जहाँ हथियार चलाना सीख रही हैं महिलाएँ

हथियार का प्रशिक्षण लेती महिलाएँ

भारत प्रशासित जम्मू कश्मीर में 1990 के दशक में जब चरमपंथी हिंसा बढ़ रही थी तो सरकार ने पहाड़ी क्षेत्रों में गाँव के लोगों को मिलाकर ग्रामीण सुरक्षा समितियाँ या वीडीसी का गठन करना शुरु किया था.

इसका मक़सद चरमपंथियों के साथ मुक़ाबला करने में सुरक्षा बलों की सहायता करना और सुरक्षा बलों के पहुँचने तक चरमपंथियों का मुक़ाबला करना था.

पूँछ और राजौरी ज़िले में साल 2000 तक महिलाओं की भी वीडीसी बनने लगी थीं लेकिन अब इस अभियान ने ज़ोर पकड़ा है अनेक महिलाएँ हथियार चलाने का प्रशिक्षण लेने के लिए सामने आने लगी हैं.

चरमपंथियों का डर

वैसे तो इन इलाक़ों की महिलाएँ बाहर के किसी व्यक्ति से बात करने में शर्माती हैं. लेकिन बंदूक चलाने का प्रशिक्षण लेते हुए वे कुछ अलग ही दिखती हैं.

प्रशिक्षण के दौरान वे प्रशिक्षक के दिशा-निर्देश पर बंदूक पकड़ने से लेकर चलाने तक में माहिर होना चाहती हैं.

प्रशिक्षण ले रहीं शकीला बेगम दो बच्चों की माँ हैं. उन्होंने बीबीसी को बताया, "मैं बंदूक चलाने की ट्रेनिंग इसलिए लेना चाहती हूँ क्योंकि हमारे यहाँ मर्द काम पर चले जाते हैं. घर में हम अकेले होते हैं. चरमपथियों का डर है. इसलिए हमें भी बंदूक और उसे चलाने की ट्रेनिंग चाहिए."

रज़िया बानो तो बंदूक चलाना सीखकर चरमपंथियों से मुक़ाबला करना चाहती हैं. वे कहती हैं, ''हमारे यहाँ हालात ठीक नहीं हैं, मिलिटेंटों का ख़तरा है और हम वीडीसी में भर्ती होकर उनका मुकाबला करना चाहते हैं."

दो दशक से अधिक की हिंसा का महिलाओं पर ख़ासा प्रभाव पड़ा है. कभी वे ख़ुद शिकार बनीं तो कभी पति को खोया, भाई खोया, बाप खोया, और सबसे बुरा यह कि ख़ुद बेसहारा होकर बच्चों का पालन पोषण किया.

महिलाओं को ट्रेनिंग देने वाले इंस्पेक्टर फ़ैय्याज़ कहते हैं कि ऐसे पिछड़े इलाकों में प्रशिक्षित वीडीसी काफ़ी लाभदायक होती हैं. इनसे चरमपंथी भी काफ़ी डरते हैं.

उन्होंने कहा कि सुरक्षा समितियाँ उन्हें सूचना देती हैं और मुठभेड़ में सहायता करती हैं.

प्रशिक्षण की कमी

वहीं एक सुरक्षा समितवी के सदस्य अशोक कुमार का आरोप है कि उन्हें प्रयाप्त प्रशिक्षण नहीं दिया जाता. अशोक कुमार कहते हैं,"ट्रेनिंग बहुत कम दी जाती है. अगर हमें सही ट्रेनिंग मिले तो हम भी सही तरीके से मिलिटेंटों का मुकाबला कर सकते हैं."

उन्होंने बताया कि सुरक्षाबल मुठभेड़ के समय उन्हें ढाल बनाते हैं और मोर्चे के आगे रखते हैं.

एक वीडीसी में गाँव के आठ से 15 सदस्य चुने जाते हैं जिन्हें सरकार हथियार और उसे चलाने का प्रशिक्षण देती है.

Image caption 1990 से ग्रामीण सुरक्षा समितियों का गठन किया जा रहा है.

पिछले साल राजौरी के पास थानामंदी इलाक़े में एक युवती रुख़साना कौसर ने लश्करे तैबा के दो चरमपंथियों को मार दिया था.

उसे पुलिस की नौकरी के साथ-साथ सरकार की ओर से कई नागरिक पुरस्कार भी मिले. इसके बाद महिलाओं ने बढ़-चढ़ कर वीडीसी में भर्ती होना शुरू कर दिया.

राजौरी के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक शफ़कत वटाली कहते हैं,"हमने महिलायों को सुरक्षा समितियों में भर्ती करना इसलिए शुरू किया क्योंकि जब पुरुष काम पर चले जाते हैं तो इन्हें मिलिटेंटों का ख़तरा होता है. इसलिए हमने मुनासिब समझा कि उन्हें भी प्रशिक्षण दिया जाए."

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