अजीब दास्तान है ये...

तंबी
Image caption तंबी ने गांव में जिससे भी मां के बारे में पूछा वो टाल गया.

असल जिंदगी की कहानी पर तो अकसर फिल्में बनती हैं लेकिन फिल्मी सी लगने वाली कोई कहानी अगर जिंदगी में सच हो जाए तो क्या अनुभव होगा.

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में रहने वाले 50 वर्षीय राजेंद्र कुमार अय्यर ऊर्फ तंबी की जिंदगी किसी पटकथा से कम नहीं. 47 साल पुरानी एक धुंधली सी याद ने उन्हें किस तरह अपनों से जोड़ा, ‘तंबी’ की इस कहानी को खुद उनकी ज़ुबानी हम आप तक पहुंचा रहे हैं.

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(इस कहानी में अब तक आपने पढ़ा कि तीन साल की उम्र में तंबी के माता-पिता के बीच झगड़ा हुआ, और पिता उन्हें लेकर घर से निकल पड़े. अपने पिता के साथ मिलकर उन्होंने एक होटल में काम करना शुरु कर दिया. मां के बारे में पूछने पर उनसे कहा गया कि वो मर गई लेकिन तंबी अकसर उन्हें याद करते थे. अब आगे...)

'' मध्यप्रदेश के बिलासपुर शहर में रहते और काम करते मुझे 20 साल हो गए थे.

मैं कोई 25 साल का रहा होऊँगा. एक दिन पिताजी आए और उन्होंने अपने गांव की बात छेड़ी. ये 1985-86 के आसपास की बात है. तमिलनाडु के वृद्धाचलम के पास हमारा गांव था ‘तोंडंगकूर्ची’. बिलासपुर से कोई दो हज़ार किलोमीटर दूर.

हम दोनों ने थोड़े से पैसे जमा किए और अपने गांव के लिये चल पड़े. पहले ट्रेन की लंबी यात्रा करके वृद्धाचलम. फिर वहां से वेपुर और वहां से बस पकड़ कर अपने गांव तोंडंगकूर्ची.

रिश्ते अनजाने

गांव में हम चाचा के घर रुके. पिता तो गांव में मगन हो गए लेकिन सच कहूं तो मेरे लिए रिश्ते के नाम पर कोई खास आकर्षण नहीं था. चाचा और चचेरे भाइयों के साथ रिश्ते की आत्मीयता तो थी लेकिन यह ये संबंध औपचारिक से ही थे. हो सकता है, पहली मुलाकात के कारण ऐसा हो. मैं पहली बार घर के माहौल से रूबरु हो रहा था.

कोई दस दिन तक वहां रहने के बाद हम दोनों बिलासपुर लौट आए. पिता खुश थे कि मैंने अपना गांव देख लिया और इतने सालों बाद उनकी भी अपने रिश्तेदारों से मुलाकात हो गई, लेकिन मेरा मन उदास था.

गांव में रहते हुये एक दिन मैंने चाचा से अकेले में पूछा था- “चाचा, मेरी मां कैसे मरी थी” चाचा ने कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दिया. गांव में कुछ और लोगों से मैंने मां के बारे में जानना चाहा लेकिन कहीं कोई उत्तर नहीं मिला.

Image caption अपनी पत्नी और बेटियों के साथ तंबी.

33 साल की उम्र में मेरी शादी हुई. इसके बाद दो बेटियां हुईं और मैं अपनी दुनिया में रम गया.

पिता की गांव वापसी

इस बीच पिताजी बीमार पड़ गए. उनका इलाज चलता रहा लेकिन एक दिन उन्होंने इच्छा जताई- “ मैं इस परदेस में रहकर नहीं मरना चाहता. मुझे गांव जाने दो.”

मेरे मना करने के बाद भी वो एक दिन मेरी जान-पहचान वाले से कुछ पैसे लेकर अकेले गांव चले गए. मेरे पास कोई चारा नहीं था. चाचा और चचेरे भाइयों को चिट्ठियां लिखी कि उनका ध्यान रखना. जितना संभव था, हर महीने उनके इलाज और दूसरे खर्चे के लिये मैंने मनीऑर्डर भेजना भी जारी रखा.

2007 में गांव से खबर आई कि पिताजी बहुत बीमार हैं, जल्दी आओ. भागा-भागा गांव पहुंचा. पिता बिस्तर पर थे. तय किया कि इन्हें बिलासपुर ले जाऊँगा. लेकिन इस बीच जो कुछ घटा, उसने मेरी दुनिया बदल दी.

चचेरे भाई की पत्नी से एक दिन दोपहर में यूं ही रिश्ते-नाते और मां को लेकर बात चली. भाभी से बातचीत में ही पता चला कि मेरी मां पिताजी से झगड़े के बाद अपने मायके चली गई थी. फिर उनका क्या हुआ, इसकी कोई खबर नहीं मिली. 48 साल की उम्र में एक बार फिर मेरे मन में मां के बारे में जानने की इच्छा जगी..."

( माँ के बारे में और कुछ जानने की ललक तंबी को कहाँ ले गई यह हम आपको इस कहानी की अगली कड़ी में शुक्रवार को बताएँगे.)

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