने मेरे मालिक को टोका और कहा कि बच्चे को पढ़ने-लिखने दो. ग्राहक ने मेरे लिये दो ड्रेस सिलवाये और फिर मेरा पास के ही स्कूल में दाख़िला हो गया. स्कूल में मेरा नाम था राजेंद्र कुमार अय्यर.

मां का सपना

स्कूल मेरे लिये एक नया संसार था. नए दोस्त, नए लोग और पढ़ाई. हालांकि इससे मेरे जीवन में कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ा. सुबह सात से 11 तक स्कूल और फिर स्कूल से लौटते ही होटल का काम.

एक दिन पिता का होटल के मालिक से विवाद हो गया और उन्होंने दूसरी जगह काम करना शुरु कर दिया. लेकिन मैं वहीं बना रहा. परिस्थितियां ऐसी बनीं कि तीसरी कक्षा तक पढ़ाई के बाद स्कूल भी छूट गया और मैं एक बार फिर से बन गया केवल तंबी. मैं पूरी तरह से होटल के काम में ही रम गया.

आठ साल की उम्र तक मैंने कई हुनर सीख लिए थे. मुझे पता था कि पकौड़ों और जलेबी से भरी 6-7 प्लेटों को किस तरह संभालना है. मुझे महीने के 15 रुपये भी मिलने शुरु हो गए थे. 14 साल का होते-होते होटल के मालिक ने मुझे होटल के रखरखाव से जुड़ा काम भी देना शुरु कर दिया. मेरे मालिक के पास लॉज थे, भोजनालय था और चाय-नाश्ता परोसने वाला ‘संतोष भुवन’. मैंने लगभग तीनों जगहों में मालिक का हाथ बंटाना शुरु कर दिया.

इस बीच पिताजी मेरे पास आते-जाते रहते थे. पिताजी के अलावा अपना कोई था भी कहां! भाई-बहन तो थे नहीं. एकाध बार मन में मां के बारे सवाल उठा. पिताजी से पूछा तो उन्होंने साफ कह दिया- ‘तुम्हारी मां तो कब की मर गई बेटा’.

ज़िंदगी होटल की रफ़्तार से ही चलती रही. दिन भर के काम के बाद जब रात को सोता तो कई बार सपने में लगता जैसे मेरी मां मुझे आवाज़ दे रही है, लेकिन ये शायद सिर्फ सपना ही था...."

( तंबी की इस कहानी की अगली कड़ी हम बुधवार को आप तक पहुंचाएंगे.)

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