पाठकों की रायः कैसी हिंदी, कैसी भाषा

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Image caption समय के साथ भाषा में परिवर्तन हो रहा है

(बीबीसी हिंदी के पाठक कई विषयों पर गहराई से सोचते हैं. कई बार उन्हें लगता है कि फ़ोरम के मंच पर सीमित शब्दों में अपनी बात कह पाना संभव नहीं है. ऐसे ही एक जागरूक पाठक ने हमें अपने विचार भेजे हैं. यदि आप भी किसी विषय पर विस्तार से लिखना चाहें तो अपने लेख हमें भेज सकते हैं. इसका यह तात्पर्य नहीं है कि आपकी राय के मंच पर आपकी टिप्पणियाँ न आएँ.

किसी भी लेख को इस्तेमाल करना या न करना बीबीसी हिंदी संपादकीय मंडल का विशेषाधिकार होगा. तो पढ़िए क्या लिखते हैं हिसार, हरियाणा से सुरेश बरनवाल:)

बीबीसी इंडिया बोल में बदलती हिंदी पर इंडिया के बोल सुना. एक दो श्रोताओं ने बड़ी बेबाकी से बीबीसी हिंदी सेवा को ही इल्जामों के कटघरे में ले लिया. मैं उनसे पूछना चाहता हूं कि क्या यह विषय एक इल्जाम की तरह लिया गया था?

विषय तो यह था कि क्या हिंदी भाषा का स्वरूप बदल रहा है? यदि हां तो कारण?

कारण के लिए राजेश जी ने भूमिका में पहले ही बता दिया था कि आजकल सहज अपनाई और बोली जाने वाली भाषा के प्रचलन के कारण हिंदी का स्वरूप बदलता जा रहा है. यह गलत है या सही, इसपर परस्पर विरोधी तर्क हो सकते हैं.

वैसे जोशीले श्रोताओं को बधाई कि भले ही वह विषय के मूल मुद्दे को न समझें हों परन्तु उन्होंने तार्किक रूप से बीबीसी हिंदी सेवा को इस विषय में गहरे तक घसीट लेने की हिम्मत दिखाई.

आज के विषय पर एक और बात. क्या यह विषय सिर्फ हिंदी भाषा के संदर्भ में उठाया जा सकता है? अथवा मंगोरियन, जर्मन, फ्रेंच और स्वयं अंग्रेजी के संदर्भ में भी यह प्रश्न इतनी ही शिद्दत से उठाया जा सकता है?

भाषा कोई भी हो, कहीं की भी हो, बाह्य परिस्थितियों के प्रभाव से अपने रूप में परिवर्तन तो लगातार लाती ही है. अंग्रेजी स्वयं यूके और यूएस के रूप में बंटी है और बहुत स्थानों पर दोनों आपस में मिक्स हो जाती हैं.

अब मैंने भी मिक्स शब्द यूज किया. इस घालमेल और परिवर्तन के कारण स्पष्ट हैं कि वह भाषा अधिक प्रभावी होती है जो विचारों को सहज अभिव्यक्त कर सके. हम रेलगाड़ी को ट्रेन कहते हैं, लौहपथगामिनी नहीं.

सहज में ही हमने सरल शब्द को अपनाया. तो परिवर्तन इसलिये अवश्यंभावी है क्योंकि बातचीत की भाषा में हम अपनी बात का सरल संप्रेषण करते हैं, उस भाषा के प्रति अपना ज्ञान या समर्पण नहीं दर्शाते. मान लीजिये मैं हिंदी को उसके सही रूप में उच्चारित करके बात करूं तो क्या सभी लोग मेरे साथ सहज बात कर पाएँगे?

भाषा के रूप

टीवी पर आने वाले सीरियल सजन रे झूठ मत बोलो में एक करेक्टर विशुद्ध हिंदी बोलता है, क्या आप उसे अपने बेटे के मुंह से हर समय सुनना चाहेंगे?

भाषा के दो रूप माने जाते हैं, पर मैं तीन रूप मानता हूं. प्रथम लेखन की भाषा. द्वितीय बोलचाल की भाषा. तृतीय भाषण की भाषा. लेखन की भाषा में क्लिष्टता लाये बगैर आप विशुद्ध हिंदी अपना सकते हैं, और अपनानी भी चाहिए.

बोलचाल की भाषा में आज दैनन्दिन काम में आने वाले शब्दों को उपयोग में लेते हैं, फिर भले ही किसी और भाषा के शब्द हों. भाषण की भाषा इन दोनों का बीच का रूप होती है.

यदि आप भाषा के प्रति समर्पित हैं तो भी आप बोलचाल की भाषा में लेखन वाली भाषा इस्तेमाल नहीं कर सकते. और लेखन में बोलचाल वाली भाषा गलत होगी. भाषा का एक और रूप अब माना जा सकता है.

मीडिया की भाषा. अब बीबीसी हिंदी सेवा अगर हिंदी की सेवा करती है तो ‘टेकवन’, ‘बीबीसी इंडिया बोल’ इत्यादि गलत हैं. और यदि बीबीसी की शैली श्रोताओं के साथ अनौपचारिक इंटरएक्शन, और यहां पर मैं इसी शब्द को सहज रूप से लिख पा रहा हूं, बना रही है तो उसे बोलचाल की भाषा को अंशतः अपनाना ही होगा.

हम यह समझ लें कि कितने भी समर्पण के बावजूद हम बोलचाल की हिंदी में अन्य भाषाओं का मिश्रण नहीं रोक सकते और उसे रोकने की जरूरत भी नहीं है. हिंदी के प्रेमियों को चाहिये कि वह लेखन में विशुद्ध हिंदी का उपयोग पूरे समर्पण के साथ करते रहें.

रही मीडिया की बात तो यह ऐसा वर्ग है जो अब बाजार बन चुका है और इसका लाभ कस्टमर्स के साथ सहज संबंध बनाने से ही सध सकता है, और उसके लिए जरूरी है मिक्स भाषा. हिंग्लिश ही नहीं, हिंदी उर्दू का मिश्रण भी और इंगलिश उर्दू का मिश्रण भी.

( आप अपनी राय hindi.letters@bbc.co.uk पर भेज सकते हैं )

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